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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 475, कुल 508 में से

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पृष्ठ 475

समान विना हिले-डुले निश्चल खडे रहे । तब वानर अट्टहास करते हुए रावण पर पिल
पडे । रावण ने अपनी माया से उस वानर-सेना पर महान् शस्त्रो की वृष्टि की । उस
वाण-वृष्टि से वानर-वीर भयभीत हो उठे । तब राम ने रावण पर, उसके सारथी, रथ तथा
रथ के अश्वो पर असख्य बाण चलाकर उसे व्याकुल कर दिया । दशकठ ने भी दाशरथि
पर वाणो की वृष्टि की । तब राम ने अद्वितीय ढग से भयकर वाणो का सधान किया
और उनसे समस्त आकाश तथा पृथ्वी को ढक दिया । महेंद्र पर्वत तथा मदराचल के समान
धैर्य रखनेवाले वे दोनो वीर, युद्धभूमि में स्थिर होकर इस प्रकार युद्ध करने लगे, जैसे
नभ के साथ नभ, समुद्र के साथ समुद्र युद्ध करते हो और 'रामरावणयोर्युद्ध रामरावणयो-
रिव' वाली उक्ति को चरितार्थ करने लगे । तब मेघ-गर्जन के समान धनुष की ध्वनि,
प्रचड शरो के परस्पर टकराने की ध्वनि, युद्ध के समय सुनाई पडनेवाले भयकर गर्जन,
रथो के चलने से उत्पन्न होनेवाली विपुल ध्वनि तथा घोडो की हिनहिनाहट आदि की
सम्मिलित ध्वनि से समुद्र आलोडित हुए, उल्काएँ गिरने लगी, दिशाएँ कंपित हो उठी,
पृथ्वी हिल उठी, समस्त लोक चकरा गये, पर्वत काँप उठे, दिग्गज चकराने लगे, देवता
आनदित हो उठे, समस्त भूत त्रस्त हो उठे और आदिशेष विचलित हो उठा । इस प्रकार,
अत्यधिक वीरता के साथ लडते-लडते उन दोनो की बाहुओ का दर्प कुछ शिथिल हुआ,
उनकी प्रचडता कुछ कम हुई, और थोडी देर तक अपने-अपने धनुष का सधान करना
छोडकर वे एक दूसरे को देखने लगे । चचल फूतकार, श्रमजल का प्रवाह, चीत्कार आदि
के पश्चात् उनकी थकावट आधी घडी में ही दूर हो गई ।
१४५. राम का रावण के कर-चरणों को खंडित करना
तुरत वे फिर रणोत्साह से दीप्त हो उठे और प्रलय-काल के यम की भाँति भयकर
रूप धारण करके महान् साहस के साथ रावण से भिड गये । राम ने तब प्रलय-काल के
रुद्र के समान भयकर दीखते हुए घोर तथा पैनी कर्तरी, आरा तथा भाला को चलाकर उस
दशकठ के दसो सिर और बीसो बाहुओ को एक साथ ही काट डाला । सब लोग आश्चर्य-
चकित होकर देखने लगे । किंतु दूसरे ही क्षण करवाल, मूसल, मुद्गर, शर, चाप तथा
केयूरो से युक्त बीस बाहुएँ तथा महान् मुकुटो से अलकृत दसो सिर ऐसे उग आये कि
राम भी इसे देख चकित होकर कहने लगे—'मेरा काटना ही झूठ था ।' इस पर क्रुद्ध
होकर दाशरथि ने पुन उसके सिर और हाथ काट डाले । किंतु जितने वेग से राम उसके
सिर काट देते, उतने ही वेग के साथ उसके सिर उग आते थे । सिर के मुकुटो पर वाणो
के लगने की ध्वनि कानो में पडने के पहले ही नये उगे हुए सिरो से निकलनेवाला भयकर
अट्टहास कानो में सुनाई पडता था । रावण के कटे हुए सिरो के स्थान पर तुरत नये
सिर उग आते थे और कटे हुए सिरो में राम के वाण गडे हुए रह जाते थे, तो ऐसा
लगता था कि मानो रावण ने ब्रह्मा से, केवल कठ पर सिरो के उग आने का ही वर नही
प्राप्त किया था, बल्कि शरो में भी सिरो के उग आने का वर प्राप्त किया था । उनके
सिरो का कटना, कटे हुए सिरो का वाण के साथ ऊपर उठना, फिर नये उग आये हुए
सिरो को बाणो से काटना, ये सभी व्यापार एक के वाद एक इतनी शीघ्र गति से चलने लगे