रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 476, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें४४६ | रंगनाथ रामायण
कि दर्शक चकित रह जाते थे और ऐसा लगता था, मानो सौरभ-युक्त राम-बाण-रूपी
उत्पलों के साथ रावण के सिर-रूपी कमल-समूह को मिलाकर, रक्त-धारा-रूपी सूत्र में
माला गूंथकर, स्वर्ग का माली बार-बार देवताओ को मालाएँ समर्पित कर रहा हो ।
रघुराम क्रोध से व्यग्र हो, अपना रण-कौशल दिखाते हुए, अच्छी तरह लक्ष्य साधकर,
अपनी दृढ़ मुष्टि के चमत्कार से, रावण के सिर तथा भुजाएँ काटते जाते थे और शीघ्र ही
वे उग आते थे । जितनी ही शीघ्रता से राम उन्हें काटते थे, उतनी ही शीघ्रता से वे उग
आते थे । राम के शर-समूह से रावण के सिर तथा करो का कट जाना और फिर उनका
निकल आना इस वेग से होता था कि राक्षसो तथा वानरो को इसका पता भी नही लगता था।
रघुराम के शरो से कटकर गिरे हुए रावण के सिर न जँभाई लेते थे, न दर्द का
अनुभव करते थे, न मंद पड़ते थे, न शक्तिहीन होते थे, न अपने उल्लास से रहित होते थे,
न कांति-हीन होते थे, न परितप्त होते थे, न पलक मारते थे, न उत्साह खोते थे,
और न अपनी क्रुद्ध दृष्टि ही तजते थे । पूर्व की भांति वही क्रुद्ध दृष्टि, वे ही तनी हुई
भौंहें, वही अट्टहास, वही गर्जन, वही वाणी, वही अनुग्रह, वही युद्ध की क्लांति, वही धृति,
और वही हुंकार ? इनसे रहित एक भी सिर उस रण-भूमि में कटकर गिरे हुए रावण
के सिरो में नही दीखता था। जो अट्टहास, जो दर्प और जो रोष-पूर्ण दृष्टि, गिरते हुए सिरो
में दीखते थे, उसी प्रकार के अट्टहास, दर्प एव रोषपूर्ण दृष्टि उगते हुए सिरो में भी दिखाई
पडते थे । दानवेंद्र के सिरो तथा बाहुओ से पृथ्वी तथा आकाश के बीच का भाग भरने
लगा । यह देखकर राम का क्रोध और भी अधिक बढ़ गया, वे लगातार बाणो को
चलाने लगे । तब रावण अपने कटे हुए सिरो तथा बाहुओ को, नये उगे हुए करो से
उठा-उठाकर क्रोधपूर्ण दृष्टि के साथ बड़े वेग से राम पर फेंकने लगा । उसके फेंके हुए
सिर और भुजाएँ राम पर इस तरह आक्रमण करते हुए जान पड़ते थे, जैसे कमनीय वानर-
ग्रह के मध्य विलसित कुमुद-बंधु, षोडश कला-पूर्ण, जगदानंददायक रघुराम-रूपी चंद्र को
देखकर, चंद्र के भ्रम में, कमल-समूह (रावण के सिर) राहु-कोटि (रावण की भुजाएँ) से
युक्त हो, परस्पर सहायता करते हुए, एक साथ आकर उन (राम-रूपी चंद्र) पर आक्रमण
करते हों ।* सिरों तथा करो का एक साथ आना ऐसा लगता था, मानो राम तथा
विजय-लक्ष्मी के विवाह के समय देवताओं ने पल्लव-रत्न-दर्पण तोरण सुंदर ढंग से
सजाये हों । कटते हुए सिर एव विशाल बाहुएँ, बरसनेवाले शर तथा उलूक, काक आदि
खग, पृथ्वी को कंपित करते हुए गगन-मंडल में ऐसे व्याप्त हो गये, मानो यमराज
की सभा का भयंकर वितान हो । इस कारण देवताओ को भी यह मालूम नहीं
होता था कि यह दिन है या रात है या संध्या । प्रख्यात धनुषो एव शरो की दीप्ति
के कारण भूमि में दिन की भाँति प्रकाश व्याप्त था ।
अपनी शक्ति-भर प्रयत्न के पश्चात् भी उस दैत्य को जीतने की किंचित् भी आशा
न देखने के कारण राम शर-संधान का कार्य स्थगित करके बार-बार मन-ही-मन सोचने
*कमल और राहु दोनों चंद्र के शत्रु माने जाते है, इसलिए दोनों मिलकर राम-रूपी चंद्रमा पर
आक्रमण कर रहे थे ।—ले०