रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलगे कि अविराम गति से इस राक्षस का सिर काटते-काटते तग आ गया हूँ, वाहुओ को काटते-
काटते ऊब गया हूँ, वक्ष स्थल पर बाण चलाते-चलाते थक गया हूँ, बिना रुके शर-प्रहार
करते-करते क्लात हो गया हूँ, फिर भी यह दुष्ट मरता नही है । अब इस दुरात्मा को
कैसे मारूँ ? ऐसे उत्साह-शिथिल होनेवाले राम को देखकर विभीषण ने कहा—'हे सूर्य-
कुलाधीश, ब्रह्मा के वर से, इसकी नाभि में कुंडलाकार में अमृत रहता है । उस अमृत
का प्रभाव उसे मरने नही देता । आप भले ही असख्य बार उसके सिर तथा वाहुओ को
काटें, वे पुन-पुनः उगते ही रहेंगे । उनका उन्मूलन नही होगा। यही कारण है कि
दानवेंद्र विचलित नही होता। आप इस प्रकार लगातार उसके सिरो एव वाहुओ को कबतक
काटते जायेंगे ? इसका अत ही नही होगा, अत आप आग्नेय शर चलाइए । इससे
उसके नाभि-विवर में स्थित अमृत सूख जायगा । तब राक्षसराज स्वय परास्त हो जायगा ।
आपके द्वारा चलाये जानेवाले वाणो से रावण के हाथ और सिर युद्ध में एक सौ नौ बार
उग आयेंगे और उसके बाद उसकी मृत्यु होगी ।
१४६. आग्नेय अस्त्र के प्रयोग से राम का रावण को शक्तिहीन कर देना
तब राम ने विभीषण की विनय, नीति, ज्ञान; स्वामिभक्ति, श्रद्धा तथा पवित्र
भावो को देखकर उसकी प्रशसा की । उसके पश्चात् उन्होने अपने धनुष की प्रत्यचा की
ऐसी ध्वनि की कि देवता हर्षित हुए, रावण विचलित हुआ और गगा आदि नदियां क्षुब्ध हुईं ।
फिर, उन्होने प्रज्वलित वज्रो की वर्षा करनेवाले आग्नेय अस्त्र का सधान करके
चलाया । रावण की नाभि में स्थित अमृत को उस शर की अग्नि में आहुति दी और एक
सौ नौ बार रावण के सिरो तथा वाहुओ को काट डाला । उसके पश्चात् राम ने एक
सौ दसवी बार एक अनुपम बाण चलाकर उसके एक सिर तथा दो वाहुओ को छोड शेष
शिरो तथा वाहुओ को काट डाला । यह देखकर देवता हर्षोन्मत्त हो उठे और वानर हर्ष-
निनाद करने लगे । सिरो के कटने पर, रक्त-धाराओ के पृथ्वी पर गिरते समय, रावण
ऐसा दीख रहा था, मानो प्रलयाग्नि, सभी लोको को जलाकर अपनी लाल लपटो से युक्त
हो जल रही हो । सारे शरीर से रक्त की धाराएँ छूट रही थी । उस समय रावण के
शरीर पर स्थित एक सिर ऐसा दीखता था, मानो अस्ताचल पर स्थित हो सूर्य-विव अरुण
आतप की कातियो को विकीर्ण कर रहा है ।
तब विभीषण को देखकर रावण ने अत्यत क्रोधावेश से कहा—'इसीने राम को
मेरा वह रहस्य वता दिया, जिसे अवतक कोई नही जानता था । इसलिए अव मै पहले
इसीका वध करूँगा ।' इस प्रकार कहते हुए रावण ने भयकर शक्ति को विभीषण पर चलाया,
तब वह शक्ति आकाश-मार्ग से अग्नि-ज्वालाएँ उगलती हुई आनेवाली प्रलयानल की भाँति
विभीषण की ओर आने लगी । तुरत राम ने अविचल भाव से घोर वाण चलाकर बीच
में ही उसे काट डाला । रघुराम की अविराम शर-वृष्टि से राक्षस की क्रोधाग्नि जैसे
नष्ट हो जाती है, वैसे ही उसके शरीरस्थ तेज भी अद्भुत गति मे तिरोहित हो गया । एक सिर
तथा दो वाहुओ को छोडकर रावण के शेष सिर एव भुजाएँ कट गई थी । वीर रस के
महान् प्रवाह की भाँति स्रवित होनेवाली रक्त-धाराओ मे वह सना हुआ था । फिर भी,