रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 493, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें'यह लो, यही पर महान् सेतु है, जिसे हमने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हुए
समुद्र पर बाँधा था । यही गधमादन नामक पुण्य-तीर्थ है । यह सदाशिव का सर्वमान्य
निवास-स्थान है । हे कमलाक्षी, यह जो काचनाचल दीख रहा है, वही हिरण्यनाभ है ।
हे सुदरी, पवन-पुत्र तुम्हारा अन्वेषण करते हुए बडे वेग से लका की ओर जा रहा था,
तब उसको आतिथ्य देने के उद्देश्य से यह महान् पर्वत समुद्र से ऊपर निकल आया था ।'
जब राम इस प्रकार वर्णन कर ही रहे थे कि राम ने अपने समक्ष भयकर आकार
से युक्त रावण का रूप देखा । उसे देखते ही सभ्रमचित्त हो राम ने विभीषण से कहा—
'हे विभीषण, यह कैसा विचित्र है ? मैं ने अपने प्रचण्ड बाहुबल से युद्ध-क्षेत्र में दशकठ का
सहार किया था, और इसके लिए ब्रह्मा-आदि समस्त देवताओ ने बार-बार मेरी प्रशसा
भी की थी । तब फिर आज मेरी आँखो के सामने रावण आकर कैसे खडा है ? इसका
क्या रहस्य है ?' तब विभीषण ने कहा--'हे राजन्, ब्रह्मा की सतति में जन्म लिये हुए
दुर्जन रावण का आपने वध किया था । अत, आपको ब्रह्म-हत्या का दोष लग गया है ।
इसलिए कदाचित् रावण आपको दीख पडा है । इस पाप का प्रायश्चित्त यही करके आगे
बढना चाहिए । नही तो आगे के कार्य सफल नही होगे । अत', आप मन-ही-मन ब्रह्मा
का स्मरण कीजिए । देवताओ के साथ वे बडे हर्ष से आयेंगे और कर्तव्य का निर्देश करेंगे ।
तब राम ने पुष्पक विमान को पृथ्वी पर उतरवाया और मन-ही-मन बडी श्रद्धा
से ब्रह्मा का स्मरण किया । तुरन्त सभी दिक्पालो, मुनियो तथा देवताओ के साथ ब्रह्मा
वहाँ आये और बडी प्रीति से बोले--'हे देव, आपने मुझे किसलिए स्मरण किया है ?'
तब रघुराम ने अपने देखे हुए रावण के रूप का वृत्तान्त सुनाया । तब ब्रह्मा विस्मित होकर
बोले--'हे देव, यह दैत्य मेरे तेज से इस पृथ्वी पर पैदा हुआ और इतने घोर पाप किये,
'फिर भी अन्त में पाप-रहित होकर मरा । इस पृथ्वी पर विप्र अपने वर्णाश्रम धर्म का ज्ञान
रखते हुए, उसके अनुसार कर्म न करे, उसके विपरीत कर्म करे, अतुल पाप करे, गुरु-
दूषण करे, कुल-भ्रष्ट हो जाय और गो-ब्राह्मण हत्या आदि घोर पाप भी क्यो न करे,
'फिर भी वह इस पृथ्वी पर वध के योग्य नही है । राजा को यही चाहिए कि ऐसे दुर्जन,
क्रूर एव पापी के वश को निर्मूल कर दे और उसे अपने देश से निर्वासित कर दे ।
हे जगदीश, विश्रववसु का पुत्र, अब मोक्षार्थी हो आपके सामने खडा हुआ है । उसे सतुष्ट
कीजिए और एक शुभ लग्न में समुद्र के सेतु पर अपने नाम पर शिव की प्रतिष्ठा कीजिए।
इसके पश्चात् उसकी विधि बतलाकर ब्रह्मा चले गये ।
१६२. राम के द्वारा शिवलिंग का प्रतिष्ठापन
तुरन्त राम ने अपने निकट रहनेवाले पवन-पुत्र को देखकर कहा--'हे प्रशसनीय
बलाढ्य तथा साहसी हनुमान्, तुमने हमारा कार्य पूरा करके हमारा उद्धार किया है और
हमारी कीर्त्ति को चारो ओर फैलाकर हमें कृतार्थ किया है । विनय, विक्रम, धैर्य एव
प्रसिद्धि में निखिल लोको में तुम्हारी समता कोई नही कर सकता । अभी हमारा एक और
कार्य सपंन्न करो । हे वानरोत्तम, तुम असख्यफलप्रदायिनी काशी को शीघ्र जाकर वहाँ से
एक शिवलिंग ले आओ । यहाँ से काशी दो सौ दस योजन दूर है । दो घडी में