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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 479, कुल 508 में से

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पृष्ठ 479

युद्धकाण्ड ४४९
तब राघव के अस्त्र के आघात से रावण के शरीर से रक्त की धाराएँ बहने लगी
और वज्राघात से पृथ्वी पर गिरनेवाले कुलपर्वतो की भांति रावण पृथ्वी पर गिर पडा ।
उस दैत्य के विशाल शरीर के गिरने से पृथ्वी आश्चर्यजनक ढंग से धँस गई । पर्वत भी
धँस गये, दिग्गज दब गये, आदिशेष तथा कूर्म भी खिसक गये । सप्त पातालो के अधिपति
व्याकुल हो गये । हतशेष दैत्य-वीर भयभीत हुए । वानरो ने सिंहनाद किया, अमर,
किन्नर, खेचर आदि राम की स्तुति करने लगे । अप्सराओ ने रघुराम पर पुष्पवृष्टि की,
सारे स्वर्ग में दिव्य दुन्दुभियां, दिव्य काहल एव दिव्य शख बजने लगे । शीतल-मद-
सुगध पवन चलने लगा और दिशाएँ निर्मल हो गईं । इस प्रकार, सुर, मुनि एव खेचरो के
शोक का निवारण करके, समस्त भूमि का भार उतारकर, अपनी इच्छित विजय को प्राप्त
करने के पश्चात् प्रभु राम ने अपने हाथ के धनुष की प्रत्यचा को शिथिल किया और
प्रसन्नचित्त हो उसे लक्ष्मण को सौंपा । समस्त वानर, सभी खेचर, सभी दिक्पाल, सारे
भूपति, समस्त भूत, सभी देवता, सभी गन्धर्व, सभी सन्मुनि, सभी पन्नग, सकल सिद्ध एव
सभी लोक तब राम की प्रशसा करने लगे । उस समय युद्ध में अन्धकासुर का वध करके
शोभायमान होनेवाले धूर्जटि (शिवजी) के समान राम, लोकाभिराम, विजयधाम एव
नवसुधा-धाम की भांति सुशोभित हुए ।
१४८. विभीषण का शोक
तब विभीषण अत्यधिक शोक से सतप्त होते हुए युद्ध में गिरे हुए अपने अग्रज को
देखकर बार-बार ऊँचे स्वर में विलाप करने लगा—"हाय, सुरासुरो के लिए भयप्रद, युद्ध-
भयंकर, तुम्हारी ये भुजाएँ आज पक्षियो के वशीभूत हो गईं, अत्यन्त कोमल शय्या पर लेटने-
वाला यह शरीर आज कठोर युद्धभूमि पर गिरा हुआ है । शत्रु-रूपी अन्धकार के लिए
बाल-सूर्य की भांति ये मणिमय किरीट आज मिट्टी में मिल गये ! हे बन्धु ! विक्रम, विनय,
नय तथा कीर्त्ति में तुम्हारी समता कोई नहीं कर सकता था । ऐसे तुम, घोर पापो में
प्रवृत्त होने के कारण क्रूर, पापी एव उद्धत कहलाने लगे । नीति-च्युत होना बुरा है, यह
तुमने कभी सोचा ही नहीं । मेरी बातो पर तुमने ध्यान नहीं दिया, प्रशस्त नीति-मार्ग
को तुम पहचान नही सके । जानकी को राम के सुपुर्द करने के लिए मैने परामर्श दिया,
किन्तु तुम ऐसा नही कर सके । मैने तुम्हें समझाया था कि तुम राम को साधारण मानव
मत समझो, किन्तु तुमने मेरी बातो की अवहेलना कर दी । तुम्हारे अभिमान तथा गर्व ने
ही आज तुम्हारी ऐसी दशा कर दी । अब मैं तुम्हारे लिए कैसे शोक करूँ ? क्या मैने
तुमसे नहीं कहा था कि राम के साथ वैर करना उचित नहीं है, उसे (वैर) छोड दो । हे अनुपम
नीति-सम्पन्न ! क्या, तुम्हारे जैसे सुकृति के लिए परस्त्री को माता के सदृश नही मानना चाहिए ?
तुमने उचित-अनुचित का विचार ही नहीं किया । अन्त में मेरे वचन ही सत्य सिद्ध हुए ।" इस
प्रकार, वह अपने अग्रज के अपराधो का स्मरण करके बार-बार शोक करने लगा ।
१४९. मृत रावण के निकट मंदोदरी का आना
तब मदोदरी आदि दनुज-वधुएँ उमडती हुई शोकाग्नि में जलती हुई, अपने मुखों
तथा छातियो को पीटती हुई तथा उच्च स्वर में रुदन एव विलाप करती हुई लका से
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