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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

४४४ रंगनाथ रामायण
भयभीत करनेवाले रावण ने पृथ्वी को कँपाते हुए अद्भुत अस्त्र चलाकर रथ को ढक-सा
दिया, सारथी को व्याकुल कर दिया, अश्वो को शक्तिहीन कर दिया और एक प्रचंड बाण
चलाकर राघव का धनुष तोड दिया और कई बाणो से राघव को भी पीडित किया । तब
क्रुद्ध होकर राम ने भयंकर रूप धारण करके देवेंद्र के द्वारा भेजे हुए धनुष को सँभाला
और उसकी प्रत्यचा के टकार से ब्रह्वाड को विदीर्ण करते हुए दानवो के गर्वाधकार का
नाश करने के निमित्त सूर्य-सम भास्वर सैकडो, सहस्रो, लाखो, करोडो तथा अरबो की
संख्या में शर रावण पर चलाये । वे बाण कदाचित् यह सोचकर उसके शरीर को पार कर
जाते थे कि यह महान् पापी है, क्रूर है, चचल है, मायावी है, धर्मबद्ध रहनेवाले हमें इसके
शरीर में नहीं रहना चाहिए । कुछ बाण कदाचित् यह सोचकर आकाश की ओर, पृथ्वी
की ओर और लका की ओर जाने लगे, मानो वे यह समाचार पृथ्वी को देवताओ तथा
सीता को सुनाने जा रहे हैं कि अब अधिक विलब नही है, रावण अब मरनेवाला ही है,
तुम अब व्याकुल मत होओ । अग्नि की प्रभा के समान दीप्त होनेवाले राम के बाण
मूसलाधार वर्षा की भाँति रावण पर गिरने लगे, फिर भी रावण अविचल रहते हुए प्रचंड
शरो से राम के बाणो को काटने लगा । इस प्रकार, विशाल बाहुबल तथा रण-कौशल से
युक्त वे दोनो पराक्रमी समान सत्त्व, समान वेग, समान बाण-संपत्ति, समान रण-कौशल से
युक्त हो, भिड गये, और वधन से मुक्त क्रोध से भरे सिहो की भाँति, सात दिन तथा
सात रात तक अविराम युद्ध करते रहे । उस समय रावण के रथ पर मेघ रक्त की वर्षा
करने लगे, रथ के अश्वो की पूँछो से अग्नि-कण निकलने लगे, सूर्य की किरणें भिन्न-भिन्न
कातियो में दीप्त होने लगी । रावण को देखकर समस्त भूत कहने लगे—‘अब तुम बच
नही सकोगे, आज अवश्य मरोगे ।' आकाशवाणी हुई—‘हे राघव, आप विजयी होगे ।'
अपनी पराजय को सूचित करनेवाले दु शकुनो को देखकर रावण ने विजय की आशा
छोड़ दी । फिर भी, वडे साहस के साथ राघव पर निशित बाण, करवाल, गदाएँ, शूल,
परिघ, शक्ति आदि चलाकर उन्हें कष्ट पहुँचाने लगा । किंतु राम ने वज्र-सम तथा प्रचंड
प्रलयाग्नि की समता करनेवाले अर्द्ध-चंद्रास्त्र चलाकर उन्हें वीच में ही खडित कर दिया ।
रावण ने अत्यंत भयंकर रूप से भीषण बाणो की वर्षा की, तो राघव ने अर्द्ध-चंद्र बाणो से
उन्हें काट डाला ।
इस प्रकार, विजय की आकाक्षा करके दोनो वीर वडी धीरता के साथ परस्पर
युद्ध करते रहे । तब वानर एव राक्षस-सैनिक अपने-अपने अस्त्र सँभाले हुए रण-विचक्षण
राम-रावण का युद्ध-कौशल देखते हुए चित्रलिखित की भाँति युद्ध भूलकर
खडे रहे । अपनी पराजय को निश्चत जानते हुए भी रावण और अपनी विजय निश्चित
जानते हुए राम, दोनो वडी तत्परता के साथ क्षण-क्षण आगे बढते हुए, उत्साह के साथ
युद्ध करने लगे । उसी समय क्रोध से अपनी आँखो से अग्नि-कणो की वर्षा करते हुए
राम ने एक पैने अर्द्ध-चंद्र बाण से रावण के रथ की ध्वजा को काट डाला । तब रावण ने
भी अत्यधिक रोष से घोर बाणो का सधान करके, राम के रथ के अश्वो तथा मातलि
पर चलाया । किंतु वे उन बाणो से आहत होकर भी कमल-नालो से आहत व्यक्तियो के

समान विना हिले-डुले निश्चल खडे रहे । तब वानर अट्टहास करते हुए रावण पर पिल
पडे । रावण ने अपनी माया से उस वानर-सेना पर महान् शस्त्रो की वृष्टि की । उस
वाण-वृष्टि से वानर-वीर भयभीत हो उठे । तब राम ने रावण पर, उसके सारथी, रथ तथा
रथ के अश्वो पर असख्य बाण चलाकर उसे व्याकुल कर दिया । दशकठ ने भी दाशरथि
पर वाणो की वृष्टि की । तब राम ने अद्वितीय ढग से भयकर वाणो का सधान किया
और उनसे समस्त आकाश तथा पृथ्वी को ढक दिया । महेंद्र पर्वत तथा मदराचल के समान
धैर्य रखनेवाले वे दोनो वीर, युद्धभूमि में स्थिर होकर इस प्रकार युद्ध करने लगे, जैसे
नभ के साथ नभ, समुद्र के साथ समुद्र युद्ध करते हो और 'रामरावणयोर्युद्ध रामरावणयो-
रिव' वाली उक्ति को चरितार्थ करने लगे । तब मेघ-गर्जन के समान धनुष की ध्वनि,
प्रचड शरो के परस्पर टकराने की ध्वनि, युद्ध के समय सुनाई पडनेवाले भयकर गर्जन,
रथो के चलने से उत्पन्न होनेवाली विपुल ध्वनि तथा घोडो की हिनहिनाहट आदि की
सम्मिलित ध्वनि से समुद्र आलोडित हुए, उल्काएँ गिरने लगी, दिशाएँ कंपित हो उठी,
पृथ्वी हिल उठी, समस्त लोक चकरा गये, पर्वत काँप उठे, दिग्गज चकराने लगे, देवता
आनदित हो उठे, समस्त भूत त्रस्त हो उठे और आदिशेष विचलित हो उठा । इस प्रकार,
अत्यधिक वीरता के साथ लडते-लडते उन दोनो की बाहुओ का दर्प कुछ शिथिल हुआ,
उनकी प्रचडता कुछ कम हुई, और थोडी देर तक अपने-अपने धनुष का सधान करना
छोडकर वे एक दूसरे को देखने लगे । चचल फूतकार, श्रमजल का प्रवाह, चीत्कार आदि
के पश्चात् उनकी थकावट आधी घडी में ही दूर हो गई ।
१४५. राम का रावण के कर-चरणों को खंडित करना
तुरत वे फिर रणोत्साह से दीप्त हो उठे और प्रलय-काल के यम की भाँति भयकर
रूप धारण करके महान् साहस के साथ रावण से भिड गये । राम ने तब प्रलय-काल के
रुद्र के समान भयकर दीखते हुए घोर तथा पैनी कर्तरी, आरा तथा भाला को चलाकर उस
दशकठ के दसो सिर और बीसो बाहुओ को एक साथ ही काट डाला । सब लोग आश्चर्य-
चकित होकर देखने लगे । किंतु दूसरे ही क्षण करवाल, मूसल, मुद्गर, शर, चाप तथा
केयूरो से युक्त बीस बाहुएँ तथा महान् मुकुटो से अलकृत दसो सिर ऐसे उग आये कि
राम भी इसे देख चकित होकर कहने लगे—'मेरा काटना ही झूठ था ।' इस पर क्रुद्ध
होकर दाशरथि ने पुन उसके सिर और हाथ काट डाले । किंतु जितने वेग से राम उसके
सिर काट देते, उतने ही वेग के साथ उसके सिर उग आते थे । सिर के मुकुटो पर वाणो
के लगने की ध्वनि कानो में पडने के पहले ही नये उगे हुए सिरो से निकलनेवाला भयकर
अट्टहास कानो में सुनाई पडता था । रावण के कटे हुए सिरो के स्थान पर तुरत नये
सिर उग आते थे और कटे हुए सिरो में राम के वाण गडे हुए रह जाते थे, तो ऐसा
लगता था कि मानो रावण ने ब्रह्मा से, केवल कठ पर सिरो के उग आने का ही वर नही
प्राप्त किया था, बल्कि शरो में भी सिरो के उग आने का वर प्राप्त किया था । उनके
सिरो का कटना, कटे हुए सिरो का वाण के साथ ऊपर उठना, फिर नये उग आये हुए
सिरो को बाणो से काटना, ये सभी व्यापार एक के वाद एक इतनी शीघ्र गति से चलने लगे

४४६ | रंगनाथ रामायण


कि दर्शक चकित रह जाते थे और ऐसा लगता था, मानो सौरभ-युक्त राम-बाण-रूपी
उत्पलों के साथ रावण के सिर-रूपी कमल-समूह को मिलाकर, रक्त-धारा-रूपी सूत्र में
माला गूंथकर, स्वर्ग का माली बार-बार देवताओ को मालाएँ समर्पित कर रहा हो ।
रघुराम क्रोध से व्यग्र हो, अपना रण-कौशल दिखाते हुए, अच्छी तरह लक्ष्य साधकर,
अपनी दृढ़ मुष्टि के चमत्कार से, रावण के सिर तथा भुजाएँ काटते जाते थे और शीघ्र ही
वे उग आते थे । जितनी ही शीघ्रता से राम उन्हें काटते थे, उतनी ही शीघ्रता से वे उग
आते थे । राम के शर-समूह से रावण के सिर तथा करो का कट जाना और फिर उनका
निकल आना इस वेग से होता था कि राक्षसो तथा वानरो को इसका पता भी नही लगता था।
रघुराम के शरो से कटकर गिरे हुए रावण के सिर न जँभाई लेते थे, न दर्द का
अनुभव करते थे, न मंद पड़ते थे, न शक्तिहीन होते थे, न अपने उल्लास से रहित होते थे,
न कांति-हीन होते थे, न परितप्त होते थे, न पलक मारते थे, न उत्साह खोते थे,
और न अपनी क्रुद्ध दृष्टि ही तजते थे । पूर्व की भांति वही क्रुद्ध दृष्टि, वे ही तनी हुई
भौंहें, वही अट्टहास, वही गर्जन, वही वाणी, वही अनुग्रह, वही युद्ध की क्लांति, वही धृति,
और वही हुंकार ? इनसे रहित एक भी सिर उस रण-भूमि में कटकर गिरे हुए रावण
के सिरो में नही दीखता था। जो अट्टहास, जो दर्प और जो रोष-पूर्ण दृष्टि, गिरते हुए सिरो
में दीखते थे, उसी प्रकार के अट्टहास, दर्प एव रोषपूर्ण दृष्टि उगते हुए सिरो में भी दिखाई
पडते थे । दानवेंद्र के सिरो तथा बाहुओ से पृथ्वी तथा आकाश के बीच का भाग भरने
लगा । यह देखकर राम का क्रोध और भी अधिक बढ़ गया, वे लगातार बाणो को
चलाने लगे । तब रावण अपने कटे हुए सिरो तथा बाहुओ को, नये उगे हुए करो से
उठा-उठाकर क्रोधपूर्ण दृष्टि के साथ बड़े वेग से राम पर फेंकने लगा । उसके फेंके हुए
सिर और भुजाएँ राम पर इस तरह आक्रमण करते हुए जान पड़ते थे, जैसे कमनीय वानर-
ग्रह के मध्य विलसित कुमुद-बंधु, षोडश कला-पूर्ण, जगदानंददायक रघुराम-रूपी चंद्र को
देखकर, चंद्र के भ्रम में, कमल-समूह (रावण के सिर) राहु-कोटि (रावण की भुजाएँ) से
युक्त हो, परस्पर सहायता करते हुए, एक साथ आकर उन (राम-रूपी चंद्र) पर आक्रमण
करते हों ।* सिरों तथा करो का एक साथ आना ऐसा लगता था, मानो राम तथा
विजय-लक्ष्मी के विवाह के समय देवताओं ने पल्लव-रत्न-दर्पण तोरण सुंदर ढंग से
सजाये हों । कटते हुए सिर एव विशाल बाहुएँ, बरसनेवाले शर तथा उलूक, काक आदि
खग, पृथ्वी को कंपित करते हुए गगन-मंडल में ऐसे व्याप्त हो गये, मानो यमराज
की सभा का भयंकर वितान हो । इस कारण देवताओ को भी यह मालूम नहीं
होता था कि यह दिन है या रात है या संध्या । प्रख्यात धनुषो एव शरो की दीप्ति
के कारण भूमि में दिन की भाँति प्रकाश व्याप्त था ।
अपनी शक्ति-भर प्रयत्न के पश्चात् भी उस दैत्य को जीतने की किंचित् भी आशा
न देखने के कारण राम शर-संधान का कार्य स्थगित करके बार-बार मन-ही-मन सोचने
*कमल और राहु दोनों चंद्र के शत्रु माने जाते है, इसलिए दोनों मिलकर राम-रूपी चंद्रमा पर
आक्रमण कर रहे थे ।—ले०

लगे कि अविराम गति से इस राक्षस का सिर काटते-काटते तग आ गया हूँ, वाहुओ को काटते-
काटते ऊब गया हूँ, वक्ष स्थल पर बाण चलाते-चलाते थक गया हूँ, बिना रुके शर-प्रहार
करते-करते क्लात हो गया हूँ, फिर भी यह दुष्ट मरता नही है । अब इस दुरात्मा को
कैसे मारूँ ? ऐसे उत्साह-शिथिल होनेवाले राम को देखकर विभीषण ने कहा—'हे सूर्य-
कुलाधीश, ब्रह्मा के वर से, इसकी नाभि में कुंडलाकार में अमृत रहता है । उस अमृत
का प्रभाव उसे मरने नही देता । आप भले ही असख्य बार उसके सिर तथा वाहुओ को
काटें, वे पुन-पुनः उगते ही रहेंगे । उनका उन्मूलन नही होगा। यही कारण है कि
दानवेंद्र विचलित नही होता। आप इस प्रकार लगातार उसके सिरो एव वाहुओ को कबतक
काटते जायेंगे ? इसका अत ही नही होगा, अत आप आग्नेय शर चलाइए । इससे
उसके नाभि-विवर में स्थित अमृत सूख जायगा । तब राक्षसराज स्वय परास्त हो जायगा ।
आपके द्वारा चलाये जानेवाले वाणो से रावण के हाथ और सिर युद्ध में एक सौ नौ बार
उग आयेंगे और उसके बाद उसकी मृत्यु होगी ।
१४६. आग्नेय अस्त्र के प्रयोग से राम का रावण को शक्तिहीन कर देना
तब राम ने विभीषण की विनय, नीति, ज्ञान; स्वामिभक्ति, श्रद्धा तथा पवित्र
भावो को देखकर उसकी प्रशसा की । उसके पश्चात् उन्होने अपने धनुष की प्रत्यचा की
ऐसी ध्वनि की कि देवता हर्षित हुए, रावण विचलित हुआ और गगा आदि नदियां क्षुब्ध हुईं ।
फिर, उन्होने प्रज्वलित वज्रो की वर्षा करनेवाले आग्नेय अस्त्र का सधान करके
चलाया । रावण की नाभि में स्थित अमृत को उस शर की अग्नि में आहुति दी और एक
सौ नौ बार रावण के सिरो तथा वाहुओ को काट डाला । उसके पश्चात् राम ने एक
सौ दसवी बार एक अनुपम बाण चलाकर उसके एक सिर तथा दो वाहुओ को छोड शेष
शिरो तथा वाहुओ को काट डाला । यह देखकर देवता हर्षोन्मत्त हो उठे और वानर हर्ष-
निनाद करने लगे । सिरो के कटने पर, रक्त-धाराओ के पृथ्वी पर गिरते समय, रावण
ऐसा दीख रहा था, मानो प्रलयाग्नि, सभी लोको को जलाकर अपनी लाल लपटो से युक्त
हो जल रही हो । सारे शरीर से रक्त की धाराएँ छूट रही थी । उस समय रावण के
शरीर पर स्थित एक सिर ऐसा दीखता था, मानो अस्ताचल पर स्थित हो सूर्य-विव अरुण
आतप की कातियो को विकीर्ण कर रहा है ।
तब विभीषण को देखकर रावण ने अत्यत क्रोधावेश से कहा—'इसीने राम को
मेरा वह रहस्य वता दिया, जिसे अवतक कोई नही जानता था । इसलिए अव मै पहले
इसीका वध करूँगा ।' इस प्रकार कहते हुए रावण ने भयकर शक्ति को विभीषण पर चलाया,
तब वह शक्ति आकाश-मार्ग से अग्नि-ज्वालाएँ उगलती हुई आनेवाली प्रलयानल की भाँति
विभीषण की ओर आने लगी । तुरत राम ने अविचल भाव से घोर वाण चलाकर बीच
में ही उसे काट डाला । रघुराम की अविराम शर-वृष्टि से राक्षस की क्रोधाग्नि जैसे
नष्ट हो जाती है, वैसे ही उसके शरीरस्थ तेज भी अद्भुत गति मे तिरोहित हो गया । एक सिर
तथा दो वाहुओ को छोडकर रावण के शेष सिर एव भुजाएँ कट गई थी । वीर रस के
महान् प्रवाह की भाँति स्रवित होनेवाली रक्त-धाराओ मे वह सना हुआ था । फिर भी,

४४८ रंगनाथ रामायण
उसने बड़े दर्प से रण-भूमि में रक्त से भीगकर पड़े हुए अपने सिरो तथा बाहुदडो को
निहारा, उनपर चोंच मारनेवाले पक्षी-समूह को देखा, फिर राम की ओर दृष्टि दौड़ाई ।
तब उसने केश नोचने से क्रुद्ध हो वधनों को तोडकर मुक्त होनेवाले सिंह के समान गर्जन
किया, दाँतो को उखाडने से क्रुद्ध होकर आक्रमण करनेवाले उग्र-साँप की भाँति, मूछो
को खीचने से खीजकर दड देने के लिए उद्यत यम की भाँति तथा सारे ससार को एक
साथ निगल जानेवाले के समान क्रोध से उन्मत्त हो, रावण ने भयंकर रूप धारण किया ।
फिर, अपनी पहले की सभी बाहुओ की शक्ति अपनी बची हुई दोनो बाहुओ में संचित
करके भयंकर अट्टहास किया, और अविराम गति से वरछा, तोमर, शूल, परशु, खड्ग, शर,
भाला, शक्ति, गदा आदि चलाते हुए राम को विविध प्रकार से कष्ट दिया, और ऐसे
आश्चर्यजनक साहस के साथ भयंकर युद्ध करने लगा कि देवता भी भयात्तुर हो उठे ।
शक्ति, गर्व एवं यत्न के साथ युद्ध करने

युद्धकाण्ड ४४९
तब राघव के अस्त्र के आघात से रावण के शरीर से रक्त की धाराएँ बहने लगी
और वज्राघात से पृथ्वी पर गिरनेवाले कुलपर्वतो की भांति रावण पृथ्वी पर गिर पडा ।
उस दैत्य के विशाल शरीर के गिरने से पृथ्वी आश्चर्यजनक ढंग से धँस गई । पर्वत भी
धँस गये, दिग्गज दब गये, आदिशेष तथा कूर्म भी खिसक गये । सप्त पातालो के अधिपति
व्याकुल हो गये । हतशेष दैत्य-वीर भयभीत हुए । वानरो ने सिंहनाद किया, अमर,
किन्नर, खेचर आदि राम की स्तुति करने लगे । अप्सराओ ने रघुराम पर पुष्पवृष्टि की,
सारे स्वर्ग में दिव्य दुन्दुभियां, दिव्य काहल एव दिव्य शख बजने लगे । शीतल-मद-
सुगध पवन चलने लगा और दिशाएँ निर्मल हो गईं । इस प्रकार, सुर, मुनि एव खेचरो के
शोक का निवारण करके, समस्त भूमि का भार उतारकर, अपनी इच्छित विजय को प्राप्त
करने के पश्चात् प्रभु राम ने अपने हाथ के धनुष की प्रत्यचा को शिथिल किया और
प्रसन्नचित्त हो उसे लक्ष्मण को सौंपा । समस्त वानर, सभी खेचर, सभी दिक्पाल, सारे
भूपति, समस्त भूत, सभी देवता, सभी गन्धर्व, सभी सन्मुनि, सभी पन्नग, सकल सिद्ध एव
सभी लोक तब राम की प्रशसा करने लगे । उस समय युद्ध में अन्धकासुर का वध करके
शोभायमान होनेवाले धूर्जटि (शिवजी) के समान राम, लोकाभिराम, विजयधाम एव
नवसुधा-धाम की भांति सुशोभित हुए ।
१४८. विभीषण का शोक
तब विभीषण अत्यधिक शोक से सतप्त होते हुए युद्ध में गिरे हुए अपने अग्रज को
देखकर बार-बार ऊँचे स्वर में विलाप करने लगा—"हाय, सुरासुरो के लिए भयप्रद, युद्ध-
भयंकर, तुम्हारी ये भुजाएँ आज पक्षियो के वशीभूत हो गईं, अत्यन्त कोमल शय्या पर लेटने-
वाला यह शरीर आज कठोर युद्धभूमि पर गिरा हुआ है । शत्रु-रूपी अन्धकार के लिए
बाल-सूर्य की भांति ये मणिमय किरीट आज मिट्टी में मिल गये ! हे बन्धु ! विक्रम, विनय,
नय तथा कीर्त्ति में तुम्हारी समता कोई नहीं कर सकता था । ऐसे तुम, घोर पापो में
प्रवृत्त होने के कारण क्रूर, पापी एव उद्धत कहलाने लगे । नीति-च्युत होना बुरा है, यह
तुमने कभी सोचा ही नहीं । मेरी बातो पर तुमने ध्यान नहीं दिया, प्रशस्त नीति-मार्ग
को तुम पहचान नही सके । जानकी को राम के सुपुर्द करने के लिए मैने परामर्श दिया,
किन्तु तुम ऐसा नही कर सके । मैने तुम्हें समझाया था कि तुम राम को साधारण मानव
मत समझो, किन्तु तुमने मेरी बातो की अवहेलना कर दी । तुम्हारे अभिमान तथा गर्व ने
ही आज तुम्हारी ऐसी दशा कर दी । अब मैं तुम्हारे लिए कैसे शोक करूँ ? क्या मैने
तुमसे नहीं कहा था कि राम के साथ वैर करना उचित नहीं है, उसे (वैर) छोड दो । हे अनुपम
नीति-सम्पन्न ! क्या, तुम्हारे जैसे सुकृति के लिए परस्त्री को माता के सदृश नही मानना चाहिए ?
तुमने उचित-अनुचित का विचार ही नहीं किया । अन्त में मेरे वचन ही सत्य सिद्ध हुए ।" इस
प्रकार, वह अपने अग्रज के अपराधो का स्मरण करके बार-बार शोक करने लगा ।
१४९. मृत रावण के निकट मंदोदरी का आना
तब मदोदरी आदि दनुज-वधुएँ उमडती हुई शोकाग्नि में जलती हुई, अपने मुखों
तथा छातियो को पीटती हुई तथा उच्च स्वर में रुदन एव विलाप करती हुई लका से
५७

युद्ध-भूमि की ओर मन्द गति से चल पड़ीं। उनके चलते समय, उनके चरणों की अरुण
कान्ति पृथ्वी पर पड़ रही थी, लड़खड़ाकर चलने से उनकी मेखलाएँ शिथिल हो रही थीं;
उनकी क्षीण कटियाँ अवश हो झुकी जा रही थी, हृदय के शोक-भार से उनकी
तनु-लताएँ काँप रही थी; उनके कठ-हार टूट रहे थे, आँखो से आँसू का प्रवाह भर
रहा था, उनके आँचल खिसक रहे थे, वेणियाँ खुलकर पीठ पर डोल रही थी और उनके
मुख कान्तिहीन हो गये थे । अपनी रुदन-ध्वनि से समस्त आकाश को गुँजाती हुई वे
युद्ध-भूमि में पहुँची। उस समय वह रण-भूमि टूटे हुए रथ, छिन्न-भिन्न होकर पड़े हाथी के
कुंभ-स्थल, कटे हुए सिर, पैर एव शरीर, चूर-चूर बने हुए हाथी के दाँत, कुचले हुए सिर,
टूटी हुई गदाएँ, चूर्ण बने हुए कवच, कटे हुए वक्ष, उखड़े हुए मस्तक, फटे हुए कठ, भग्न
हुए शस्त्र, आँतो की राशियाँ, माँस-खड, मृत पड़े हुए गज, खण्डित अश्व, पर्वत-श्रृंग, एक
दूसरे पर पड़े हुए धड़, अजस्र बहनेवाली रक्त की नदियो में बहनेवाली हाथी के शुंड,
पर्वतो के नीचे गिरकर दब जाने से निकली हुई आँखोवाले सैनिक तथा कठोर ध्वनि करते
हुए शवो पर मँडरानेवाले अनेक काक, घूक, कक, गीध आदि से भरी हुई थी।

इतना ही नही, उस युद्ध-भूमि में अनेक भूतो का सचार होने लगा था। कुछ
भूत राम के बाणो के आघात से बहनेवाले रक्त-प्रवाह का पान करते हुए उसे सोमपान
समझकर झूमते थे। कुछ भूत राम को धोखा देकर सीता को ले आनेवाले राक्षसेन्द्र
की प्रशसा करते थे, कुछ रावण के दस सिरो एव बीस हाथो को उसके धड़ में यथा-
स्थान जोड़कर मृत रावण के शरीर को देखकर कह रहे थे कि हे दैत्येन्द्र, तुम्हारे लिए
यह अनुचित है, तुम सीता को राम के सुपुर्द कर दो। कुछ भूत वानरो के शरीर में
प्रविष्ट होकर, वानर बनकर हाथी के धडो को ले आते और रक्त-समुद्र में डालकर बड़े
यत्न से सेतु बाँधने में तत्पर दिखाई देते थे। कोई भूत कहता -- 'मै नारायण हूँ। तुम
देवता हो, तुम राक्षस हो।' फिर, वे हाथी के धड पर आँतो को वासुकि के समान लपेटते
और उस धड को रक्त-समुद्र में डालकर मथने लगते (मानो वे समुद्र-मथन की पुनरा-
वृत्ति कर रहे हो)। कुछ भूत इन्द्र की ओर देखकर हँसते हुए कहते -- 'हमारे राम के
बाणो से अच्छी तरह मथे हुए मास को लेकर उसके बदले हमें स्वर्ग क्यो नही देते ?
क्यो बकरी के थोडे मास-खण्डो के बदले स्वर्ग देते हो ?'* कुछ भूत यह कहते हुए नाच रहे थे
कि शक्ति-सपन्न कुमार एव तारकासुर की युद्ध-भूमि भी हमने देखी थी, भीषण गति
से युद्ध करनेवाले शिवजी तथा अन्धकासुर की रण-भूमि भी हमने देखी थी, इन्द्र तथा
वृत्रासुर का रण-क्षेत्र भी हमने देखा था, किन्तु इतने मास-खण्ड, इतने धड, ऐसा रक्त-
प्रवाह ऐसी विविध स्वादिष्ट वस्तुएँ हमने अबतक कभी नही देखी। कुछ भूत रवि-कुला-
धिप राम के विक्रम की भूरि-भूरि प्रशसा करते थे, कुछ भूत कहते थे कि 'राम का
विक्रम भी क्या, हमारी प्रशसा के योग्य है ?' इसने तो युद्ध में उस दशकठ का वध
कर डाला, जो भयंकर युद्ध करके, श्रेष्ठ रक्त-मांस आदि से हमें तृष्ट किया करता था,


*यज्ञ के समय इन्द्र को बकरी के मांस की जो बलि दी जाती है, उसी की ओर
संकेत है।

अब हमें वह भाग्य कहाँ मिलेगा ? कुछ भूत ऊँचे ध्वज-दण्डो को खडा करके, उनमें आँतो
के झूले डालकर बडे मोद से अपनी स्त्रियो के साथ उनपर झूलते हुए सरस आनन्द का
अनुभव करते, कुछ भूत हड्डियो तथा शरो को एक ओर हटाकर, एक विशाल स्थान बना
लेते और अपने प्रिय जनो तथा प्रेमिकाओ के साथ आराम से बैठकर रक्तपान करते हुए
आनन्दित होते थे और सतुष्ट हो आशीर्वाद देते थे कि सीता के साथ राम सुखी रहे ।
ऐसे भूत-समूह से भरे, भयंकर दिखाई देनेवाले उस युद्ध-क्षेत्र में राक्षस-वधुएँ रोती-
कलपती तथा बार-बार पति को पुकारती हुई पहुँच गईं । वहाँ उन्होने अनुपम रीति से
व्याप्त राम की शर-चन्द्रिकाओ से व्याकुल होकर वीर-लक्ष्मी के विरह की अग्नि से दग्ध
होकर पृथ्वी पर गिरे हुए दशकठ को देखा । कटी हुई तथा रक्त से भीगी हुई उसकी
विशाल भुजाएँ ही उसके लिए शीतलोपचार के योग्य किसलय-शय्या के समान थी । उसके
मुकुट की अकल्क मणियो की अरुण कान्ति उसके सारे शरीर पर व्याप्त हो धातु के वस्त्रो
के समान दीप्त हो रही थी । उसके सिर की मज्जा सारे शरीर में व्याप्त होकर चन्दन-
लेप की भाँति दीख रही थी । (राम के) घोर प्रहारो के फलस्वरूप उसके शरीर-भर में
व्याप्त अस्थियो का चूर्ण, अनुपम पुष्प-रज के समान दीखता था । टूटकर झुके हुए रथ
के ताल-सम ऊँची ध्वजाएँ तथा रावण के कोमल एव विमल दुकूल-खण्ड, (पवन में हिलते
हुए) झलनेवाले पंखो के समान दीखते थे । चारो ओर पृथ्वी पर विकीर्ण हो पडे हुए,
गज-मुक्ताफल उपचार के निमित्त उपयोग में लाने के पश्चात् बिखरी हुई मल्लिका की
कलियो के समान दीखते थे । इस प्रकार मृत पडे हुए रावण को देखकर शोक-सागर की
तरगो में डूबी हुई दानव-वधुएँ दनुजेश्वर के शरीर पर गिर पडी ।
१५०. मन्दोदरी का विलाप
तब मन्दोदरी पति के मृत शरीर पर गिर पडी और उमडते हुए शोक-सागर को
पार करने में असमर्थ होकर आँखो से अविराम अश्रु-धारा बहाती हुई बार-बार ऊँचे स्वर
में यो विलाप करने लगी—'हे राक्षसेश्वर, हे वीरवर, हे रणालकार, हे नाथ, " फिर
उसने अपने शोक एव क्लान्ति को प्रकट करते हुए बार-बार विलाप किया और उसके
पश्चात् यो कहने लगी--"हे लंकेश ! आज सूर्य-रश्मियाँ निश्शक होकर आपकी लका में पहुँच
गई हैं । इन्द्रादि देवता यह सोचकर आनन्दित हो रहे हैं कि अब अच्छा अवसर मिल
गया हैं । आपने इन्द्र को जीता, अग्नि को जीता, यम को जीता, नैर्ऋत को जीता, वरुण
को परास्त किया, पवन को हराया, कुबेर को जीता और ईशान को भी परास्त किया
और समस्त लोको पर अपनी प्रभुता जमाई । आप कही भी दुर्वार थे, आपकी यह
दुर्दशा कैसे हुई ? क्या आपसे भी अधिक बलवान् कोई उत्पन्न हुआ ? मैने आपसे कहा था
कि आप राम को सीता लौटा दीजिए, आपका यह कार्य उचित नही है, राघव
स्वय नारायण हैं, वे नर नही हैं । किन्तु मेरी बातें आपने नही सुनी । भला, आपका
दुर्भाग्य आपको मेरी बातें सुनने क्यो देता ? हे दशकठ, पहले तपस्या करते ममय आपने
अत्यधिक निष्ठा से अपनी इन्द्रियो का दमन किया था । कदाचित् उन्ही इन्द्रियो ने सीता
को ले आने के लिए आपको प्रेरित किया और युद्ध में सूर्यवशज (राम) से आपका वध

४५२ रंगनाथ रामायण
कराया । देवताओ के लिए दुर्भेद्य इस लका में हनुमान् ने अकेले प्रवेश किया । बिना
प्रयास के समुद्र पर सेतु बाँधना क्या वानरो के लिए सभव था ? मेने उसी समय कहा था
कि ये देवता है (वानर नही) । जनस्थान में राम ने अकेले अपने बाहुवल से खर-
दूषण आदि अनेक राक्षसो का सहार किया था । उस दिन से आपको देखकर और राम
का स्मरण करके में भयभीत होती रहती थी । वह मेरा भय आज पूर्णतया सत्य सिद्ध
हुआ । सारा ससार उसी दिन जान गया कि धर्मपरायणा अरुंधती से, निर्मल-मति-सपन्न
रोहिणी से, अत्यधिक उज्ज्वलगुणवती भूदेवी से भी अधिक सहनशील एव पुण्य-साध्वी
जानकी को जिस दिन आप ले आये, उसी दिन आप उस देवी की क्रोधाग्नि से झुलस गये।
जो व्यक्ति जैसा कर्म करता है, वह अवश्य ही वैसा फल पाता है । अत्यन्त नीति-सम्पन्न
विभीषण पुण्यात्मा है, इसीलिए वह अतुल सुख को प्राप्त कर सका । समस्त लोको को
पीडित करनेवाले आप पापात्मा की ऐसी दुर्दशा हुई । सीता देवी से भी अधिक सौभाग्य-
सपन्न कितनी ही सुन्दर कामिनियाँ है ? किन्तु काम-रूप अन्धकार ने आपके नयनो को
ढक लिया था, इसलिए आप उन्हें पहचान नही पाये थे । कुल, रूप, दाक्षिण्य, गुण एव कला
में वैदेही किसी भी प्रकार मेरी समता नही कर सकती । मैं नही कह सकती थी कि वह
आपकी दृष्टि में मुझसे श्रेष्ठ दीख पडी या मेरे समान दीख पडी । यह सत्य है कि जीवो
की मृत्यु किसी-न-किसी निमित्त से होती है । दूर की मृत्यु को समीप लाने के समान
आप वैदेही को ले आये । भाग्यवती सीता ने पति से मिलकर योग्य सुख को प्राप्त किया।
हे नाथ, मुझ अभागिन की ओर निहारिए, मै दुख-समुद्र में डूब रही हूँ । आपके साथ
पुष्पक विमान पर आरूढ हो मैने मदराचल, धवलगिरि, कनकाद्रि, विशाल नन्दनवन आदि
स्थानो में बडे उल्लास से लीला-विहार किया था । हाय ! वे सभी विनोद मुझे सालने के
मिस मेरे प्राण ले रहे है । हे नाथ, मै गर्व करती थी कि मेरे पिता मय हैं, मेरे पति
रावण है, और मेरा पुत्र, युद्ध-प्रेमी इन्द्रजीत है । किन्तु मै जानती नही थी कि युद्ध में
राम-भूपाल के हाथो से आपका वध हो जायगा । वज्र-पात से गिरकर नष्ट होनेवाले
पर्वत की भांति आप चूर-चूर होकर पृथ्वी पर गिर पडे हैं । आप 'मृत्यु के लिए' मृत्यु-
समान थे, पर आज पृथ्वी पर गिरकर मृत्यु के वश में हो गये । आप शत्रु-स्त्रियों को
वैधव्य देते थे, आज आपकी पत्नियो को उसका फल मिल गया ।"
इस प्रकार, रोती, विलाप करती हुई मदोदरी, कभी असुरेन्द्र का मुख देखकर उसका
वर्णन करती, कभी आँसू गिराती, कभी अपनी गोद में रावण का सिर रख लेती, कभी
अपने अश्रु-जल से रावण के मुख की धूलि धोती, कभी खिन्न होती, कभी रावण का हाथ
अपने अरुण हाथो में ले लेती । वह इस तरह फूट-फूटकर रोने लगती कि शोकतप्त हृदय
फट जाय । वह अपने प्राणेश्वर का सिर बायें हाथ में उठाकर थाम लेती । उसे देखकर
अपना सिर कँपाती । दाहिना हाथ पृथ्वी पर फटकारकर कहती--'हाय तुम चल बसे ।'
कभी कहती--'राम-भूपाल क्या ऐसा भी करते है । अब मैं क्या करूँ ?' कभी छटपटाकर
पृथ्वी पर लोटती और अपनी दीन दशा का विचार करके अत्यन्त दुखी होती ।
अपनी भाभी को अनन्त शोकाग्नि में इस प्रकार दग्ध होते देखकर विभीषण उसके

युद्धकांड ४५३
चरणो पर गिरा और उमडते हुए शोक से कहने लगा—'हे साध्वी, अत्यधिक वेग से
उमडनेवाला रावण-रूपी समुद्र रघुराम की बाणाग्नि में सूख गया है। राघव-रूपी प्रलय-
मारुत ने रावण-रूपी सरस पारिजात को गिरा दिया है। राघव-रूपी भयकर दावानल ने
दशानन-रूपी कानन को भस्म कर दिया है। राघव-रूपी पश्चिम समुद्र में रावण-रूपी
दिवाकर अस्त हो गया है। राघव-रूपी अमोघ नील मेघ की शर-वृष्टि ने रावण-रूपी
अग्नि को बुझा दिया है।'
१५१. राम का विभीषण के द्वारा रावण की अंत्येष्टि कराना
इस प्रकार, विविध रीतियो से शोक-सन्तप्त होनेवाले विभीषण को देखकर काकुत्स्य ने
कहा—'हे विभीषण, अब इन स्त्रियो का दुःख दूर करो और तुम भी अब शोक करना छोड़ दो।
युद्ध में शूर, शत्रुओ पर आक्रमण करके उनके हाथो से मरते हैं और शत्रुओ को
मारते हैं। समर में दोनो पक्षो की विजय तो होती नही, न जय-पराजय ही स्थिर वस्तु हैं।
रावण ने समस्त देवताओ को जीत लिया था, सभी दिक्पालो पर विजय प्राप्त की थी।
यह एकाकी वीर है, महान् साहसी है, अद्वितीय विजयी है और त्रिलोक-भयकर है।
मैंने तो देखा ही है कि तुम्हारे अग्रज ने रण में कैसी शक्ति दिखाई थी। कौन ऐसा है,
जो इस प्रकार अविचल युद्ध कर सकता है ? कौन ऐसा है, जो अन्त में ऐसी मृत्यु को
प्राप्त करेगा। ऐसी शक्ति तथा ऐसी मृत्यु दूसरो के लिए असम्भव है। हे अनघ, तुम्हारा
अग्रज कृतार्थ हुआ। अब शोक करने की आवश्यकता नही है। इसलिए अब धैर्य धारण
किये हुए इस दनुजेश्वर की अत्येष्टि-क्रिया का प्रबन्ध करो।'
तब भयभीत हो विभीषण ने अत्यन्त भक्ति के साथ हाथ जोड़कर कहा—'हे देव,
अब इसके लिए क्रिया-कर्म की क्या आवश्यकता है ? यह मेरा अग्रज ही कहाँ है ? यह
तो मेरा शत्रु है। आपकी पत्नी को यह क्रूर, नीच एव दुष्ट यहाँ हर लाया था, अब इसके
लिए क्रिया-कर्म कैसा ? पर-वधुओ का स्पर्श-मात्र करनेवाले पुरुष अधोगति को
प्राप्त होते हैं। ऐसे लोगो का स्पर्श करना भी उचित नही है। उनको देखना भी
नही चाहिए। इस पापी को मैं छू भी नही सकता। यह वैदिक कर्म के लिए योग्य
नही है।'
विभीषण की इन वातो पर मन-ही-मन विचार करने के पश्चात् राघव ने विभीषण
को देखकर कहा—'हे अनघ, तुम्हारी वातें सच हैं, किन्तु अब दनुजेश्वर की निन्दा नही
करनी चाहिए। उसने युद्ध-रूपी गंगा-प्रवाह में अपने सभी पापो को धो दिया है। मेरे
सभी कार्य सम्पन्न हो गये। मृत्यु के पश्चात् वैर रखना उचित नही है। अत, तुम निष्ठा
के साथ रावण की अन्त्येष्टि-क्रिया करो।' तब विभीषण ने उनका आदेश स्वीकार करके
वेद-विधियों का अनुसरण करते हुए अग्नि-त्रय को मँगाया और एकनिष्ठ हो अपने अग्रज
का अग्नि-संस्कार किया। उसके पश्चात् बड़ी श्रद्धा से उसकी अत्येष्टि-क्रिया पूरी की।
क्रिया-कर्म में निवृत्त होने के पश्चात् उसने आकर रामचन्द्र के चरणो में प्रणाम किया।
तब उस विमलात्मा को देखकर राम ने मिष्ट भाषण से उनका आदर किया और दयार्द्र
हो उसे सांत्वना दी।

४५४ रंगनाथ रामायण
१५२. विभीषण का राजतिलक
तत्पश्चात् राम ने अपने अनुज को देखकर अनुपम करुणाद्रं चित्त से कहा--'हे
लक्ष्मण, तुम लंका में प्रवेश करके इस पुण्यात्मा विभीषण का राजतिलक सम्पन्न करके
आओ।' रामानुज बड़ी प्रीति के साथ लंका में गये; वानर-श्रेष्ठो को भेजकर समुद्र-जल
मँगाया। राक्षस-पुरोहितो तथा सज्जन मन्त्रियो को बुलवा भेजा और मंगल-वाद्यो के विपुल
नाद के बीच, विभीषण को अभिषिक्त किया और मंगलोपचार के साथ उसे सिंहासन पर
आसीन किया। इस प्रकार, बड़े हर्ष के साथ उसे लंका का राजा बनाकर लक्ष्मण ने
आशीर्वाद दिया कि 'जबतक रवि-चन्द्र, पृथ्वी, कुलपर्वत, आकाश-समुद्र और सभी दिशाएँ रहेंगी,
जबतक राघव का कीर्त्ति-गान इस पृथ्वी पर होता रहेगा, तबतक तुम इस राज्य पर
शासन करते रहो। राक्षस-राज्य का वहन करना और उसका सचालन करना दुर्लभ कार्य हैं।
अतः, तुम सावधान होकर इसका सचालन करो और शाश्वत धर्म का पालन करो।'
तब विभीषण विशाल राज्य-प्राप्ति के आनन्द में इतराते हुए मगल-द्रव्य, आभूषण, वस्त्र
एवं अमूल्य मणिसमूह साथ लिये हुए लक्ष्मण के साथ राम की सेवा में उपस्थित हुआ
और उन वस्तुओ को राम के चरणो में समर्पित करके बड़ी भक्ति के साथ प्रणाम किया।
रघुराम ने वे वस्तुएँ मातलि को भेंट के रूप [में दी और बड़ी प्रीति से उसे
विदा दिया। मातलि ने रथ पर आरूढ हो वेग के साथ स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया।
उसके पश्चात् राम ने मन में विचार करके मारुति को देखकर कहा--'तुम शीघ्र लंका में
प्रवेश करके जानकी को हमारी विजय तथा कुशल का वृत्तांत सुनाओ।'
१५३. हनुमान् का सीता को राम की विजय का समाचार देना
राम का आदेश पाकर हनुमान् अत्यन्त हर्षित हुआ और बडे वेग से लंका में प्रवेश
किया। राम की विजय की मन-ही-मन कामना करती हुई, अशोक-वन में बैठी
राम की पत्नी को देखकर हनुमान् ने उनको प्रणाम किया और अत्यन्त विनय से कहा--'हे कल्याणी,
मैं आ गया हूँ और आपके लिए हर्ष का समाचार लाया हूँ। जो आप चाहती थी, वही हुआ।
हे देवी, आपके पति राम देव ने लोक-भयंकर रावण का सहार किया और अनेक
दुष्ट राक्षसो का नाश करते हुए अद्भुत रीति से युद्ध किया। वे अब अपने अनुज सौमित्र
के साथ सकुशल हैं।' इसके पश्चात् उसने उस साध्वी की चिन्ता को दूर करते हुए,
इसके पहले कहे गये वचनो का स्मरण दिलाते हुए कहा--'हे कल्याणी, मैने आप से पहले
ही निवेदन किया था कि आप के पति समुद्र पर सेतु बाँधेंगे, [लंका पर आक्रमण करेंगे,
और रावण का संहार करके आपको अपनायेंगे। वे वचन आज सत्य हो गये हैं। अब मैं
आपकी आज्ञा चाहता हूँ। मेरे योग्य सेवा का आदेश दीजिए।'
तब पवन-पुत्र को देखकर तथा रावण का मरण और रघुराम की विजय को
सोचकर हर्ष के साथ वे बोली--'हे अनघ, तुम्हारे प्रताप की सहायता से ही राम भूपाल ने
यह कार्य संपन्न किया है। दैत्यो के गर्वान्धकार से आवृत इस लंका में प्रवेश करके इसे
साधना, दूसरो के लिए कहाँ संभव था ? तुम्हारे धैर्य, गंभीरता, महान् शौर्य, माधुर्य एवं
सद्गुणो की महिमा की प्रशंसा कैसे करूँ ? तुम्हारे शील एवं पराक्रम की सराहना मैं कैसे करूँ ?

असंख्येय, नवाभरण, श्रेष्ठ वस्त्र, स्वर्ग और रत्नो से युक्त राज्य तुम्हें भेंट दूँ, तो भी
वह तुम्हारे वीरतापूर्ण कार्यों के लिए अल्प ही होगे । हे पवनपुत्र, तुम्हारे कार्य से मैं
अपने मन में बहुत संतुष्ट हूँ ।'
सीता की बातें सुनकर हनुमान् अत्यत हर्ष से कहने लगा--'हे माता ! आप मुझपर
इतनी करुणा-पूर्ण दृष्टि रखती है और मेरा इतना आदर करती है, यही मेरे लिए पर्याप्त है ।
सच तो यह है कि (आपका आदर प्राप्त करना ) इन्द्र-पद या किमी दूसरी वस्तु
से भी महान् है । तब भूमिसुता ने हनुमान् को देखकर कहा--'हे अनघ ! तुम्हें बल,
शौर्य, पराक्रम, अपार तेज, क्षमा, ज्ञान, उदारता, स्थैर्य, सतत निश्चल स्वामिभक्ति, विनय
आदि विश्रुत गुण प्राप्त हो ।' इसके पश्चात् हनुमान् ने उस देवी के निकट रहनेवाली
भयंकर आकारवाली राक्षसियो को देखकर कहा--'उस पापात्मा की आज्ञा का पालन करती
हुईं ये पापी स्त्रियाँ कदाचित् आपको हानि पहुँचायेंगी । मैं अभी इन्हें अपनी कठोर मुष्टि-
प्रहार से मार डालता हूँ ।' तब जानकी ने हनुमान् को देखकर कहा--'बाण चलानेवाले के
रहते हुए भला बाण को दोषी ठहराना क्या उचित है ? दासियो का वध करना कदापि
उचित नही । मैंने अपने पापो के फलस्वरूप यह सब विपत्ति पाई । इसके लिए ये कैसे
दोषी हो सकती है ? हे पुण्यचरित, महान् व्यक्ति पापियो पर भी दया दिखाते है ।
अत हे वानरोत्तम, इन राक्षसियो का मारना तुम्हारे लिए उचित नही है ।' तब हनुमान् ने
कहा--'हे देवी ! आप निर्मल गुण-रत्नो की निधि है । आप राम की धर्म-पत्नी बनने के
योग्य है । अब मुझे राम की सेवा में जाने की आज्ञा दीजिए ।' तब उस देवी ने कहा--
'हे वानरोत्तम, अबतक उन्ही को मैं अपनी आत्मा मानकर अपने प्राण रोके हुई हूँ ।
अब मैं उन्हें देखे बिना एक क्षण भी नही जी सकती । यह बात मेरे प्रभु को बतलाना ।
अब तुम जाओ ।' इस प्रकार कहने के पश्चात् उन्होने हनुमान् को आशीर्वाद दिया ।
हनुमान् ने बडी भक्ति से उन्हें प्रणाम किया और राम भूपाल के निकट पहुँचकर अत्यत
विनय से निवेदन किया कि हे देव, मैने आपकी विजय तथा कुशल का वृत्तांत देवी सीता
से निवेदन किया, तो वे बहुत हर्षित हुई । उन्होने मुझसे कहा कि तुम मेरी ओर से प्रभु
से निवेदन करना कि मैं उनके दर्शनो की अभिलाषिणी हूँ ।
१५४. राम के आदेश से विभीषण का सीता को लिवा लाना
तब राम ने थोडी देर तक मन-ही-मन सोचा और विभीषण को बुलाकर कहा--
'हे विभीषण ! तुम शीघ्र जानकी के मगल-स्नान का प्रबन्ध करो और दिव्य वस्त्राभरण
एव पुष्प-मालाओ से अलकृत कराके उन्हें यहाँ लिवा लाओ ।' तब उसने बडे हर्ष से
जाकर सरमा आदि अपने अन्त पुर की स्त्रियो से सारी बातें समझाकर जानकी को लिवा
लाने का आदेश दिया । वे भी बडी प्रीति से सीता के पास गई और उन्हें बडी भक्ति
के साथ प्रणाम करके कहा--'हे देवी, आपके पति राम देव ने विभीषण को, आपको
लिवा लाने की आज्ञा दी है । इस हेतु उन्होने हमें आपकी सेवा में भेजा है । आप प्रसन्न
होकर अभीष्ट मगलदाता राम के समक्ष पधारें । हे सुन्दरी, आप यह वेश तज दीजिए ।
आप तो शुभ-प्रदायिनी हैं ।' इस प्रकार कहने के पश्चात् उन्होने उनका मंगल-स्नान कराया,

४५६ रंगनाथ रामायण
उनकी तनुलता को पोंछकर दिव्य वस्त्रों से उन्हें सजाया, दिव्य मालाएँ और दिव्य आभूषणों
से उन्हें अलंकृत किया और उसके पश्चात् स्वर्ण-पालकी में बिठाकर उन्हें ले चलीं । तब
राक्षसेश्वर विभीषण बड़ी भक्ति के साथ राजचिह्न तथा वेत्र धारण करके अपने-आपको धन्य
मानते हुए, एक सेवक के समान प्रमुख राक्षसों के साथ पालकी के आगे-आगे चलने लगा । राम के
निवास से थोड़ी दूर पर पालकी को रोककर विभीषण राम की सेवा में उपस्थित हुआ और
हाथ जोड़कर नम्रता से बोला--'देव, लिवा लाया हूँ, देवी को ! देवी यहाँ पधारी हुई हैं ।'
तब राम ने अत्यन्त हर्ष, रोष एवं दैन्य से अभिभूत हो, मन में विचार कर
विभीषण से कहा--'लिवा लाओ ।' तब परम पावन तथा ज्ञानी विभीषण पावन-चरिता सीता को
बड़ी श्रद्धा से लिवा ले चला । उस समय राक्षसों एवं वानरों की भीड़ (सीता के दर्शनों
की तीव्र उत्कण्ठा से) उमड़-उमड़कर मार्ग को रोकने लगी । तब विभीषण निर्दय होकर अपने
हाथ की बेंत से उनपर कसकर प्रहार करने लगा । इस कारण से भीड़ में उठनेवाले आर्त्त-
नाद को सुनकर राम ने विभीषण से कहा--'हे विभीषण ! ऐसा भयंकर कार्य क्या तुम्हारे
लिए उचित है ? अब इनमें से हमारे लिए पराया कौन है ? अपनों को इस प्रकार दुःख
क्यों पहुँचाते हो ? उन्हें रोको मत । सभी लोग आकर देखें । इसमें बुरा क्या है ? (स्त्री
के लिए) कालान्तर एवं देशान्तर में नष्ट न होनेवाला एक शील ही गोपन की वस्तु है ।
ये विशाल दुर्ग, भवन, पर्दे आदि कभी स्त्रियों के लिए उचित आवरण नहीं हो सकते ।
व्यसनों में, विवाहों में, युद्धों में, मित्रों में और उत्सवों में स्त्रियों के लिए आवरण अनावश्यक है ।
मैं यहाँ हूँ और यह रण-भूमि है । अतः, इसमें कोई दोष नहीं है; उन्हें आने दो ।'
तब राम के आदेशानुसार विभीषण सीता को लिवा लाया । उस समय कल्याणी
सीता का शरीर स्वेद-बिन्दुओं से ऐसे आप्लावित हो रहा था, मानो उनके हृदय में उमड़ता
हुआ आनन्द (हृदय से) छलककर सारे शरीर में व्याप्त हो गया हो । उन्होंने राका-शशि
रामचन्द्र के दर्शनामृत का पान करके चिरविरहाग्नि को शान्त किया और परम-अनुराग से
भरी हुई अपने मन की उत्कंठ इच्छा से प्रेरित हो राघव को देखने लगीं । राघव को
देखते ही उनके धवल-लोचन-उत्पलों से अश्रु-प्रवाह उमड़ आया । वे भय, प्रीति एवं व्रीड़ा
से अभिभूत होकर सिर झुकाये खड़ी रहीं ।
तब रघुराम का मन क्रोधावेश से भर गया । उन्होंने उस रमणी को देखकर
कहा--'हे नारी, पुण्यशीला स्त्रियों के लिए लज्जा ही प्राण है । हे लज्जावती, प्रतिष्ठा
की रक्षा का विचार करके मैंने तुम्हें मुक्त किया है । इसके सिवा मेरे हृदय में तुम्हारे
प्रति कोई आसक्ति शेष नहीं है । काकुत्स्थ-वंशज धैर्य के धनी होते हैं, लोक-रक्षण-तत्पर होते हैं,
तथा लोक-प्रशंसा के योग्य होते हैं । उनके वंश में जन्म लेकर (यदि मैं तुम्हें ग्रहण
करूँ, तो) लोग कहेंगे कि मैंने अपने औचित्य को त्याग दिया । शत्रु के घर में रही हुई
तुम्हारा स्पर्श करके तुम्हें अपनाना धर्म-संगत नहीं हो सकता । इस भय से कि लोग यह
न कह बैठें कि यह अपनी पत्नी को खो बैठा और उसे छुड़ाकर नहीं ला सका, मैंने
तुम्हें छुड़ाया है । इसके सिवा तुम्हें लाने का मेरा कोई दूसरा उद्देश्य नहीं है । मैं तुम्हें
स्वीकार नहीं कर सकता । तुम जहाँ चाहो, जा सकती हो ।'

राम के इन निष्ठुर वचन-बाणों के लगने से सीता तिलमिला उठी । वह कमलाक्षी
सद्य प्राप्त आनन्द को भूल गई और अवाक् एवं स्तम्भित-सी रह गई । क्षोभ, दुःख एवं
क्रोध से अभिभूत हो, वे रामचन्द्र को देखकर गद्गद कंठ से कहने लगी—'हे देव, क्या आप
मेरा हृदय नहीं जानते ? क्या, आप सर्वज्ञ एवं मनीषी नहीं हैं ? बाल्यावस्था में आप मुझे
ले आये और तब से मेरा पालन-पोषण तथा रक्षण करते रहे । आप ऐसे कठोर वचनों से
मुझे क्यों दुःखी बना रहे हैं ? मैं कहाँ, आप कहाँ और आपके ये वचन कैसे ? मैंने भू-
माता के गर्भ से जन्म लिया, उसके पश्चात् महाराज जनक ने मुझे पाल-पोसकर बड़ा
किया, फिर आप-जैसे नृप-शिरोमणि की पत्नी हुई । क्या, चंचल चित्तवाली स्त्रियों का-सा
व्यवहार मेरे लिए कभी सह्य हो सकता है ? पुरुष, अविश्वसनीय स्त्रियों के प्रति जैसे वचन
कहते हैं, वैसे वचन आप मेरे प्रति कह रहे हैं । क्या, यह आपके लिए उचित है ? यदि
आपको मुझपर विश्वास नहीं था, तो जिस दिन मेरा पता जानने के लिए हनुमान् को भेजा था,
उसी दिन कहला भेजते, तो उसी दिन मैं अपनी सभी आशाओं को तजकर प्राण
त्याग देती ।'
इसके पश्चात् सीता ने लक्ष्मण को देखकर कहा—'हे अनघ, तुम्हारे अग्रज मुझपर
संदेह करके मेरे प्रति परुष वचन कह रहे हैं । क्या मेरे प्रति ऐसा व्यवहार उचित है ?
क्या, ऐसी बातें वे मुझे कह सकते हैं ? क्या, तुम्हें उनसे यह कहना नहीं चाहिए कि ऐसे
वचन कहना उचित नहीं है ? मेरा आचरण देखते हुए, क्या, तुम मुझमें किसी पाप का
अनुमान कर सकते हो ?'

१५६. सीता का अग्नि-प्रवेश

वे आगे कहने लगीं—'अब शंका मत करो । तुम भली भाँति विचार करो और
यदि तुम लोगों का यही निश्चय है, तो यहाँ चिता सजाओ । मैं सबके समक्ष, बिना
विचलित हुए अग्नि में प्रवेश करूँगी । अग्नि के द्वारा मैं अपनी पवित्रता का प्रमाण दूँगी
और ब्रह्मादि देवताओं की प्रशंसा प्राप्त करते हुए भूमि में प्रवेश कर जाऊँगी ।'
तब लक्ष्मण ने बड़ी व्याकुलता से अपने अग्रज की ओर देखा और उनके मन के
भावों को समझकर सीता के लिए चिता का प्रबन्ध किया । तब सीता ने बड़ी भक्ति से
चिता की परिक्रमा की और उसकी स्तुति करके, उसे प्रणाम किया । फिर, अग्निदेव के
समक्ष खड़े होकर हाथ जोड़े हुए वे कहने लगी—'हे धर्मादि देवताओ, हे धर्मों, हे निर्मला-
त्माओ, हे नियतात्माओ, हे जगत् के अधिष्ठाताओ, हे सूर्य-चन्द्र, हे वेदसाधको, हे वेदों,
हे महात्माओ, हे सर्वज्ञो, हे पञ्चभूतो, हे परहितात्माओ, हे श्रेष्ठ नरो, हे श्रेष्ठ किन्नरो,
हे सुरवरो, हे भूसुरवरो, हे कृपालुओ, हे दिक्पालो, हे सन्मतियो, हे पापसंहारको, मैंने
मन-वचन-कर्म से राजा राम के सिवा और किसी का स्मरण नहीं किया है । यदि मैंने
ऐसा किया हो, तो मैं इस अग्नि का सहन नहीं कर सकूँगी और सब के समक्ष इसी अग्नि
में भस्म हो जाऊँगी ।' यों कहती हुई सीता ने आकाश तक व्याप्त होनेवाली अनुपम
आकार की भयंकर ज्वालाओं से युक्त प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश किया । अग्नि-कुण्ड में
अविचल खड़ी रहनेवाली सीता किंचित् भी नहीं जली । कर-चरण-आनन-रूपी कमल, वय-

४५६ रंगनाथ रामायण
वाक-रूपी कुच-द्वय, बाहुलताएँ-रूपी मृणाल, विमल त्रिवली-रूपी तरंगें, विशाल एवं चंचल
नेत्र-रूपी मत्स्य, सहज नील चिकुर-रूपी शैवाल से युक्त सरोवर की भाँति सुशोभित उस
कमलाक्षी को देखकर वानर एवं राक्षस शोक करने लगे । सुर, सिद्ध एवं साध्य स्तुति करने लगे ।
पवन-पुत्र, सूर्य-पुत्र, सौमित्र, विभीषण, अंगद, वानर-सेना, दानव-वीर, साथ ही सरमा
आदि राक्षस-वधुएँ अत्यधिक गोक से सतप्त हो उठी । राम निर्वेद से अभिभूत हो
स्थिर रहे ।
तब शिव, ब्रह्मा, अखिल दिक्पाल, गरुड़-गंधर्व एवं खेचर-श्रेष्ठ विमान पर आरूढ़
हो वहाँ आ पहुँचे । राम उन्हें देखकर उनके स्वागतार्थ खड़े हुए । राम को देखकर उन्होंने
कहा—"हे देव ! आप वेदान्त के द्वारा ज्ञेय हैं, (अखिल ससार के) साक्षी हैं, कर्त्ता हैं, ज्ञान-स्वरूप हैं,
मुक्त हैं, नित्यपूर्ण हैं, सर्वज्ञ हैं, जगदेकनिधि हैं, अक्षीण पुण्यात्मा हैं, अव्यक्त हैं, अक्षर
त्रिमूर्ति हैं और आद्यत-पति हैं । भुवन, समुद्र, भूत, नदियाँ, यज्ञ, पर्वत, जन्तु-समूह, वृक्ष,
मार्ग, तन्त्र, विधियाँ, सुर, नक्षत्र, वेद, गास्त्र आदि सहस्रों, लाखों, करोड़ों तथा अरबों
की सख्या में एक-एक ब्रह्माण्ड में पाये जाते हैं, उनकी गणना कोई भी नहीं कर सकता ।
ऐसे असंख्य ब्रह्माण्ड आपके उदर में रहते हैं । उनकी गणना ही नहीं हो सकती । आपके
स्वरूप का पार पाना किसके लिए संभव है ? आपकी माया का प्रभाव जानना आपके
मिवा दूसरों के लिए कहाँ संभव है ? 'आपने अमुक का संहार किया, आपने अमुक को
जीता, अमुक ने आपको जीता, अमुक आपके अवीन हैं, अमुक आपसे श्रेष्ठ हैं'—ऐसी
निन्दा एवं स्तुति आपका स्पर्श भी नहीं कर सकती । दास-भाव को छोड़कर अन्य किसी
भी मार्ग से आपके ज्ञान-रूप का दर्गन दुर्लभ हैं । हे राजन्, आप आदिनारायण हैं और
जानकी आदिलक्ष्मी हैं । लोक-रक्षणार्थ आप काकुत्स्थ के रूप में विख्यात हुए हैं । आप
स्वयं अपने को क्यों भूल गये हैं ? निष्ठुर वह्नि में स्थित जानकी को देखते हुए चुप रहना
आपके लिए उचितं नहीं है । आप उन्हें अपनाइए, प्रीति से आदर कीजिए । उस वनजाक्षी
की उपेक्षा मत कीजिए ।"
१५७. सीता-परिग्रहण
देवताओ ने जब रामचन्द्र को कई रीतियो से समझाया, तब दैत्य तथा कपि परस्पर
कहने लगे—'इस साध्वी के शरीर से न श्रम-बिन्दु निकल रहे हैं, न इनका मुख कुम्हला
रहा है, न इनकी तनुलता सूख रही है, न ये व्याकुल हो रही हैं, न इनकी धारण की हुई
पुष्प-मालाएँ मुरझाई हैं और न इनका अंगराग ही छूटा है ।' वे सीता को देखकर शोक-
सतप्त होते हुए गद्गद कठ से कहने लगे—'रामचन्द्र को ऐसी पवित्र पत्नी के प्रति ऐसे
निष्ठुर वचन नहीं कहना चाहिए । ऐसा साहस उचित नहीं हैं । उनके इस प्रकार कहते
समय अग्निदेव कोमलांगी सीता को अपनी गोद में उठाकर बाहर निकले और उन्हें बड़ी
प्रीति से राम के सामने खड़ा करके कहा—'यह कल्याणी मुग्धा है । तुम्हीं इसके देवता हो,
तुम्हीं इसके प्राण हो, तुम्हीं इसके बन्धु हो और तुम्हीं इसके मर्वस्व हो । तुम्हारे सिवा
और किमी को इसके हृदय में स्थान नहीं है । रावण की आज्ञा से कई राक्षस-स्त्रियों ने
कई प्रकार से इसे पीड़ित किया, भयंकर कृत्यों से इसे डराया, धमकाया और छल किया ।

: that is 100% the glyph म!
Why would the typesetter use म?
Because in Devanagari composing cases, स and म are often near each other, or a novice compositor confused them.
Wait, let's check:
L3: तुम्हारे विश्वाम पर -> विश्वाम
L13: इस मसार में और कौन हो मकता है -> मसार, मकता
L19: ऐमे -> ऐमे लोक-कल्याण
L22: उम पर आक्रमण -> उम
L24: इस समार में कौन हो मकता हैं -> समार, मकता
L27: आप उम सत्यनिधि -> उम
L32: तुम जेमे -> जेमे
Wait, what about विया in L33? Look at नहीं विया: yes, it's विया!
And line 36: अधिकार वहाँ ? -> look at the last line:
पुत्र-शोक में मैंने मृत्यु को प्राप्त किया । ऐसे मुझे इन्द्र-लोक में प्रवेश करने का अधिकार वहाँ ? -> wait, अधिकार वहाँ ? or कहाँ ?!
Look at वहाँ: the first letter is व!
Wait, why व instead of क?

४६० रंगनाथ रामायण
वह दु ख सतत प्रज्वलित अग्नि के समान मेरे हृदय में जलता रहता है । अमर
लोक में भी जो अग्नि शमित नही हुई, वही आज तुम्हारे समक्ष उपशमित (शान्त)
हो गई । हे कमलाप्त-सम-तेजस्वी, हे कमलाभिराम, हे कमलाप्तवंशज, तुम अयोध्या को लौट
जाओ और निखिल धर्मों का पालन करते हुए साम्राज्य को ग्रहण करके अक्षय कीर्त्ति के
साथ चिर काल तक इस पृथ्वी का ऐसा पालन करो कि प्रजा कहे कि राम लोकाभिराम हैं।
उसके पश्चात् उन्होने लक्ष्मण को देखकर कहा—'हे सौमित्र, तुमने राम के साथ
अरण्य में घूमते हुए अनेक उत्तम एव साहसपूर्ण कार्य करके पुण्य प्राप्त किया है । भविष्य
में भी सावधानी के साथ, अपने 'अग्रज के मन को दुखी बनाये विना आचरण करते रहना।'
तदनन्तर उन्होने अपना सिर झुकाकर प्रणाम करके खडी हुई सीता को देखकर कहा—'हे
पुत्री, परम पवित्र पातिव्रत्य धर्म में तुम्हारी समता कोई स्त्री नही कर सकती । तुम उत्तम
साध्वी हो । राम ने तुम्हें जो निष्ठुर वचन कहे, उनके लिए तुम रुष्ट और दुःखी मत
होना । तुम राघव के समान महान् कीर्त्तिवान् पुत्रो को प्राप्त करो, पुण्य प्राप्त करते हुए
जीवन व्यतीत करो ।' इस प्रकार, तीनो को आशीर्वाद देकर महाराज दशरथ मन-ही-मन
सतुष्ट हुए ।
१५९. देवताओं का अभिनन्दन
तब चन्द्र-सम शीतल प्रभु राम को देखकर इन्द्र आदि देवताओ ने कहा—'हे पुण्यात्मा,
आपने हमारे निमित्त मनुष्य के रूप में जन्म लिया, राक्षसो का सहार किया, अनेक
प्रकार के दुखो का सहन किया और भूमि का भार उतारकर हमारी रक्षा की, हमें जीवन-
दान दिया और हमें शान्ति प्रदान करके भेज रहे है । हम आपको वर देंगे। आप अपना
अभीष्ट कहें ।'
तब राम ने देवताओ को देखकर मदहास करते हुए कहा—'आपकी कृपा से इस
ससार में मेरे सभी कार्य सम्पन्न हो गये । कितने ही वानर, अपना-अपना देश, घर-द्वार,
बन्धुजन, पुत्र तथा मित्रो को छोडकर, बडे साहस के साथ, अपने प्राणो की भी परवाह
किये विना मेरे लिए शत्रुओ के साथ युद्ध करके प्राण खो बैठे हैं । ये कपि-वीर
उन्नतात्मा है । उन्हें जीवन प्रदान कीजिए।' तब देवताओ ने कहा—'ऐसा ही हो । ये वानर प्राण
प्राप्त करेंगे।' इतना कहकर महादेव, ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवता तथा दिक्पाल, मुनि, सुर सभी राम की
प्रशसा करते हुए स्वर्गलोक को चले गये । उसके पश्चात् दशरथ भी स्वर्ग को चले गये ।
देवताओ के वर के प्रताप से युद्धभूमि में कटकर गिरे हुए सभी वानर जीवन
प्राप्त करके ऐसे उठे, मानो वे नीद से जाग रहे हो । फिर, राम को देखकर बडे हर्ष से
उन्होने प्रणाम किया । तब राम वडी दया से उन सब को निहारकर बहुत प्रसन्न हुए ।
तब विभीषण ने राम को देखकर बडी भक्ति के साथ कहा—'हे देव, हे राघव-
राज, आपके लका में पधारकर अभिषेक स्वीकार करने का यही उचित समय है ।' तब
राघव ने कहा—'जटाओ का भार धारण किये हुए तथा वल्कल पहने भरत के (अयोध्या
में) तप में निरत रहते समय, उसको बिना देखे हमारा यहाँ सुख-भोग में तत्पर रहना
अनुचित है ।'

युद्धकांड ४६१
तब विचारवान् विभीषण ने बडी भक्ति से पुण्यात्मा स्त्रियो तथा पुरुषो को, पुण्य
वाद्यों के साथ भेजकर चन्दन एव अक्षत-भरे स्वर्णपात्र, रत्नाभरण एव कनकावर मँगाये
और अत्यन्त विनय के साथ उन्हें राम-लक्ष्मण तथा सीता को धारण करने के निमित्त
दिया । तब आकाश से देव-दु दुभियाँ वज उठी, देवता स्तुति करने लगे और अप्सराएँ पुष्प-
वृष्टि करने लगी । तब राम ने निश्चल आनन्द में भरे हुए प्रीति के साथ कहा--'हे
विभीषण हमें और भी कितने ही महान् कार्य करना शेष हैं । हम अब यहाँ विलम्ब नहीं
कर सकते । हमें शीघ्र अयोध्या पहुँचना चाहिए ।'
१६०. पुष्पक-आरोहण
तब विभीषण ने राम को देखकर भक्ति से कहा--'हे देव, पूर्वकाल में रावण ने
क्रुद्ध होकर कुवेर के साथ भयकर युद्ध किया था और युद्ध में उसे पराजित करके उसका
विमान छीन लिया था, वह विमान तैयार है । इन्द्रलोक के पुष्पक विमान की भाँति यह
भी अद्भुत वेग से जा सकता है, अत आप उस पुष्पक में आरूढ हो, हर्ष के साथ अयोध्या
लौटें । यही अच्छा होगा ।'
इस पर राम ने (उसे लाने की) अनुमति दी । तब राक्षसराज अत्यधिक सभ्रम
एव प्रीति से समस्त वैभवो से विलसित उस पुष्पक को ले आया । वह पुष्पक अचल
नवरत्न-दीपो तथा मन्द पवन से युक्त था । वे दीप ऐसे दीखते थे, मानो समस्त लोको को
जला देने की शक्ति रखनेवाले रावण की शक्ति की कल्पना करके अनिल दीपो को हिलाने
से डरता हो और दीप भी हिलने से डरते हो । उसके विमल द्वारो पर हरित-नील मणियां
ऐसी भासमान हो रही थी, मानो विमान के भीतर सजे हुए पुष्पो का रसपान करने के
लिए आये हुए भ्रमर भय के कारण भीतर प्रवेश नही कर रहे हो । उन नील-मणियो के
निकट ही जडी हुई मुक्ता-मणियाँ ऐसी दीख रही थी, मानो पुष्प-वाटिका में मुग्धावस्था
में रहनेवाली मल्लिका की कलियो को मुग्ध करके उन्हें छोडकर भ्रमर यहां चले आये हैं
और उनके विरह से मल्लिका की कलियाँ यहाँ आकर भ्रमरो के साथ रहने लगी हो ।
हसो तथा कमलो के चित्र काढे हुए दुकूलो से रचित उसका वितान ऐसा दीख रहा था,
मानो त्रिभुवन में भ्रमण करने के पश्चात् यहाँ आकर गगा अलसाई हुई लेटी हो । उसके
उज्ज्वल स्तम्भो में खचित मणिमय मूर्त्तियाँ ऐसी दीखती थी, मानो देव-कन्याएँ, यह विचार
करती हुई कि राम यहाँ कब (इस पुष्पक विमान में) पधारेंगे, हम उन्हें कब देखेंगे, स्तम्भो
पर अपनी तनु-लताओ को टेके हुए प्रतीक्षा कर रही हो । वह विमान ऐसा सुन्दर दीख
रहा था, मानो समस्त सृष्टि के रक्षणार्थ जब विष्णु राम के रूप में पृथ्वी पर आये, तब
वैकुण्ठ ही पुष्पक के रूप में यहाँ आ गया हो । ऐसे पुष्पक विमान को देखकर काकुत्स्थ-
वशज बडे प्रेम से विभीषण को देखकर और वानरो को लक्ष्य करके कहने लगे--'हे
विभीषण, ये (वानर) ही रावण-रूपी भयकर अग्नि को बुझानेवाले महान् मेघ-पुज हैं ।
अत इनका आदर-सत्कार करो तथा विपुल धन-सपत्ति से इन्हें पुरस्कृत करो ।' तब
विभीषण ने बडी प्रीति से धन, वस्त्र, योग्य आभूषण तथा स्वर्ण आदि मँगाकर राम के समक्ष
ही उन वानरो को क्रमश भेंट किये । उसके पश्चात् राम ने अपनी पत्नी तथा अनुज के

साथ उस पुष्पक की पूजा की और उसकी परिक्रमा करने के बाद बड़े हर्ष से उस विमान
पर आरूढ़ हुए ।
तब राम ने सुग्रीव आदि मित्रों तथा अन्य वानरों को देखकर कहा—'तुम लोगों ने
मित्रता के नाते जो कार्य किये, उन्हें देवता भी नहीं कर सकते थे । मैंने तुम्हारे कारण
समस्त तेज, समस्त सुख तथा अपार कीर्त्ति प्राप्त की । तुम पुण्यात्मा, परम-पावन तथा
धन्यजीवी होओगे । अब तुम लोग अपने-अपने देश को लौट जाओ ।' तब कपियों ने
कहा—'हे राजन्, हम भी आपकी सेवा करते हुए अयोध्या जायेंगे, आपका राजतिलक
देखेंगे और आपके अनुपम चरित्रवान् अनुज भरत-शत्रुघ्न को, परम-पावनी आपकी माताओं
को देखेंगे और आपके नगर तथा गंगाजी के दर्शन करके लौटेंगे ।'
तब राम ने मन-ही-मन हर्षित होते हुए विभीषण, सुग्रीव, अंगद, हनुमान्, नील
आदि अनेक महान् वानर-श्रेष्ठों को पुष्पक में चढ़ने की अनुमति दे दी । वे भी बड़े उत्साह
से पुष्पक में बैठ गये । दनुज-स्त्रियाँ सीता को प्रणाम करके अपने-अपने निवास को लौट गईं।
तब दाशरथि को देखकर विभीषण ने कहा—'हे देव, इस पुष्पक की विशेषता यह है
कि इसमें कितने लोग भी बैठें, सब के लिए तो इसमें स्थान निकल आयगा, साथ ही
एक कोने में पाँच सौ लोगों के लिए स्थान बचा रहेगा ।' तब राम ने बड़े हर्ष से असंख्य
वानर एवं राक्षसों को उस विमान में बैठने की अनुमति दी । इसके पश्चात् वह पुष्पक
गगन की ओर उड़कर आकाश-मार्ग से, मनोवेग के सदृश वेग से ऐसा जाने लगा,
मानो सूर्यविम्ब पूर्व से पश्चिम को जाना छोड़ दक्षिण से उत्तर की ओर जा
रहा हो ।
१६१ श्रीराम का सीता को विभिन्न दृश्यों को दिखाकर समझाना
तब नित्य-पुण्यवान् राम ने सीता से कहा—'हे शुकवयनी, क्या तुमने अक लंक श्री
से विलसित इस लंका को देखा ? यह विश्वकर्मा द्वारा निर्मित हुई है और त्रिकूट पर्वत
के मध्य में स्थित है । इस लंका का राज्य करने का भाग्य रावण को नहीं था, इसलिए
उस दुर्जन का नाश हुआ ।' उसके पश्चात् राम ने उन्हें रक्त, मांस, मज्जा तथा अस्थि-
खण्डों से परिपूर्ण समर-भूमि को दिखाते हुए कहा—'हे कमलाक्षी, यहीं पर रावण अपना
रण-कौशल दिखाते हुए युद्ध करके मारा गया । देखो, वहाँ महान् शक्ति-सम्पन्न कुम्भकर्ण
घोर युद्ध करने के पश्चात् हत हुआ । यहाँ पर प्रहस्त नील पर आक्रमण करके नष्ट हुआ।
यहीं पर हनुमान् ने महान् बली धूम्राक्ष का संहार किया । उस स्थान पर अजेय हो मेघ-
नाद ने हमें नाग-पाशों से बाँधा था । वहाँ पर सौमित्र ने अपना शौर्य तथा शक्ति दिखाते
हुए अतिकाय का वध किया था । यहाँ पर अक्षीण वलशाली मकराक्ष युद्ध करते हुए
गिरा था । इस स्थान पर शत्रु-दलन तथा अकुंठित विक्रमी अग्निवर्ण गिरा । उस स्थान
पर सौमित्र ने इंद्रजीत का संहार किया । हे सरोजाक्षी, इसी स्थान पर अंगद ने अनुपम
बली अतिकाय का वध किया था । इसी स्थान पर महोदर तथा महापार्श्व नामक भयंकर
विक्रमी लड़ते हुए गिरे थे । यहाँ देवांतक एव नरांतक क्रता से युद्ध करते हुए मारे
गये थे ।

'यह लो, यही पर महान् सेतु है, जिसे हमने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हुए
समुद्र पर बाँधा था । यही गधमादन नामक पुण्य-तीर्थ है । यह सदाशिव का सर्वमान्य
निवास-स्थान है । हे कमलाक्षी, यह जो काचनाचल दीख रहा है, वही हिरण्यनाभ है ।
हे सुदरी, पवन-पुत्र तुम्हारा अन्वेषण करते हुए बडे वेग से लका की ओर जा रहा था,
तब उसको आतिथ्य देने के उद्देश्य से यह महान् पर्वत समुद्र से ऊपर निकल आया था ।'
जब राम इस प्रकार वर्णन कर ही रहे थे कि राम ने अपने समक्ष भयकर आकार
से युक्त रावण का रूप देखा । उसे देखते ही सभ्रमचित्त हो राम ने विभीषण से कहा—
'हे विभीषण, यह कैसा विचित्र है ? मैं ने अपने प्रचण्ड बाहुबल से युद्ध-क्षेत्र में दशकठ का
सहार किया था, और इसके लिए ब्रह्मा-आदि समस्त देवताओ ने बार-बार मेरी प्रशसा
भी की थी । तब फिर आज मेरी आँखो के सामने रावण आकर कैसे खडा है ? इसका
क्या रहस्य है ?' तब विभीषण ने कहा--'हे राजन्, ब्रह्मा की सतति में जन्म लिये हुए
दुर्जन रावण का आपने वध किया था । अत, आपको ब्रह्म-हत्या का दोष लग गया है ।
इसलिए कदाचित् रावण आपको दीख पडा है । इस पाप का प्रायश्चित्त यही करके आगे
बढना चाहिए । नही तो आगे के कार्य सफल नही होगे । अत', आप मन-ही-मन ब्रह्मा
का स्मरण कीजिए । देवताओ के साथ वे बडे हर्ष से आयेंगे और कर्तव्य का निर्देश करेंगे ।
तब राम ने पुष्पक विमान को पृथ्वी पर उतरवाया और मन-ही-मन बडी श्रद्धा
से ब्रह्मा का स्मरण किया । तुरन्त सभी दिक्पालो, मुनियो तथा देवताओ के साथ ब्रह्मा
वहाँ आये और बडी प्रीति से बोले--'हे देव, आपने मुझे किसलिए स्मरण किया है ?'
तब रघुराम ने अपने देखे हुए रावण के रूप का वृत्तान्त सुनाया । तब ब्रह्मा विस्मित होकर
बोले--'हे देव, यह दैत्य मेरे तेज से इस पृथ्वी पर पैदा हुआ और इतने घोर पाप किये,
'फिर भी अन्त में पाप-रहित होकर मरा । इस पृथ्वी पर विप्र अपने वर्णाश्रम धर्म का ज्ञान
रखते हुए, उसके अनुसार कर्म न करे, उसके विपरीत कर्म करे, अतुल पाप करे, गुरु-
दूषण करे, कुल-भ्रष्ट हो जाय और गो-ब्राह्मण हत्या आदि घोर पाप भी क्यो न करे,
'फिर भी वह इस पृथ्वी पर वध के योग्य नही है । राजा को यही चाहिए कि ऐसे दुर्जन,
क्रूर एव पापी के वश को निर्मूल कर दे और उसे अपने देश से निर्वासित कर दे ।
हे जगदीश, विश्रववसु का पुत्र, अब मोक्षार्थी हो आपके सामने खडा हुआ है । उसे सतुष्ट
कीजिए और एक शुभ लग्न में समुद्र के सेतु पर अपने नाम पर शिव की प्रतिष्ठा कीजिए।
इसके पश्चात् उसकी विधि बतलाकर ब्रह्मा चले गये ।
१६२. राम के द्वारा शिवलिंग का प्रतिष्ठापन
तुरन्त राम ने अपने निकट रहनेवाले पवन-पुत्र को देखकर कहा--'हे प्रशसनीय
बलाढ्य तथा साहसी हनुमान्, तुमने हमारा कार्य पूरा करके हमारा उद्धार किया है और
हमारी कीर्त्ति को चारो ओर फैलाकर हमें कृतार्थ किया है । विनय, विक्रम, धैर्य एव
प्रसिद्धि में निखिल लोको में तुम्हारी समता कोई नही कर सकता । अभी हमारा एक और
कार्य सपंन्न करो । हे वानरोत्तम, तुम असख्यफलप्रदायिनी काशी को शीघ्र जाकर वहाँ से
एक शिवलिंग ले आओ । यहाँ से काशी दो सौ दस योजन दूर है । दो घडी में