रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 474, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें४४४ रंगनाथ रामायण
भयभीत करनेवाले रावण ने पृथ्वी को कँपाते हुए अद्भुत अस्त्र चलाकर रथ को ढक-सा
दिया, सारथी को व्याकुल कर दिया, अश्वो को शक्तिहीन कर दिया और एक प्रचंड बाण
चलाकर राघव का धनुष तोड दिया और कई बाणो से राघव को भी पीडित किया । तब
क्रुद्ध होकर राम ने भयंकर रूप धारण करके देवेंद्र के द्वारा भेजे हुए धनुष को सँभाला
और उसकी प्रत्यचा के टकार से ब्रह्वाड को विदीर्ण करते हुए दानवो के गर्वाधकार का
नाश करने के निमित्त सूर्य-सम भास्वर सैकडो, सहस्रो, लाखो, करोडो तथा अरबो की
संख्या में शर रावण पर चलाये । वे बाण कदाचित् यह सोचकर उसके शरीर को पार कर
जाते थे कि यह महान् पापी है, क्रूर है, चचल है, मायावी है, धर्मबद्ध रहनेवाले हमें इसके
शरीर में नहीं रहना चाहिए । कुछ बाण कदाचित् यह सोचकर आकाश की ओर, पृथ्वी
की ओर और लका की ओर जाने लगे, मानो वे यह समाचार पृथ्वी को देवताओ तथा
सीता को सुनाने जा रहे हैं कि अब अधिक विलब नही है, रावण अब मरनेवाला ही है,
तुम अब व्याकुल मत होओ । अग्नि की प्रभा के समान दीप्त होनेवाले राम के बाण
मूसलाधार वर्षा की भाँति रावण पर गिरने लगे, फिर भी रावण अविचल रहते हुए प्रचंड
शरो से राम के बाणो को काटने लगा । इस प्रकार, विशाल बाहुबल तथा रण-कौशल से
युक्त वे दोनो पराक्रमी समान सत्त्व, समान वेग, समान बाण-संपत्ति, समान रण-कौशल से
युक्त हो, भिड गये, और वधन से मुक्त क्रोध से भरे सिहो की भाँति, सात दिन तथा
सात रात तक अविराम युद्ध करते रहे । उस समय रावण के रथ पर मेघ रक्त की वर्षा
करने लगे, रथ के अश्वो की पूँछो से अग्नि-कण निकलने लगे, सूर्य की किरणें भिन्न-भिन्न
कातियो में दीप्त होने लगी । रावण को देखकर समस्त भूत कहने लगे—‘अब तुम बच
नही सकोगे, आज अवश्य मरोगे ।' आकाशवाणी हुई—‘हे राघव, आप विजयी होगे ।'
अपनी पराजय को सूचित करनेवाले दु शकुनो को देखकर रावण ने विजय की आशा
छोड़ दी । फिर भी, वडे साहस के साथ राघव पर निशित बाण, करवाल, गदाएँ, शूल,
परिघ, शक्ति आदि चलाकर उन्हें कष्ट पहुँचाने लगा । किंतु राम ने वज्र-सम तथा प्रचंड
प्रलयाग्नि की समता करनेवाले अर्द्ध-चंद्रास्त्र चलाकर उन्हें वीच में ही खडित कर दिया ।
रावण ने अत्यंत भयंकर रूप से भीषण बाणो की वर्षा की, तो राघव ने अर्द्ध-चंद्र बाणो से
उन्हें काट डाला ।
इस प्रकार, विजय की आकाक्षा करके दोनो वीर वडी धीरता के साथ परस्पर
युद्ध करते रहे । तब वानर एव राक्षस-सैनिक अपने-अपने अस्त्र सँभाले हुए रण-विचक्षण
राम-रावण का युद्ध-कौशल देखते हुए चित्रलिखित की भाँति युद्ध भूलकर
खडे रहे । अपनी पराजय को निश्चत जानते हुए भी रावण और अपनी विजय निश्चित
जानते हुए राम, दोनो वडी तत्परता के साथ क्षण-क्षण आगे बढते हुए, उत्साह के साथ
युद्ध करने लगे । उसी समय क्रोध से अपनी आँखो से अग्नि-कणो की वर्षा करते हुए
राम ने एक पैने अर्द्ध-चंद्र बाण से रावण के रथ की ध्वजा को काट डाला । तब रावण ने
भी अत्यधिक रोष से घोर बाणो का सधान करके, राम के रथ के अश्वो तथा मातलि
पर चलाया । किंतु वे उन बाणो से आहत होकर भी कमल-नालो से आहत व्यक्तियो के