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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 488, कुल 508 में से

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पृष्ठ 488

४५६ रंगनाथ रामायण
वाक-रूपी कुच-द्वय, बाहुलताएँ-रूपी मृणाल, विमल त्रिवली-रूपी तरंगें, विशाल एवं चंचल
नेत्र-रूपी मत्स्य, सहज नील चिकुर-रूपी शैवाल से युक्त सरोवर की भाँति सुशोभित उस
कमलाक्षी को देखकर वानर एवं राक्षस शोक करने लगे । सुर, सिद्ध एवं साध्य स्तुति करने लगे ।
पवन-पुत्र, सूर्य-पुत्र, सौमित्र, विभीषण, अंगद, वानर-सेना, दानव-वीर, साथ ही सरमा
आदि राक्षस-वधुएँ अत्यधिक गोक से सतप्त हो उठी । राम निर्वेद से अभिभूत हो
स्थिर रहे ।
तब शिव, ब्रह्मा, अखिल दिक्पाल, गरुड़-गंधर्व एवं खेचर-श्रेष्ठ विमान पर आरूढ़
हो वहाँ आ पहुँचे । राम उन्हें देखकर उनके स्वागतार्थ खड़े हुए । राम को देखकर उन्होंने
कहा—"हे देव ! आप वेदान्त के द्वारा ज्ञेय हैं, (अखिल ससार के) साक्षी हैं, कर्त्ता हैं, ज्ञान-स्वरूप हैं,
मुक्त हैं, नित्यपूर्ण हैं, सर्वज्ञ हैं, जगदेकनिधि हैं, अक्षीण पुण्यात्मा हैं, अव्यक्त हैं, अक्षर
त्रिमूर्ति हैं और आद्यत-पति हैं । भुवन, समुद्र, भूत, नदियाँ, यज्ञ, पर्वत, जन्तु-समूह, वृक्ष,
मार्ग, तन्त्र, विधियाँ, सुर, नक्षत्र, वेद, गास्त्र आदि सहस्रों, लाखों, करोड़ों तथा अरबों
की सख्या में एक-एक ब्रह्माण्ड में पाये जाते हैं, उनकी गणना कोई भी नहीं कर सकता ।
ऐसे असंख्य ब्रह्माण्ड आपके उदर में रहते हैं । उनकी गणना ही नहीं हो सकती । आपके
स्वरूप का पार पाना किसके लिए संभव है ? आपकी माया का प्रभाव जानना आपके
मिवा दूसरों के लिए कहाँ संभव है ? 'आपने अमुक का संहार किया, आपने अमुक को
जीता, अमुक ने आपको जीता, अमुक आपके अवीन हैं, अमुक आपसे श्रेष्ठ हैं'—ऐसी
निन्दा एवं स्तुति आपका स्पर्श भी नहीं कर सकती । दास-भाव को छोड़कर अन्य किसी
भी मार्ग से आपके ज्ञान-रूप का दर्गन दुर्लभ हैं । हे राजन्, आप आदिनारायण हैं और
जानकी आदिलक्ष्मी हैं । लोक-रक्षणार्थ आप काकुत्स्थ के रूप में विख्यात हुए हैं । आप
स्वयं अपने को क्यों भूल गये हैं ? निष्ठुर वह्नि में स्थित जानकी को देखते हुए चुप रहना
आपके लिए उचितं नहीं है । आप उन्हें अपनाइए, प्रीति से आदर कीजिए । उस वनजाक्षी
की उपेक्षा मत कीजिए ।"
१५७. सीता-परिग्रहण
देवताओ ने जब रामचन्द्र को कई रीतियो से समझाया, तब दैत्य तथा कपि परस्पर
कहने लगे—'इस साध्वी के शरीर से न श्रम-बिन्दु निकल रहे हैं, न इनका मुख कुम्हला
रहा है, न इनकी तनुलता सूख रही है, न ये व्याकुल हो रही हैं, न इनकी धारण की हुई
पुष्प-मालाएँ मुरझाई हैं और न इनका अंगराग ही छूटा है ।' वे सीता को देखकर शोक-
सतप्त होते हुए गद्गद कठ से कहने लगे—'रामचन्द्र को ऐसी पवित्र पत्नी के प्रति ऐसे
निष्ठुर वचन नहीं कहना चाहिए । ऐसा साहस उचित नहीं हैं । उनके इस प्रकार कहते
समय अग्निदेव कोमलांगी सीता को अपनी गोद में उठाकर बाहर निकले और उन्हें बड़ी
प्रीति से राम के सामने खड़ा करके कहा—'यह कल्याणी मुग्धा है । तुम्हीं इसके देवता हो,
तुम्हीं इसके प्राण हो, तुम्हीं इसके बन्धु हो और तुम्हीं इसके मर्वस्व हो । तुम्हारे सिवा
और किमी को इसके हृदय में स्थान नहीं है । रावण की आज्ञा से कई राक्षस-स्त्रियों ने
कई प्रकार से इसे पीड़ित किया, भयंकर कृत्यों से इसे डराया, धमकाया और छल किया ।