रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 483, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंयुद्धकांड ४५३
चरणो पर गिरा और उमडते हुए शोक से कहने लगा—'हे साध्वी, अत्यधिक वेग से
उमडनेवाला रावण-रूपी समुद्र रघुराम की बाणाग्नि में सूख गया है। राघव-रूपी प्रलय-
मारुत ने रावण-रूपी सरस पारिजात को गिरा दिया है। राघव-रूपी भयकर दावानल ने
दशानन-रूपी कानन को भस्म कर दिया है। राघव-रूपी पश्चिम समुद्र में रावण-रूपी
दिवाकर अस्त हो गया है। राघव-रूपी अमोघ नील मेघ की शर-वृष्टि ने रावण-रूपी
अग्नि को बुझा दिया है।'
१५१. राम का विभीषण के द्वारा रावण की अंत्येष्टि कराना
इस प्रकार, विविध रीतियो से शोक-सन्तप्त होनेवाले विभीषण को देखकर काकुत्स्य ने
कहा—'हे विभीषण, अब इन स्त्रियो का दुःख दूर करो और तुम भी अब शोक करना छोड़ दो।
युद्ध में शूर, शत्रुओ पर आक्रमण करके उनके हाथो से मरते हैं और शत्रुओ को
मारते हैं। समर में दोनो पक्षो की विजय तो होती नही, न जय-पराजय ही स्थिर वस्तु हैं।
रावण ने समस्त देवताओ को जीत लिया था, सभी दिक्पालो पर विजय प्राप्त की थी।
यह एकाकी वीर है, महान् साहसी है, अद्वितीय विजयी है और त्रिलोक-भयकर है।
मैंने तो देखा ही है कि तुम्हारे अग्रज ने रण में कैसी शक्ति दिखाई थी। कौन ऐसा है,
जो इस प्रकार अविचल युद्ध कर सकता है ? कौन ऐसा है, जो अन्त में ऐसी मृत्यु को
प्राप्त करेगा। ऐसी शक्ति तथा ऐसी मृत्यु दूसरो के लिए असम्भव है। हे अनघ, तुम्हारा
अग्रज कृतार्थ हुआ। अब शोक करने की आवश्यकता नही है। इसलिए अब धैर्य धारण
किये हुए इस दनुजेश्वर की अत्येष्टि-क्रिया का प्रबन्ध करो।'
तब भयभीत हो विभीषण ने अत्यन्त भक्ति के साथ हाथ जोड़कर कहा—'हे देव,
अब इसके लिए क्रिया-कर्म की क्या आवश्यकता है ? यह मेरा अग्रज ही कहाँ है ? यह
तो मेरा शत्रु है। आपकी पत्नी को यह क्रूर, नीच एव दुष्ट यहाँ हर लाया था, अब इसके
लिए क्रिया-कर्म कैसा ? पर-वधुओ का स्पर्श-मात्र करनेवाले पुरुष अधोगति को
प्राप्त होते हैं। ऐसे लोगो का स्पर्श करना भी उचित नही है। उनको देखना भी
नही चाहिए। इस पापी को मैं छू भी नही सकता। यह वैदिक कर्म के लिए योग्य
नही है।'
विभीषण की इन वातो पर मन-ही-मन विचार करने के पश्चात् राघव ने विभीषण
को देखकर कहा—'हे अनघ, तुम्हारी वातें सच हैं, किन्तु अब दनुजेश्वर की निन्दा नही
करनी चाहिए। उसने युद्ध-रूपी गंगा-प्रवाह में अपने सभी पापो को धो दिया है। मेरे
सभी कार्य सम्पन्न हो गये। मृत्यु के पश्चात् वैर रखना उचित नही है। अत, तुम निष्ठा
के साथ रावण की अन्त्येष्टि-क्रिया करो।' तब विभीषण ने उनका आदेश स्वीकार करके
वेद-विधियों का अनुसरण करते हुए अग्नि-त्रय को मँगाया और एकनिष्ठ हो अपने अग्रज
का अग्नि-संस्कार किया। उसके पश्चात् बड़ी श्रद्धा से उसकी अत्येष्टि-क्रिया पूरी की।
क्रिया-कर्म में निवृत्त होने के पश्चात् उसने आकर रामचन्द्र के चरणो में प्रणाम किया।
तब उस विमलात्मा को देखकर राम ने मिष्ट भाषण से उनका आदर किया और दयार्द्र
हो उसे सांत्वना दी।