रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 481, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंअब हमें वह भाग्य कहाँ मिलेगा ? कुछ भूत ऊँचे ध्वज-दण्डो को खडा करके, उनमें आँतो
के झूले डालकर बडे मोद से अपनी स्त्रियो के साथ उनपर झूलते हुए सरस आनन्द का
अनुभव करते, कुछ भूत हड्डियो तथा शरो को एक ओर हटाकर, एक विशाल स्थान बना
लेते और अपने प्रिय जनो तथा प्रेमिकाओ के साथ आराम से बैठकर रक्तपान करते हुए
आनन्दित होते थे और सतुष्ट हो आशीर्वाद देते थे कि सीता के साथ राम सुखी रहे ।
ऐसे भूत-समूह से भरे, भयंकर दिखाई देनेवाले उस युद्ध-क्षेत्र में राक्षस-वधुएँ रोती-
कलपती तथा बार-बार पति को पुकारती हुई पहुँच गईं । वहाँ उन्होने अनुपम रीति से
व्याप्त राम की शर-चन्द्रिकाओ से व्याकुल होकर वीर-लक्ष्मी के विरह की अग्नि से दग्ध
होकर पृथ्वी पर गिरे हुए दशकठ को देखा । कटी हुई तथा रक्त से भीगी हुई उसकी
विशाल भुजाएँ ही उसके लिए शीतलोपचार के योग्य किसलय-शय्या के समान थी । उसके
मुकुट की अकल्क मणियो की अरुण कान्ति उसके सारे शरीर पर व्याप्त हो धातु के वस्त्रो
के समान दीप्त हो रही थी । उसके सिर की मज्जा सारे शरीर में व्याप्त होकर चन्दन-
लेप की भाँति दीख रही थी । (राम के) घोर प्रहारो के फलस्वरूप उसके शरीर-भर में
व्याप्त अस्थियो का चूर्ण, अनुपम पुष्प-रज के समान दीखता था । टूटकर झुके हुए रथ
के ताल-सम ऊँची ध्वजाएँ तथा रावण के कोमल एव विमल दुकूल-खण्ड, (पवन में हिलते
हुए) झलनेवाले पंखो के समान दीखते थे । चारो ओर पृथ्वी पर विकीर्ण हो पडे हुए,
गज-मुक्ताफल उपचार के निमित्त उपयोग में लाने के पश्चात् बिखरी हुई मल्लिका की
कलियो के समान दीखते थे । इस प्रकार मृत पडे हुए रावण को देखकर शोक-सागर की
तरगो में डूबी हुई दानव-वधुएँ दनुजेश्वर के शरीर पर गिर पडी ।
१५०. मन्दोदरी का विलाप
तब मन्दोदरी पति के मृत शरीर पर गिर पडी और उमडते हुए शोक-सागर को
पार करने में असमर्थ होकर आँखो से अविराम अश्रु-धारा बहाती हुई बार-बार ऊँचे स्वर
में यो विलाप करने लगी—'हे राक्षसेश्वर, हे वीरवर, हे रणालकार, हे नाथ, " फिर
उसने अपने शोक एव क्लान्ति को प्रकट करते हुए बार-बार विलाप किया और उसके
पश्चात् यो कहने लगी--"हे लंकेश ! आज सूर्य-रश्मियाँ निश्शक होकर आपकी लका में पहुँच
गई हैं । इन्द्रादि देवता यह सोचकर आनन्दित हो रहे हैं कि अब अच्छा अवसर मिल
गया हैं । आपने इन्द्र को जीता, अग्नि को जीता, यम को जीता, नैर्ऋत को जीता, वरुण
को परास्त किया, पवन को हराया, कुबेर को जीता और ईशान को भी परास्त किया
और समस्त लोको पर अपनी प्रभुता जमाई । आप कही भी दुर्वार थे, आपकी यह
दुर्दशा कैसे हुई ? क्या आपसे भी अधिक बलवान् कोई उत्पन्न हुआ ? मैने आपसे कहा था
कि आप राम को सीता लौटा दीजिए, आपका यह कार्य उचित नही है, राघव
स्वय नारायण हैं, वे नर नही हैं । किन्तु मेरी बातें आपने नही सुनी । भला, आपका
दुर्भाग्य आपको मेरी बातें सुनने क्यो देता ? हे दशकठ, पहले तपस्या करते ममय आपने
अत्यधिक निष्ठा से अपनी इन्द्रियो का दमन किया था । कदाचित् उन्ही इन्द्रियो ने सीता
को ले आने के लिए आपको प्रेरित किया और युद्ध में सूर्यवशज (राम) से आपका वध