रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६८ रंगनाथ रामायण
इतना कहकर मुनि ने अपने श्रेष्ठ तप की महिमा से राम को चकित करते हुए
कामधेनु का स्मरण किया । तुरन्त उस कामधेनु ने स्वच्छ कान्ति से चमकता हुआ, भात,
फल, घृत, दाल, विविध मिष्टान्न, मधुर शाक, शक्कर, दधि, परमान्न, औँटाया हुआ दूध,
मधु, शिखरन, शरबत, चटनी, पेवस, वरी, सुगंधित जल और स्वादिष्ट अँचार आदि का
प्रबन्ध कर दिया । तब राम ने वानर तथा दैत्य-नायकों के साथ बडी भक्ति एवं प्रीति से
भोजन किया । तदनन्तर भरद्वाज ने राम से कहा--'हे सुगुणाभिराम, हे कल्याणगुणधाम,
मैं तुम्हें कोई वर देना चाहता हूँ । तुम अपनी इच्छा से माँग लो ।' तब राम ने हाथ
जोडकर कहा--'हे मुनीश्वर, आप कृपा करके ऐसा वर प्रदान कीजिए कि साकेत नगरी
के चारो ओर तीन योजन तक की भूमि वर्ष भर शस्य-श्यामल बनी रहे और वहाँ के वृक्ष
सदा फूलते-फलते रहें । इसके सिवा मै और कोई वर नही चाहता ।' मुनि ने ऐसा ही
वर देने की कृपा की । वानर-वीर मुनि के दर्शन करके हर्ष से प्रफुल्लित होकर अपने को
कृतार्थ मानने लगे ।
तब रघुपति अनिलकुमार को देखकर बोले--'हे मारुति, तुम अपनी अनुपम शक्ति
से शीघ्र शृंगवेरपुर जाकर पुण्यात्मा गुह से मिलो और हमारे आगमन की सूचना उसे दो ।
उस पुण्यात्मा से मार्ग जानकर नंदीग्राम पहुँचकर हमारे अनुज शुभव्रती, दयालु तथा
उन्नतात्मा भरत को हमारे आगमन का समाचार देकर शीघ्र लौट आओ ।'
तब हनुमान् ने मानव-रूप धारण कर बडे वेग से गगा नदी को पार किया, और
शृंगवेरपुर में पहुँचा । वहाँ परहितात्मा परमेश्वर के आगमन का समाचार न जानने के
कारण गुह मन-ही-मन सोचने लगा--'मैं अपने प्रभु राजाराम के चरण-कमलो की सेवा
करते हुए उनके साथ वन में नही जा सका । पता नही, वे वहाँ कैसे रहते हैं और कहाँ हैं ?
कदाचित् वे सिंह, भेरुण्ड, राक्षस, अग्नि, भुजंग, विष आदि से पीडित हो कही
नष्ट तो नही हो गये । अन्यथा, (चौदह वर्ष की) अवधि समाप्त होने के पश्चात् भी
रघुराम लौटकर क्यो नही आये । राम अपने वचन तोडनेवाले नही हैं । मुझसे भूल