सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 484, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 484

४५४ रंगनाथ रामायण
१५२. विभीषण का राजतिलक
तत्पश्चात् राम ने अपने अनुज को देखकर अनुपम करुणाद्रं चित्त से कहा--'हे
लक्ष्मण, तुम लंका में प्रवेश करके इस पुण्यात्मा विभीषण का राजतिलक सम्पन्न करके
आओ।' रामानुज बड़ी प्रीति के साथ लंका में गये; वानर-श्रेष्ठो को भेजकर समुद्र-जल
मँगाया। राक्षस-पुरोहितो तथा सज्जन मन्त्रियो को बुलवा भेजा और मंगल-वाद्यो के विपुल
नाद के बीच, विभीषण को अभिषिक्त किया और मंगलोपचार के साथ उसे सिंहासन पर
आसीन किया। इस प्रकार, बड़े हर्ष के साथ उसे लंका का राजा बनाकर लक्ष्मण ने
आशीर्वाद दिया कि 'जबतक रवि-चन्द्र, पृथ्वी, कुलपर्वत, आकाश-समुद्र और सभी दिशाएँ रहेंगी,
जबतक राघव का कीर्त्ति-गान इस पृथ्वी पर होता रहेगा, तबतक तुम इस राज्य पर
शासन करते रहो। राक्षस-राज्य का वहन करना और उसका सचालन करना दुर्लभ कार्य हैं।
अतः, तुम सावधान होकर इसका सचालन करो और शाश्वत धर्म का पालन करो।'
तब विभीषण विशाल राज्य-प्राप्ति के आनन्द में इतराते हुए मगल-द्रव्य, आभूषण, वस्त्र
एवं अमूल्य मणिसमूह साथ लिये हुए लक्ष्मण के साथ राम की सेवा में उपस्थित हुआ
और उन वस्तुओ को राम के चरणो में समर्पित करके बड़ी भक्ति के साथ प्रणाम किया।
रघुराम ने वे वस्तुएँ मातलि को भेंट के रूप [में दी और बड़ी प्रीति से उसे
विदा दिया। मातलि ने रथ पर आरूढ हो वेग के साथ स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया।
उसके पश्चात् राम ने मन में विचार करके मारुति को देखकर कहा--'तुम शीघ्र लंका में
प्रवेश करके जानकी को हमारी विजय तथा कुशल का वृत्तांत सुनाओ।'
१५३. हनुमान् का सीता को राम की विजय का समाचार देना
राम का आदेश पाकर हनुमान् अत्यन्त हर्षित हुआ और बडे वेग से लंका में प्रवेश
किया। राम की विजय की मन-ही-मन कामना करती हुई, अशोक-वन में बैठी
राम की पत्नी को देखकर हनुमान् ने उनको प्रणाम किया और अत्यन्त विनय से कहा--'हे कल्याणी,
मैं आ गया हूँ और आपके लिए हर्ष का समाचार लाया हूँ। जो आप चाहती थी, वही हुआ।
हे देवी, आपके पति राम देव ने लोक-भयंकर रावण का सहार किया और अनेक
दुष्ट राक्षसो का नाश करते हुए अद्भुत रीति से युद्ध किया। वे अब अपने अनुज सौमित्र
के साथ सकुशल हैं।' इसके पश्चात् उसने उस साध्वी की चिन्ता को दूर करते हुए,
इसके पहले कहे गये वचनो का स्मरण दिलाते हुए कहा--'हे कल्याणी, मैने आप से पहले
ही निवेदन किया था कि आप के पति समुद्र पर सेतु बाँधेंगे, [लंका पर आक्रमण करेंगे,
और रावण का संहार करके आपको अपनायेंगे। वे वचन आज सत्य हो गये हैं। अब मैं
आपकी आज्ञा चाहता हूँ। मेरे योग्य सेवा का आदेश दीजिए।'
तब पवन-पुत्र को देखकर तथा रावण का मरण और रघुराम की विजय को
सोचकर हर्ष के साथ वे बोली--'हे अनघ, तुम्हारे प्रताप की सहायता से ही राम भूपाल ने
यह कार्य संपन्न किया है। दैत्यो के गर्वान्धकार से आवृत इस लंका में प्रवेश करके इसे
साधना, दूसरो के लिए कहाँ संभव था ? तुम्हारे धैर्य, गंभीरता, महान् शौर्य, माधुर्य एवं
सद्गुणो की महिमा की प्रशंसा कैसे करूँ ? तुम्हारे शील एवं पराक्रम की सराहना मैं कैसे करूँ ?