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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 490, कुल 508 में से

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पृष्ठ 490

४६० रंगनाथ रामायण
वह दु ख सतत प्रज्वलित अग्नि के समान मेरे हृदय में जलता रहता है । अमर
लोक में भी जो अग्नि शमित नही हुई, वही आज तुम्हारे समक्ष उपशमित (शान्त)
हो गई । हे कमलाप्त-सम-तेजस्वी, हे कमलाभिराम, हे कमलाप्तवंशज, तुम अयोध्या को लौट
जाओ और निखिल धर्मों का पालन करते हुए साम्राज्य को ग्रहण करके अक्षय कीर्त्ति के
साथ चिर काल तक इस पृथ्वी का ऐसा पालन करो कि प्रजा कहे कि राम लोकाभिराम हैं।
उसके पश्चात् उन्होने लक्ष्मण को देखकर कहा—'हे सौमित्र, तुमने राम के साथ
अरण्य में घूमते हुए अनेक उत्तम एव साहसपूर्ण कार्य करके पुण्य प्राप्त किया है । भविष्य
में भी सावधानी के साथ, अपने 'अग्रज के मन को दुखी बनाये विना आचरण करते रहना।'
तदनन्तर उन्होने अपना सिर झुकाकर प्रणाम करके खडी हुई सीता को देखकर कहा—'हे
पुत्री, परम पवित्र पातिव्रत्य धर्म में तुम्हारी समता कोई स्त्री नही कर सकती । तुम उत्तम
साध्वी हो । राम ने तुम्हें जो निष्ठुर वचन कहे, उनके लिए तुम रुष्ट और दुःखी मत
होना । तुम राघव के समान महान् कीर्त्तिवान् पुत्रो को प्राप्त करो, पुण्य प्राप्त करते हुए
जीवन व्यतीत करो ।' इस प्रकार, तीनो को आशीर्वाद देकर महाराज दशरथ मन-ही-मन
सतुष्ट हुए ।
१५९. देवताओं का अभिनन्दन
तब चन्द्र-सम शीतल प्रभु राम को देखकर इन्द्र आदि देवताओ ने कहा—'हे पुण्यात्मा,
आपने हमारे निमित्त मनुष्य के रूप में जन्म लिया, राक्षसो का सहार किया, अनेक
प्रकार के दुखो का सहन किया और भूमि का भार उतारकर हमारी रक्षा की, हमें जीवन-
दान दिया और हमें शान्ति प्रदान करके भेज रहे है । हम आपको वर देंगे। आप अपना
अभीष्ट कहें ।'
तब राम ने देवताओ को देखकर मदहास करते हुए कहा—'आपकी कृपा से इस
ससार में मेरे सभी कार्य सम्पन्न हो गये । कितने ही वानर, अपना-अपना देश, घर-द्वार,
बन्धुजन, पुत्र तथा मित्रो को छोडकर, बडे साहस के साथ, अपने प्राणो की भी परवाह
किये विना मेरे लिए शत्रुओ के साथ युद्ध करके प्राण खो बैठे हैं । ये कपि-वीर
उन्नतात्मा है । उन्हें जीवन प्रदान कीजिए।' तब देवताओ ने कहा—'ऐसा ही हो । ये वानर प्राण
प्राप्त करेंगे।' इतना कहकर महादेव, ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवता तथा दिक्पाल, मुनि, सुर सभी राम की
प्रशसा करते हुए स्वर्गलोक को चले गये । उसके पश्चात् दशरथ भी स्वर्ग को चले गये ।
देवताओ के वर के प्रताप से युद्धभूमि में कटकर गिरे हुए सभी वानर जीवन
प्राप्त करके ऐसे उठे, मानो वे नीद से जाग रहे हो । फिर, राम को देखकर बडे हर्ष से
उन्होने प्रणाम किया । तब राम वडी दया से उन सब को निहारकर बहुत प्रसन्न हुए ।
तब विभीषण ने राम को देखकर बडी भक्ति के साथ कहा—'हे देव, हे राघव-
राज, आपके लका में पधारकर अभिषेक स्वीकार करने का यही उचित समय है ।' तब
राघव ने कहा—'जटाओ का भार धारण किये हुए तथा वल्कल पहने भरत के (अयोध्या
में) तप में निरत रहते समय, उसको बिना देखे हमारा यहाँ सुख-भोग में तत्पर रहना
अनुचित है ।'