रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 480, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंयुद्ध-भूमि की ओर मन्द गति से चल पड़ीं। उनके चलते समय, उनके चरणों की अरुण
कान्ति पृथ्वी पर पड़ रही थी, लड़खड़ाकर चलने से उनकी मेखलाएँ शिथिल हो रही थीं;
उनकी क्षीण कटियाँ अवश हो झुकी जा रही थी, हृदय के शोक-भार से उनकी
तनु-लताएँ काँप रही थी; उनके कठ-हार टूट रहे थे, आँखो से आँसू का प्रवाह भर
रहा था, उनके आँचल खिसक रहे थे, वेणियाँ खुलकर पीठ पर डोल रही थी और उनके
मुख कान्तिहीन हो गये थे । अपनी रुदन-ध्वनि से समस्त आकाश को गुँजाती हुई वे
युद्ध-भूमि में पहुँची। उस समय वह रण-भूमि टूटे हुए रथ, छिन्न-भिन्न होकर पड़े हाथी के
कुंभ-स्थल, कटे हुए सिर, पैर एव शरीर, चूर-चूर बने हुए हाथी के दाँत, कुचले हुए सिर,
टूटी हुई गदाएँ, चूर्ण बने हुए कवच, कटे हुए वक्ष, उखड़े हुए मस्तक, फटे हुए कठ, भग्न
हुए शस्त्र, आँतो की राशियाँ, माँस-खड, मृत पड़े हुए गज, खण्डित अश्व, पर्वत-श्रृंग, एक
दूसरे पर पड़े हुए धड़, अजस्र बहनेवाली रक्त की नदियो में बहनेवाली हाथी के शुंड,
पर्वतो के नीचे गिरकर दब जाने से निकली हुई आँखोवाले सैनिक तथा कठोर ध्वनि करते
हुए शवो पर मँडरानेवाले अनेक काक, घूक, कक, गीध आदि से भरी हुई थी।
इतना ही नही, उस युद्ध-भूमि में अनेक भूतो का सचार होने लगा था। कुछ
भूत राम के बाणो के आघात से बहनेवाले रक्त-प्रवाह का पान करते हुए उसे सोमपान
समझकर झूमते थे। कुछ भूत राम को धोखा देकर सीता को ले आनेवाले राक्षसेन्द्र
की प्रशसा करते थे, कुछ रावण के दस सिरो एव बीस हाथो को उसके धड़ में यथा-
स्थान जोड़कर मृत रावण के शरीर को देखकर कह रहे थे कि हे दैत्येन्द्र, तुम्हारे लिए
यह अनुचित है, तुम सीता को राम के सुपुर्द कर दो। कुछ भूत वानरो के शरीर में
प्रविष्ट होकर, वानर बनकर हाथी के धडो को ले आते और रक्त-समुद्र में डालकर बड़े
यत्न से सेतु बाँधने में तत्पर दिखाई देते थे। कोई भूत कहता -- 'मै नारायण हूँ। तुम
देवता हो, तुम राक्षस हो।' फिर, वे हाथी के धड पर आँतो को वासुकि के समान लपेटते
और उस धड को रक्त-समुद्र में डालकर मथने लगते (मानो वे समुद्र-मथन की पुनरा-
वृत्ति कर रहे हो)। कुछ भूत इन्द्र की ओर देखकर हँसते हुए कहते -- 'हमारे राम के
बाणो से अच्छी तरह मथे हुए मास को लेकर उसके बदले हमें स्वर्ग क्यो नही देते ?
क्यो बकरी के थोडे मास-खण्डो के बदले स्वर्ग देते हो ?'* कुछ भूत यह कहते हुए नाच रहे थे
कि शक्ति-सपन्न कुमार एव तारकासुर की युद्ध-भूमि भी हमने देखी थी, भीषण गति
से युद्ध करनेवाले शिवजी तथा अन्धकासुर की रण-भूमि भी हमने देखी थी, इन्द्र तथा
वृत्रासुर का रण-क्षेत्र भी हमने देखा था, किन्तु इतने मास-खण्ड, इतने धड, ऐसा रक्त-
प्रवाह ऐसी विविध स्वादिष्ट वस्तुएँ हमने अबतक कभी नही देखी। कुछ भूत रवि-कुला-
धिप राम के विक्रम की भूरि-भूरि प्रशसा करते थे, कुछ भूत कहते थे कि 'राम का
विक्रम भी क्या, हमारी प्रशसा के योग्य है ?' इसने तो युद्ध में उस दशकठ का वध
कर डाला, जो भयंकर युद्ध करके, श्रेष्ठ रक्त-मांस आदि से हमें तृष्ट किया करता था,
*यज्ञ के समय इन्द्र को बकरी के मांस की जो बलि दी जाती है, उसी की ओर
संकेत है।