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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 482, कुल 508 में से

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पृष्ठ 482

४५२ रंगनाथ रामायण
कराया । देवताओ के लिए दुर्भेद्य इस लका में हनुमान् ने अकेले प्रवेश किया । बिना
प्रयास के समुद्र पर सेतु बाँधना क्या वानरो के लिए सभव था ? मेने उसी समय कहा था
कि ये देवता है (वानर नही) । जनस्थान में राम ने अकेले अपने बाहुवल से खर-
दूषण आदि अनेक राक्षसो का सहार किया था । उस दिन से आपको देखकर और राम
का स्मरण करके में भयभीत होती रहती थी । वह मेरा भय आज पूर्णतया सत्य सिद्ध
हुआ । सारा ससार उसी दिन जान गया कि धर्मपरायणा अरुंधती से, निर्मल-मति-सपन्न
रोहिणी से, अत्यधिक उज्ज्वलगुणवती भूदेवी से भी अधिक सहनशील एव पुण्य-साध्वी
जानकी को जिस दिन आप ले आये, उसी दिन आप उस देवी की क्रोधाग्नि से झुलस गये।
जो व्यक्ति जैसा कर्म करता है, वह अवश्य ही वैसा फल पाता है । अत्यन्त नीति-सम्पन्न
विभीषण पुण्यात्मा है, इसीलिए वह अतुल सुख को प्राप्त कर सका । समस्त लोको को
पीडित करनेवाले आप पापात्मा की ऐसी दुर्दशा हुई । सीता देवी से भी अधिक सौभाग्य-
सपन्न कितनी ही सुन्दर कामिनियाँ है ? किन्तु काम-रूप अन्धकार ने आपके नयनो को
ढक लिया था, इसलिए आप उन्हें पहचान नही पाये थे । कुल, रूप, दाक्षिण्य, गुण एव कला
में वैदेही किसी भी प्रकार मेरी समता नही कर सकती । मैं नही कह सकती थी कि वह
आपकी दृष्टि में मुझसे श्रेष्ठ दीख पडी या मेरे समान दीख पडी । यह सत्य है कि जीवो
की मृत्यु किसी-न-किसी निमित्त से होती है । दूर की मृत्यु को समीप लाने के समान
आप वैदेही को ले आये । भाग्यवती सीता ने पति से मिलकर योग्य सुख को प्राप्त किया।
हे नाथ, मुझ अभागिन की ओर निहारिए, मै दुख-समुद्र में डूब रही हूँ । आपके साथ
पुष्पक विमान पर आरूढ हो मैने मदराचल, धवलगिरि, कनकाद्रि, विशाल नन्दनवन आदि
स्थानो में बडे उल्लास से लीला-विहार किया था । हाय ! वे सभी विनोद मुझे सालने के
मिस मेरे प्राण ले रहे है । हे नाथ, मै गर्व करती थी कि मेरे पिता मय हैं, मेरे पति
रावण है, और मेरा पुत्र, युद्ध-प्रेमी इन्द्रजीत है । किन्तु मै जानती नही थी कि युद्ध में
राम-भूपाल के हाथो से आपका वध हो जायगा । वज्र-पात से गिरकर नष्ट होनेवाले
पर्वत की भांति आप चूर-चूर होकर पृथ्वी पर गिर पडे हैं । आप 'मृत्यु के लिए' मृत्यु-
समान थे, पर आज पृथ्वी पर गिरकर मृत्यु के वश में हो गये । आप शत्रु-स्त्रियों को
वैधव्य देते थे, आज आपकी पत्नियो को उसका फल मिल गया ।"
इस प्रकार, रोती, विलाप करती हुई मदोदरी, कभी असुरेन्द्र का मुख देखकर उसका
वर्णन करती, कभी आँसू गिराती, कभी अपनी गोद में रावण का सिर रख लेती, कभी
अपने अश्रु-जल से रावण के मुख की धूलि धोती, कभी खिन्न होती, कभी रावण का हाथ
अपने अरुण हाथो में ले लेती । वह इस तरह फूट-फूटकर रोने लगती कि शोकतप्त हृदय
फट जाय । वह अपने प्राणेश्वर का सिर बायें हाथ में उठाकर थाम लेती । उसे देखकर
अपना सिर कँपाती । दाहिना हाथ पृथ्वी पर फटकारकर कहती--'हाय तुम चल बसे ।'
कभी कहती--'राम-भूपाल क्या ऐसा भी करते है । अब मैं क्या करूँ ?' कभी छटपटाकर
पृथ्वी पर लोटती और अपनी दीन दशा का विचार करके अत्यन्त दुखी होती ।
अपनी भाभी को अनन्त शोकाग्नि में इस प्रकार दग्ध होते देखकर विभीषण उसके