रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
तव विरूपाक्ष आदि राक्षसो ने सेनां को एकत्र होने की घोषणा की । तुरत सभी
राक्षस अपने गर्जनो से आकाश को कँपाते हुए, करवाल, चक्र, खड्ग, परशु, शूल, गदा,
मूसल, मुद्गर, शक्ति आदि विविध एव विचित्र आयुधो से युक्त हो अत्यधिक उत्साह से
आ गये । राक्षस रावण के लिए विविध अस्त्रो से सज्जित, सूर्य-प्रभा से विलसित रथ ले
आये । तव रमणीय रत्नो की कांति से प्रकाशमान कर्ण-भूषण धारण किये हुए; दसो कठो
में रत्न-पदक पहने हुए, दसो मुखो से नाना प्रण करते हुए, केयूर, मणिकंकण आदि भूषणो
से वाहुओ को अलकृत किये हुए; धनुप, शर, खड्ग, चक्र, करवाल, परशु आदि विविध
आयुधो को धारण किये हुए दशकठ रथ पर आरूढ हुआ । उसके दसो मुकुट ऐसे प्रतीत
होते थे, मानो बारह आदित्यो में एक को तो रावण ने बंदी बनाया, दूसरा आकाश में
दीख रहा है, अत बचे हुए दसो आदित्य यहाँ विराज रहे हैं । रावण के रथ के पीछे
रथ, गज, तुरग, पदाति चतुरगिणी सेना भी चलने लगी । उस समय सेना के निसान,
तुरही आदि की ध्वनि तथा सैनिको के सिंहनाद आदि से गूँजनेवाली लका प्रलय के
समय भयकर गर्जन करनेवाले समुद्र के समान दीख रही थी । वदीजनो की स्तुतियो के
साथ रावण उत्तर द्वार से लका से वाहर निकला और युद्धोन्मत्त विरूपाक्ष को देखकर ऐसा
सिंहनाद किया कि पृथ्वी विदीर्ण-सी हो गई । उस समय सूर्य-विव की दीप्ति भी क्षीण
हो गई, दिशाएँ अधकार से व्याप्त हो गईं, पृथ्वी डोल गई, रथ चूर-चूर हो गये,
अश्व गिर पडे और रक्त की वर्षा होने लगी । ऐसे दु शकुनो को देखकर भी दशकठ
किंचित्-मात्र विचलित नही हुआ ।
लंकेश की विशाल सेना को देखकर ब्रह्माण्ड को विदीर्ण करते हुए वानरो ने सिंहनाद
किया और उद्धत गति से भयकर राक्षसो पर टूट पडे । इससे क्रुद्ध होकर राक्षस-वीरो ने
अपने पराक्रम को प्रकट करते हुए, वानरो के हृदयो को छेदकर पार निकल जानेवाले
पैने बाण चलाये, मूसल, तोमर, शक्ति, मुद्गर, चक्र आदि फेंके, अकुश, कुत तथा
शूल चुभोये, भयकर गदाओ से प्रहार किया और तलवारो को चमकाकर उनसे वानरो के
अगो को खडित किया । तब कपि-वीरो ने भी क्रोधोन्मत्त हो, विशाल पर्वतो तथा वृक्षो
को उन राक्षसो पर फेंका, अपने चरण, हाथ, दाँत, नख तथा पूँछो की सहायता से उनके
सिरो तथा शिराओ को, हाथो तथा मुखो को, वक्षो तथा वाहुओ को, ओठो तथा कठो को
काटते, चीरते तथा कुचलते हुए, उन्हें कई प्रकार से पीडित किया । यह देखकर दनुजेश्वर ने
वत्स्रदत, अश्वकर्ण, नाराच, भल्ल आदि नाना अस्त्रो को वानरो पर चलाकर रक्त की
धाराएँ बहा दीं । वह एक-एक बाण से पाँच-पाँच, सात-सात, नौ-नौ कपियो को एक साथ
जहाँ-के-तहाँ गिरा देता था । इसके पश्चात् उसने पाँच बाणों से गधमादन को, अठारह
बाणो से पनस को, दस बाणो से नील को, पचास बाणो से नल को, छह बाणो से द्विविद को,
सात बाणो से विनत को, सत्तर बाणो से पवनपुत्र को, पच्चीस बाणो से कुमुद को,
पाँच बाणो से गोमुख को, सात बाणो से ऋषभ को, सत्रह बाणो से गज को, सात बाणो
से शरभ को, सात बाणो से गवय को, तीन-तीन बाणो से तार तथा ऋयन को,
अस्सी बाणो से अंगद को तथा कई बाणो से अन्य वानरो को पृथ्वी पर शीघ्र
गिराकर गर्व से इतराने लगा । असुरेश्वर के बाणो से आहत कुछ कपि कमर के
टूटने से गिर पडते थे, कुछ चकराकर लुढक जाते थे, कुछ लोगो के वक्ष स्थलो के विदीर्ण
होने से गिर पड़ते थे, चरणो के कट जाने के कुछ वानर गिर जाते थे, कुछ लोगो के
हाथ कट जाते थे, कुछ वानरो के सिर फट जाने से वे भूमि पर लोट जाते थे, कुछ
कपियो के कठ कट गये और कुछ की जाँघें कट गईं, इसलिए वे कराहते हुए पृथ्वी पर
लोट गये । युद्ध-भूमि में कई ऐसे भी कपि थे, जिनके अग ऐसे कुचल गये थे कि उनके
अगो को पहचानना कठिन हो गया था । बाणो के लगते ही कुछ वानर भागने लगते,
किन्तु बीच में ही प्राणो के निकल जाने से वही पृथ्वी पर गिर जाते थे । इस प्रकार,
दनुजेन्द्र के बाणों के आघात को सह नही सकने के कारण वे सभी वानर प्राण लेकर
भागने लगे । रावण ने उनका पीछा किया । तब सुग्रीव वानर-सेना को देखकर कहने
लगा—'भागते क्यो हो, रुक जाओ, ठहर जाओ ।' फिर भी, वानर-सेना भागती ही रही।
तब उनको रोकने के लिए सुषेण को भेजकर, सुग्रीव ने स्वय एक वृक्ष को लिये हुए राक्षस-
सेना का सामना किया । उसके पीछे-पीछे पर्वतो को लिये हुए वानर-वीर भी चलने लगे ।
तब सिंहनाद करके वह प्रलय-काल के रुद्र की भाँति वृक्ष से प्रहार करते हुए शीघ्र गति से
राक्षसो का सहार करने लगा । अन्य वानर-वीर भी उसीके साथ राक्षस-सेना पर वृक्षो
तथा पर्वतो की घोर वृष्टि करने लगे । इससे राक्षसो के सिर फूट गये और कई राक्षस
कुलिश से आहत भग्न-शिखर कुल-पर्वतो की भाँति गिर पडे ।
११९. सुग्रीव के द्वारा विरूपाक्ष आदि राक्षसों का वध
तब रविपुत्र क्रोध से अपने नेत्र लाल किये हुए एक पर्वत को हाथ में लिये हुए
आगे वढा । तब विरूपाक्ष ने अत्यधिक रोष से रथ को आगे बढाते हुए धनुप का टकार
करके सुग्रीव पर वज्र-सम पैने बाण चलाये । किन्तु, रविपुत्र उनकी उपेक्षा करके उसके
रथ पर कूद पडा और रथ, सारथी तथा घोडो को एक पर्वत के प्रबल प्रहार से पृथ्वी
पर गिरा दिया । रथ से वचित किये जाने पर भी वह राक्षस-वीर पृथ्वी पर उतरकर
सुग्रीव पर विविध शरों को चलाने लगा । इतने में राक्षसेन्द्र की आज्ञा से, सभी आयुधो
से सज्जित करके, महावत एक मत्त गज को ले आया, तो विरूपाक्ष तुरत उस पर चढ
गया और कपियो पर भयकर प्रहार करके उनका सहार करने लगा और साथ-ही-साथ
सूर्य-पुत्र पर भी भयकर बाण चलाये । इससे सतुष्ट न होकर विरूपाक्ष कई शस्त्र और
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उस पर अपनी मुष्टि से प्रहार किया, तो विरूपाक्ष ने अपने करवाल लेकर उससे सुग्रीव
पर प्रहार किया । मुष्टि के प्रहार से विरूपाक्ष तथा करवाल के प्रहार से सुग्रीव दोनों
मूर्च्छित हो गये । किन्तु, शीघ्र ही वे दोनों सँभलकर एक दूसरे से भिड़ गये । सुग्रीव ने
अपनी हथेली से विरूपाक्ष पर प्रहार किया, तो उसने उसे बचाकर अपने करवाल से सुग्रीव
पर वार किया । करवाल का वार बचाने के लिए सुग्रीव दौड़ा और तुरंत उस राक्षस पर
ऐसा आघात किया कि विरूपाक्ष के हाथ का आयुध गिर पड़ा । फिर, दोनों वीर, दो सूर्यों
की भाँति प्रकागमान होते हुए, प्रलय-काल की अग्नियों के समान प्रज्वलित होते हुए, इन्द्रो
की भाँति अपने भुजवल के गर्व से फूलते हुए, विजय की आकांक्षा से मल्ल-युद्ध करने लगे ।
तब विरूपाक्ष ने आश्चर्यजनक शक्ति से सुग्रीव पर अपनी हथेली से ऐसा क्रूर प्रहार किया
कि सुग्रीव मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। तुरन्त वह तलवार हाथ में लिये हुए वानरों पर टूट
पड़ा । इतने में सुग्रीव की चेतना लौट आई और उसने कुलिश के समान कठोर अपनी
हथेली से विरूपाक्ष के वक्ष पर ऐसा प्रहार किया कि वह भयंकर राक्षस रक्त उगलते
हुए पृथ्वी पर लोट गया। यह देखकर वानर हर्ष से फूल गये और दानव अत्यंत दीन हो
भागने लगे ।
तब रावण ने विरूपाक्ष की मृत्यु से किंचित् भी विचलित हुए बिना उसके अनुज युद्धोन्मत्त ,
को देखकर कहा--'देखा तुमने सुग्रीव का पराक्रम ? युद्ध-क्षेत्र में अपने भाई विरूपाक्ष की
दशा देखी ? इस युद्ध में अनेक राक्षस-सैनिक मारे गये, कितने ही हाथी नष्ट हुए, अश्व
दब गये, रथ टूट गये और सेना छिन्न-भिन्न हो गई । वह देखो, वानर हर्षोन्मत्त होकर
आगे बढ़ रहे हैं । तुम्हारे लिए युद्ध करने का यही उचित अवसर है । अब तुम युद्ध-
भूमि में शत्रुओं का संहार करो ।' तब विरूपाक्ष का अनुज श्रीराम को व्याकुल करने का
संकल्प करके वानर-सेना के निकट पहुँचा और बाण, गदा, खड्ग आदि सभी आयुधों से
कपियों पर प्रहार करते हुए उन्हें दुःख देने लगा । यह देखकर सुग्रीव ने एक विशाल
पर्वत को उठाकर उस पर फेंका, किंतु उस राक्षस ने उसे बीच में ही काट डाला ।
तब सूर्यपुत्र ने और एक पहाड़ उठाकर फेंका, तो उस राक्षस ने तीन बाण चलाकर उसके
तीन खंड कर दिये । उसके पश्चात् भी उस राक्षस को शर-वृष्टि करते हुए देखकर सुग्रीव
उसके रथ पर कूद पड़ा और उसके परिघ से ही उसके धनुष तथा केतु को तोड़ डाला,
सारथी को मार गिराया और रथ के अश्वों को पृथ्वी पर गिरा दिया । तब वह राक्षस
बड़े वेग से पृथ्वी पर कूदकर एक विशाल गदा लिये हुए सुग्रीव पर टूट पड़ा । तब दोनों
परिघ एवं गदा से युक्त अपनी बाहुओं को चमकाते हुए सिंहों के समान गरजते हुए एक
दूसरे के कंठ, मुख, हाथ, स्कंध, चरण, नख, जानु, जंघा, छाती, पीठ, उँगलियाँ, नितंब, कमर,
शिर, कान, नाक तथा ओठों पर क्रमशः प्रहार करते हुए आश्चर्यजनक रीति से अत्यंत
साहस के साथ युद्ध करने लगे । कभी वे दोनों परिघ एवं गदाओं से आहत होकर गिर
पड़ते, फिर इतने में एक दूसरे से पहले सचेत होकर पृथ्वी को कँपाते हुए गर्जन करते ।
इस प्रकार, युद्ध करते समय उस राक्षस ने अपनी गदा को दोनों पक्षों की सेनाओं को
आश्चर्यचकित करते हुए घुमाकर सूर्यपुत्र पर ऐसा फेंका कि सुग्रीव पृथ्वी पर गिर पड़ा,
युद्धकांड [Page 409]
किंतु शीघ्र ही उठकर सुग्रीव ने अपना परिघ घुमाकर उस राक्षस पर ऐसा फेंका कि वह
उसके अंगो से लगकर चूर-चूर हो गया । तब क्रोध से जलते हुए उस राक्षस ने अपने करवाल
को सुग्रीव पर फेंका, तो सुग्रीव ने उस कृपाण को लेकर उसे चमकाते हुए उस राक्षस के
मकर-कुण्डलो से दीप्त मस्तक पर ऐसा प्रहार किया कि वह पृथ्वी पर लोट गया । यह
देखकर राक्षस लका की ओर भागने लगे ।
तब सुपार्श्व ने अपने बल के गर्व से फूलते हुए अंगद की सेना पर आक्रमण किया
और तीक्ष्ण शरो के प्रहार से कुछ वानरो के सिर काट डाले, कुछ लोगो के हाथ काटे
और कुछ लोगो का सहार किया । तब वानर भयभीत होकर भागने लगे । यह देख अगद
उस राक्षस के रथ पर कूदा और उसी का परिघ छीनकर उससे उस राक्षस पर ऐसा
प्रहार किया कि वह व्याकुल होकर पृथ्वी पर लुढ़क गया । इतने में जाम्बवान् ने एक विशाल
चट्टान उठाकर उस पर ऐसा फेंका कि उसका रथ टूट गया और अश्व तथा सारथी मर
गये । इतने में सुपार्श्व सचेत हुआ और क्रोध से जलते हुए, अगद के कंधे पर दस बाण
चलाये, जाम्बवान् पर तीन बाण चलाये और गवाक्ष पर पाँच बाण चलाये । अंगद बडे
रोष से परिघ घुमाकर उस राक्षस पर फेंका, तो वह पृथ्वी पर मूर्च्छित होकर गिर पड़ा ।
इसी समय अंगद उस राक्षस का धनुष तोडने लगा, तो वह राक्षस संभलकर उठ बैठा और
परशु उठाकर उससे अगद पर ऐसा आघात किया कि अगद मूर्च्छित होकर गिर पड़ा । फिर,
शीघ्र ही सँभलकर अंगद ने अपनी वज्र-सम मुष्टि से उस राक्षस को ऐसा मारा कि वह
कुलिश के आघात से गिरनेवाले कुलपर्वत की भाँति युद्ध-भूमि में गिर पडा । यह देखकर
देवता हर्ष से निनाद करने लगे और राक्षस-सेना के पैर उखड गये । तब दशानन कहने
लगा—'महा पराक्रमी सुपार्श्व नष्ट हुआ, बाहुबली युद्धोन्मत्त की मृत्यु हो गई, विरूपाक्ष
का वध हुआ और श्रेष्ठ राक्षस-वीर युद्ध में काम आये । अब बल-समन्वित इन राज-
कुमारो को मैं स्वयं जीतूँगा और अपने वधुओ की मृत्यु की शोकाग्नि से जलनेवाली लंका
के रहनेवालो के दुख को दूर करूँगा । अविरल क्षात्र धर्म-रूपी जड़, नव-विजय से उन्नत
लक्ष्मण-रूपी प्रकाड (तना), सूर्यपुत्र तथा अन्य वानर-वीर-रूप शाखाएँ, राम की अखड
कीर्त्ति-रूपी मंजरी, सीता-रूपी फल से युक्त हो, देवताओ के लिए आश्रय-रूपी छाया प्रदान
करनेवाले राम-रूपी वृक्ष को मैं उखाड दूँगा और उसे अपने मन के दुःख को दूर करने-
वाली ओषधि बनाकर, इस संसार में जीवन-यापन करूँगा ।'
११९. रावण का राघवौं पर आक्रमण करना
इस प्रकार कहते हुए असुरेश्वर ने क्रोधोद्दीप्त मन से अपने सारथी से कहा—
'तुम अपनी चतुरता का प्रदर्शन करते हुए रथ को राघवो पर चलाओ, मै आज उनका
सहार करूँगा । यदि वे युद्ध में मरेंगे, तो सभी वानर तितर-बितर होकर भाग जायेंगे ।'
रावण के आदेशानुसार सारथी ने रथ की नेमियो का भयावह रव करते हुए उसे राघवो
के निकट चलाया । बंदी, मागध तथा सूत रावण की विपुल कीर्ति का गान करने लगे,
राक्षस-सेना भीषण गर्जन करने लगी और निसान घोर रव करते हुए बजने लगे । तब
दशकंठ धनुष का भयकर टकार करते हुए वानर-सेना पर दारुण अस्त्र चलाने लगा । ब्रह्मा से
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४१० रंगनाथ रामायण
निर्मित उन वाणो के लगते ही समस्त वानर, अपना भुजबल खोकर पृथ्वी पर गिरने लगे।
इतने में रघुराम ने अपने अनुज के साथ क्रोध से धनुष धारण किये हुए रावण का सामना
किया । राम के धनुष का निनाद सुनते ही आकाश विदीर्ण-सा हो गया, समुद्र आलोडित
हो गये, दिग्गजो के कान के परदे फट गये और राक्षसो के चित्त डोल उठे । -क्रुद्ध दशकठ
के धनुष से निकलनेवाले भयंकर वाणो की ध्वनि सुनकर ही कितने वानर भयाक्रान्त
हो पृथ्वी पर गिरने लगे । तब राम-लक्ष्मण सूर्य-चन्द्र की भाँति भासमान होते हुए युद्ध
के लिए आगे बढे, तो देवताओ का शत्रु रावण राहु की भाँति शोभायमान होते हुए उनसे
जूझ गया । जब लक्ष्मण ने दशकठ पर अत्यत तीव्र शर चलाये, तब दशकठ ने उन्हें कठोर
वाणो से बीच में ही काट डाला और उनपर उग्र वाण चलाये । लक्ष्मण ने भी उसके
एक-एक वाण को खंडित करके उस पर तीन वाण एक साथ चलाये । तब रावण ने
अपने तीन वाणो से उनके वाण खंडित कर दिये । इसी प्रकार, जब लक्ष्मण दस वाण
एक साथ चलाते, तब वह उन्हें अपने दस वाणो से छिन्न-भिन्न कर देता, सौ वाण चलाते
तो वह अपने सौ वाणो से उन्हें चूर-चूर कर देता । इस प्रकार, सौमित्र को युद्ध-भूमि में
तंग करके उसके उपरात दनुजेश्वर राम से युद्ध करने चला । उसे देखकर सभी वानर इस
प्रकार भागने लगे, मानो वे यम को देखकर भाग रहे हो । तब राम ने क्रोध से आँखें
लाल किये हुए धनुष सँभालकर रावण का सामना किया । तब सभी देवता राम की
प्रशंसा करने लगे और पृथ्वी हिल उठी । तब रावण भी क्रोध से तेवर बदलकर राम से
भिड़ गया । राम तथा रावण भयंकर अट्टहास करते हुए धनु
युद्धकांड ४११
रावण इससे अत्यत व्याकुल हुआ और राम पर सर्प-त्राण चलाये, तो राम ने उन्हें बीच
में ही काट डाला । तब रावण ने शार्दूलमुख, उष्ट्रमुख, सूकरमुख, सर्पमुख, गजमुख,
गृध्रमुख तथा सिंहमुखवाले कितने ही भयकर वाण राम पर चलाये, पर राम ने उनके
टुकडे कर दिये । उसके पश्चात् राम ने आग्नेयास्त्र चलाया, तो उसमें से उल्कामुख, विद्युन्मु ख,
ग्रहमुख, सूर्यमुख तथा अग्निमुख से युक्त वाण निकलकर रावण पर आघात करने
के लिए पहुँचे । तब रावण ने आश्चर्य्य-चकित रीति से उन सबको काट डाला और मय
से प्राप्त माया-शर का सधान करके उसे राम पर चलाया । उससे असख्य भाले, तोमर,
गदा, परिघ आदि शस्त्र निकल पड़े । यह देखकर राघव ने अपने महान् धनुष पर गाधर्व
शर का सधान करके चलाया, तो उसमें से अनेक सूर्यविब-सदृश चक्र तथा दिव्य वाण
ससार को त्रस्त करते हुए निकले और उन्होने रावण के माया-शर से निकले हुए परिघ
आदि शस्त्रो को चूर-चूर कर दिया । तब दशकठ ने क्रोध करके राम पर अनेक प्रखर
वाण चलाये, तो राम ने भी शीघ्र गति से उस राक्षस पर असख्य प्रतिशर चलाये । राम-
रावण के शर-जाल से सारा आकाश ढक गया । तब लक्ष्मण ने सात वाणो से रावण की
पताका को काट डाला, एक वाण से धनुष को तोड दिया एक और वाण से सारथी का
वध किया और फिर रावण के वक्ष पर पाँच वाणो से प्रहार किया । इसी समय विभीषण ने
इन्द्रनील पर्वत की भाँति दीखनेवाले रावण के अश्वो को मार गिराया । रथ से वचित
होने से रावण पृथ्वी पर कूद पडा और अपने दसो मुखो की भौंहो को तानकर क्रुद्ध दृष्टि
से विभीषण पर भयकर शक्ति-वाण चलाया । किन्तु, रामानुज ने तीन वाणो से उसे बीच
में ही गिरा दिया । उससे स्फुलिंग तथा ज्वालाएँ निकलकर आकाश तक व्याप्त हो गईं ।
तब दशकंठ अत्यत क्रोध करके, मय से प्राप्त शक्ति-वाण को विभीषण पर चलाने का
यत्न कर ही रहा था कि लक्ष्मण ने कहा—'शरणागत की रक्षा करनेवाले धर्मात्मा क्या
कभी शरणागत की मृत्यु सह सकते हैं ? यो कहते हुए उन्होने रावण के अनुज को अपने
पीछे कर लिया और स्वय रावण पर क्रूर वाण चलाने लगे ।
१२०. रावण की शक्ति से लक्ष्मण का मूच्छित होना
तब रावण ने कहा—'हे लक्ष्मण, बडे शूर की भाँति तुमने विभीषण को अपने
पीछे छिपा लिया है । तब तुम स्वय ही इस शक्ति के प्रहार का सहन करो ।' इस प्रकार
कहते हुए उसने प्रलय-काल के आदित्य के परिवेश के सदृश, उस शक्ति को घोर वलय के
रूप में घुमाकर, उसे लक्ष्मण पर चलाया । तब वह शक्ति अपनी किंकिणी तथा घटिकाओ
का निनाद करते हुए, समुद्रो को आलोड़ित करते हुए, कुल-पर्वतो को हिलाते हुए,
दिशाओ को कँपाते हुए, सूर्यविंब को विचलित करते हुए, वज्रो को गिराते हुए, पृथ्वी को
कंपित करते हुए, आकाश को झकझोरते हुए, नक्षत्रो को तितर-बितर करते हुए, अग्नि-कणो
को विकीर्ण करते हुए, ज्वालाओ को व्याप्त करते हुए, आदिशेष की जिह्वा का आकार
धारण किये हुए, लक्ष्मण के द्वारा चलाये जानेवाले वाण-समूह को चूर-चूर करते हुए,
लक्ष्मण के वक्ष पर भयकर गति से गड गई । राम कहने लगे कि इस भयकर अस्त्र से
लक्ष्मण के प्राणो पर कोई विपत्ति नही आये । समस्त देवता यह देखकर आकाश में हाहाकार
४९२ रंगनाथ रामायण
करने लगे । शक्ति-वाण के लगते ही लक्ष्मण चकराकर पृथ्वी पर ऐसे गिर पड़े,
जैसे प्रलय-काल में महामेरु पर्वत ढह जाता है ।
धरती पर पड़े हुए अपने अनुज को देखकर, राम का हृदय शोकाग्नि से जलने
लगा और आँखों से अश्रुपात होने लगा । लक्ष्मण के विशाल वक्ष में अच्छी तरह गड़े हुए
उस शक्ति-वाण को निकालने के लिए सभी वानर-वीर यत्न करने लगे, किन्तु उनसे वह
निकल नहीं सका । तब राम ने रावण के द्वारा चलाये जानेवाले वाण-समूह की उपेक्षा
करते हुए, उस शक्ति वाण को लक्ष्मण के वक्ष से निकालकर फेंक दिया । उसके पश्चात्
उन्होंने सभी वानर-वीरों को देखकर कहा—"हे वीरो, अपना शौर्य प्रदर्शित करने का यही
समय है, शोक में पड़कर युद्ध से विमुख होने का समय नहीं है । अब तुम लोग लक्ष्मण
की रक्षा करते रहो और मेरी यह प्रतिज्ञा सुन लो । मैं आज इस दुष्कर्मी दशकंठ का
संहार करके, उन सभी दुःखों को दूर करूँगा, जिन्हें मैंने, राज्य छोड़ने, बन्धुजनों से अलग
होने, वनों में भटकने, धनुष-वाण लिये हुए भी, अपनी प्राण-प्रिय धर्म-पत्नी को खोने तथा
मायावी राक्षसों से युद्ध करने से प्राप्त किया था । समर-भूमि में इसका वध करने के लिए
मैंने असमान विक्रमी वालि का संहार किया और कपिराज के रूप में सुग्रीव का अभिषेक
किया । प्रचंड ग्राह-संकुल तथा आकाश का स्पर्श करनेवाली तरंगों से युक्त अनंत सागर
पर सेतु बाँधकर मैं कपि-सेना के साथ समुद्र को पार करके आया और लंका को घेर
लिया । यहाँ अब मैं अपने सौमित्र को खो बैठा हूँ । यदि युद्ध में रावण मेरे दृष्टि-पथ में
आये, तो अपनी दृष्टि के विष से ही उसका अंत कर दूँगा, जैसे क्रूर सर्प दुष्ट जंतुओं को मार
डालता है । अब मैं दशकंठ को जीवित लौटने नहीं दूँगा, उसे मैं अपने वाण-समूह का
लक्ष्य बना दूँगा । आज सभी वानर पर्वतों पर चढ़कर हमारे युद्ध का कौशल देखते रहें ।
आज सभी दिक्पाल तथा समस्त लोक मेरे धनुर्विद्या-कौशल को भली भाँति देख लें और
युद्ध में मेरे पराक्रम को देखकर, मुझ रघुराम के विक्रम को जान लें । आज रावण भले
ही देवलोक में छिप जाय, समुद्र के गर्भ में डूब जाय, पृथ्वी में समा जाय, और रसातल
में प्रवेश कर जाय, तब भी मैं उसका संहार किये बिना नहीं छोड़ूँगा । यदि निश्चय ही
मैंने रवि-कुल में जन्म लिया है, यदि मैं रवि-समान तेजस्वी दशरथ का पुत्र हूँ, यदि मैं
राम हूँ, यदि रावण युद्ध-क्षेत्र में डटा रहा, तो मैं किसी भी प्रकार उसका वध करूँगा ।
इस युद्ध-क्षेत्र में या तो रावण रहेगा या राम रहेगा । राम तथा रावण दोनों का यहाँ
रहना अब असंभव है ।"
ऐसी प्रतिज्ञा करके राम ने दशकंठ पर भीषण वाण चलाने लगे । दशकंठ ने भी
उनके वाणों के प्रतिवाण चलाये, तो उन वाणों के परस्पर टकराने से निकलनेवाली अग्नि-
ज्वालाएँ आकाश तक व्याप्त हो गईं और घोर ध्वनि होने लगी । इस ध्वनि के साथ
धनुषों के टंकारों की ध्वनि मिलकर समस्त लोकों को भयभीत करने लगी ।
१२१. रावण का चिंतित होना
राम के वाणों के प्रहार से रावण जर्जर हो गया और उनके वाणों के वेग का
सहन न कर सकने के कारण राक्षसेन्द्र, सिंह को देखकर भागनेवाले गजराज की भाँति,
युद्धकांड ४१३
युद्ध-भूमि को छोड़कर भागने लगा । तब उसके केश खुल गये, सुदर रत्न-खचित आभूषण
बिखरने लगे, समस्त भूत तालियाँ बजाकर अट्टहास करने लगे, और वानर हर्ष के निनाद
प्रकट करने लगे । भागते समय उसके चरण-घात से पृथ्वी भी काँपने लगी ।
इस प्रकार, लका में प्रविष्ट होकर वह अपने सभा-मडप में आसीन हुआ । फिर,
वह विभीषण के हितवचनों, राम के प्रहारो का तथा कुंभकर्ण, अतिकाय, महान् इंद्रजीत
आदि वीरो की मृत्यु का स्मरण करके मन-ही-मन शोक-सतप्त हो निश्चेष्ट बैठा रहा ।
कुछ समय के उपरान्त वह सँभलकर अत पुर में पहुँचा और उद्विग्न हो, अपनी पत्नी को
बुलाकर सिर झुकाये हुए कहने लगा—'हे प्रिये, राम के अद्वितीय विक्रम का वृत्तात सुनो।
मैं कैसे कहूँ ? वह देखो, मेरे समक्ष सहस्रो राम दीख रहे हैं । मैं इस लका में जहाँ भी
देखता हूँ, वहाँ राम-ही-राम मुझे दिखाई पडता है । अब विजय की कोई आशा नही है ।
अब शकर के चरण ही मेरे लिए शरण हैं । जिस देव के दिव्य तथा भयकर बाण के
आघात से त्रिपुर भस्मीभूत हुए, जिनके मुकुट पर चन्द्रकला रमणीय गति से सुशोभित
हो रही है, जिनके हाथो में पिनाक, खड्ग, त्रिशूल आदि विलसित हैं, जो अखिल
लोक के ईश हैं, जिन्होंने दक्ष-यज्ञ का विध्वंस किया था, क्रुद्ध होकर जिन्होंने अधकासुर का सहार
किया था, वेद जिस देव की स्तुति करते हैं, तथा जो देवाधिदेव हैं, उस शिवजी की अब
मैं उपासना करूँगा ।'
इस प्रकार निश्चय करके वह स्नान आदि से निवृत्त हुआ, ब्राह्मणो को विविध
दान देकर उन्हें तृप्त किया तथा मद, दर्प आदि ( राजस भावो का ), त्याग कर
सात्त्विक भाव ग्रहण किया । उसके पश्चात् उसने, रक्ताबर, रक्त माल्य, रक्त उपवीत,
रक्त चदन तथा रक्तवर्ण की जपमाला आदि धारण की और फिर बडी भक्ति के साथ
मत्र का जप करते हुए, शिव के मदिर में पहुँचा । वहाँ एकनिष्ठ हो उसने एक वेदी
बनाई, दर्भांकुर आदि एकत्र किये । फिर सभी, दिशाओ में यज्ञ के रक्षणार्थ भयकर राक्षसो
को नियुक्त किया और यज्ञ करने के लिए उद्यत हुआ । इसकी सूचना मिलते ही मदोदरी
वहाँ आ पहुँची और दशकठ को देखकर कहने लगी—'हे दानवेन्द्र, क्या, आपको उचित है
कि इस प्रकार दीन होकर अपना शौर्य खो बैठें । आपके क्रोध करने से सभी समुद्र गर्जन
करने से डरते हैं, पवन चलने से डरता है, अग्निदेव तीव्र ज्वालाओ के साथ जलने से डरता है
और आकाश में सूर्य प्रचंड तेज से दीप्त होने से डरता है । आपके नाम से सारे जग
विचलित होते हैं । ऐसे आप, अपना साहस खोकर ऐसी दशा को क्यो प्राप्त हुए ? यदि
आपमें इतना साहस नहीं था, तो उस दिन राम की पत्नी को क्यो ले आये ? उस दिन
मारीच ने जो हित-वचन आपसे कहे थे, उन्हें आपने बुरा मान लिया और नीति-विरुद्ध
वचन कहे थे । नीति का विचार करके तथा आपके अहित की सभावना देखकर धर्मात्मा
विभीषण ने बार-बार आपसे कहा था कि हे राक्षसेन्द्र, आप अनुचित मार्ग पर क्यो जा
रहे हैं ? सीता को छोड़ देने में ही आपका हित है । किंतु आपने उनके वचनो पर ध्यान
नहीं दिया । मातामह माल्यवान् ने आपको नीति सुझाई, तो क्या आपने उसको स्वीकार
किया ? आपकी माता ने स्वयं उचित कर्त्तव्य का आदेश दिया, तो क्या आपने उन पर
ध्यान दिया ? कुभकर्ण ने जव कहा था कि राम से आप क्यो विरोध ठानते हैं, तो क्या
आप क्रुद्ध नहीं हुए ? इस कार्य से विमुख होने का उपदेश जिन लोगों ने दिया था, उनके
ही वचन आज सिद्ध हुए हैं न ? अपने भुजवल तथा पराक्रम को छोड़कर आज आपने
मुनि-वृत्ति क्यों स्वीकार की है ? इन्द्र से युद्ध करके भी आप परास्त नहीं हुए, अव आप रामचंद्र
को परास्त नहीं करेंगे, तो क्या लोग आपका उपहास नहीं करेंगे ? हे असुरेश्वर, आप युद्ध
करके शत्रु पर विजय पाइए । दीन होकर आप यह सव क्या कर रहे हैं ?"
इस प्रकार जब मंदोदरी ने रावण को उत्तेजित किया, तब रावण ने लज्जा से एक
दीर्घ निःश्वास छोड़ा और कहा—'हे सुंदरी, तुम्हारी वातें सत्य हैं । अव मैं रामचन्द्र से
नहीं डरूँगा । अव तुम जाओ ।' तब प्राणेश्वर को प्रणाम करके आँखों से अश्रु-वर्षा करती
हुई वह चली गई । उसके कहे हुए दुःखपूर्ण वचनों का स्मरण करके रावण ने हवन करना
छोड़ दिया और युद्ध की तैयारी करने के लिए चला गया ।
१२२. लक्ष्मण की मूर्च्छा पर राम का शोक
युद्ध-भूमि में रक्त में भीगे, निश्चेष्ट पड़े हुए शेषनाग के सदृश दीखनेवाले अपने
प्रिय अनुज को देखकर रामचंद्र अधीर होकर शोक करने लगे । वे कहने लगे—"सौमित्र
को इस प्रकार पृथ्वी पर गिरे हुए देखकर मैं किस प्रकार अपने प्राणों को रोक सकता हूँ ?
युद्ध करने की शक्ति मुझमें कैसे आयगी ? अपनी मुष्टि में धनुष कैसे धारण कर सकूँगा ?
आँखों में आंसू उमड़-उमड़कर आते समय, बढ-बढ़कर आनेवाले शत्रुओं को मैं कैसे देख
सकूँगा ? मेरी आँखों के सामने मेरा सहोदर, मेरा प्रिय बंधु, मेरा प्रिय सखा मेरे लिए
प्राणों की वलि देकर मुझे छोड़कर चला गया है । धिक्कार है, मेरे शौर्य को । मुझे
अव इस युद्ध की आवश्यकता ही क्या है ? मुझे विजय ही किसलिए चाहिए ? मुझे अव
राज्य की क्या आवश्यकता है ? मुझे अव सीता ही क्यों चाहिए ? मेरा यह शौर्य किस
काम का ? मैं अव जीवित ही क्यों रहूँ ? हे लक्ष्मण, तुम्हारे साथ मैं भी स्वर्ग चलूँगा ।
हे बंधु, विजयी होकर तुमने पहले शरभ-शार्दूलों से भरे हुए भयंकर वनों में मेरी रक्षा
करते रहे, अव यहाँ तुच्छ दैत्यों के वन के बीच मुझे पराया समझकर छोड़ दिया है ।
हे तात, अपनी उन्नत शक्ति से मेरी रक्षा करने के निमित्त वन में तुम एक क्षण भी
नहीं सोये ? आज इस प्रकार दीर्घ निद्रा में सो जाना क्या तुम्हें उचित है ? मैं वार-
वार दुःख के आवेग से ऊँचे स्वर में तुम्हें पुकारता हूँ, फिर भी तुम बोलते क्यों नहीं हो ?
अव मेरे लिए कौन है ? मैं कहाँ जाऊँ । मैं अंत में शोकाग्नि के हाथों में पड़ गया हूँ ।
शुभलक्षण-सपन्न, सुन्दराकार, अद्वितीय वलवान्, परम भक्त तथा प्रिय सहोदर, गम्भीरचेता,
युद्धविजयी मेरा प्राण-सखा लक्ष्मण मेरे साथ वनवास के लिए आया । अव मैं इसी के साथ
स्वर्ग जाऊँगा । कितने ही बंधु हैं और कितनी ही पत्नियाँ हैं, किन्तु ऐसा सहोदर
पृथ्वी में कहाँ मिलेगा ? यत्न करूँ, तो सीता की समता करनेवाली पत्नी को मैं कहीं-न-
कहीं प्राप्त कर सकता हूँ; पर ऐसे सद्गुणशील, दयालु तथा महावली अनुज को मैं
कहाँ पाऊँगा । क्या, यह केवल मेरा अनुज था ? यह महाबली सतत मेरी सेवा करने-
वाला भक्त भी था । यही मेरा पौरुष था, यही मेरी शांति था, यही मेरी कीर्त्ति था,
युद्धकांड ४१५
यही मेरी प्रेरणा था, यही मेरा शौर्य था, यही मेरा धैर्य तथा विनय था और यही मेरी
विजय था । इतना ही क्यो, मेरे लिए भाग्य-देवता तथा मेरा पावन राज्य-पद भी यही था ।”
इस प्रकार, जब राम शोक से अभिभूत हो प्रलाप कर रहे थे, तब सुषेण ने राम
को देखकर कहा—'हे देव, आप इस प्रकार शोक क्यो करते है ? आप धैर्य धरकर इनकी
ओर देखिए । यदि इनके शरीर में प्राण नही रहते, तो क्या, उनके मुख पर ऐसी आभा
दिखाई देती ? या उनकी आँखें कमलो की सुदरता लिये रहती ? या उनकी सुंदर हथेलियाँ
लाल कमल की भाँति सुशोभित रहती ?'
इस प्रकार राम को आश्वासन देकर उसने उन्हें शात किया और हनुमान् को
देखकर कहा—'इसके पहले जाबवान् के कहने से तुम ओषधियो का पता जानते ही हो ।
महाद्रोण पर्वत के, दक्षिण शिखर पर विशल्यकरणी, सौवर्णकरणी, सधानकरणी तथा
सजीवकरणी ओषधियाँ अपनी काति से प्रकाशित रहती है । तुम शीघ्र इन चारो ओषधियो
को ले आओ । उनकी सहायता से लक्ष्मण के प्राण लौट आयेंगे । पूर्वकाल में देवासुरो ने
क्षीर-सागर का मथन करके जो अमृत प्राप्त किया था, उसे वही छिपा रखा है । उसी
अमृत से इन ओषधी-लताओ ने जन्म लिया है । लवण-समुद्र को पार करके जाने के बाद
कुशद्वीप मिलेगा, उसे पार करके आगे बढो, तो क्षीर-सागर मिलेगा । उसे भी पार कर
जाओ, तो चद्र तथा द्रोण पर्वतो को देखोगे । वहाँ देवेन्द्र की आज्ञा से मदराचल की भाँति
विशालकाय गधर्व उन ओषधियो की रक्षा करते रहते हैं । गधर्वों से तुम्हारा युद्ध होगा ।
वही राक्षस भी घूमते रहते हैं । वे बडे मायावी हैं, उनसे सावधान रहना । द्रोणाद्रि से
उन ओषधियो को लाकर, लक्ष्मण के प्राणों को लौटाओ, जिससे रघुपति प्रसन्न हों । यहाँ
से वह पर्वत तेईस लाख, बीस हजार दो सौ दस योजन दूर है । तुम वायु-वेग से जाकर
सूर्योदय के पहले ही यहाँ लौट आओ । सूर्योदय हुआ, तो वे ओषधियाँ अपनी काति खोकर
शक्तिहीन हो जायेंगी । उसके पश्चात् लक्ष्मण को मूर्च्छा से जगाना असभव होगा । इसलिए
हे वानरोत्तम, तुम शीघ्र जाकर वापस आओ । उन ओषधियो के लक्षण भी तुम्हें जान
लेना चाहिए । उनके फल हरे होगे, फूल लाल होगे और पत्ते सफेद होगे । तुम शीघ्र
विभीषण, जाबवान्, सुग्रीव तथा अगद की अनुमति लेकर जाओ ।'
सुषेण के इन वचनो को सुनकर हनुमान् ने कहा—'ऐसा ही हो ।' तब पवनपुत्र
को देखकर राम ने कहा—'मूर्च्छित पडे हुए लक्ष्मण को प्राण-दान करके तुम त्रिभुवनो में
अचल कीर्ति प्राप्त करो । मेरे तीन भाई हैं । हे अनिलकुमार, आज से तुम्हारे साथ मेरे
चार भाई होगे ।'
१२३ सजीवनी लाने के लिए हनुमान् का द्रोणाद्रि को जाना
राम की बातें सुनकर हनुमान् ने कहा—'हे सूर्यकुलतिलक, सेवक हनुमान्
के रहते हुए आप चिंता क्यो करते है ? हे राजन्, आपकी आज्ञा शिरोधार्य करके शीघ्र
ही सप्त द्वीपो के उस पार रहने पर भी ओषधियो के उस पर्वत को सूर्य के उदयाचल
पर आने के पहले ही ले आऊँगा ।' इस प्रकार कहते हुए उसने राम के चरणो पर गिर-
कर प्रणाम किया । तब राम ने उसे उठाकर हृदय से लगा लिया और कहा—'हे अजनि-
४१६ रंगनाथ रामायण
पुत्र, इन्द्र तुम्हारे सिर की, सूर्य तुम्हारे मुख की, चन्द्र तुम्हारे मन की, आदिशक्ति तुम्हारे
नितंब की, पवन तुम्हारी पीठ की, शिव तुम्हारी पूँछ की, अग्नि तुम्हारे चरणो की, ब्रह्मा
तुम्हारी बुद्धि की, वरुण तुम्हारी शक्ति की, सरस्वती तुम्हारी वाणी की, विष्णु तुम्हारे
बाहुद्वय की तथा गणेश तुम्हारे उदर की रक्षा करते रहेंगे । तुम शीघ्र जाकर आओ ।'
उसके पश्चात् क्रमशः सुग्रीव, विभीषण, जाम्बवान् तथा अंगद आदि वानर-वीरो ने उसे
विदा दी । तब हनुमान् आकाश की ओर ऐसे उछला कि जिस पर्वत पर चढकर वह उछला था,
वह धँस गया और पृथ्वी विदीर्ण हो गई, पवन, समुद्र तथा आकाश-गंगा व्याकुल-सी
हो गई और लंका नगर की ऊँची अट्टालिकाएँ गिर गईं । उसके पश्चात् वह विद्युत्-प्रकाश के
समान उज्ज्वल कांति से युक्त अपनी पूँछ को तथा अपने दोनो विशाल हाथो को ऊपर
उठाये, सूर्य-मंडल की भाँति प्रकाशमान होनेवाले अपने मुख से प्रचड दीप्ति
विकीर्ण करते हुए, चरणो तथा कर्णो को कुचित करके उड़ने लगा । देखते-देखते वह अनेक
पर्वतो, कई देशो, कई नद-नदियो, कई वनो, नगरो तथा समुद्रो को देखते हुए हिमाचल के
पार निकल गया । दिशाओ तथा आकाश को कँपाते हुए वह एकाकी शूर आगे बढने लगा।
१२४. कालनेमि का वृत्तांत
गुप्तचरो के द्वारा रावण ने यह समाचार सुना, तो वह हनुमान् के मार्ग में विघ्न
डालने का सकल्प करके स्वयं अर्द्धरात्रि के समय कालनेमि के घर पहुँचा । कालनेमि ने
अत्यंत श्रद्धा से रावण को अर्घ्य, पाद्य आदि देकर उसका सत्कार किया और पूछा-'हे
राजन्, अर्द्धरात्रि के समय आपके यहाँ पधारने का क्या कारण है, कृपया बताइए ।'
तब रावण ने कहा-'आज मेरे शक्ति-बाण से आहत लक्ष्मण को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य
से राम की आज्ञा से हनुमान् संजीवकरणी लाने के लिए जा रहा है । तुम शीघ्र जाकर
उस हनुमान् का वध कर डालो, या उसके मार्ग में कोई ऐसा विघ्न उपस्थित करो कि
वह सूर्योदय के पूर्व यहाँ पहुँच नही सके । द्रोण पर्वत के पास ही देवासुरो से निर्मित एक
सरोवर है । उसमें एक महान् मकरी बडे आनंद से रहती है। वह देवताओ को भी निगल
जाने की क्षमता रखती है, तब इस वानर की गिनती ही क्या है ? तुम कोई ऐसी माया
रचो कि हनुमान् उस सरोवर में पहुँच जाय । तुम शीघ्र जाओ ।'
रावण की बातें सुनकर, मन-ही-मन नीति-मार्ग का विचार करके, उसने कहा-
'हे दनुजेंद्र, माया-मृग का रूप लेकर मारीच गया था और उसकी मृत्यु हुई । आप इस
अनुचित मार्ग को त्याग दीजिए । घोर युद्ध में कुभकर्ण आदि दानव-वीर नष्ट हो चुके है ।
अब तो आप बात मानिए । राम के पास सीता को पहुँचा दीजिए और अपनी लंका
विभीषण को देकर आप शिवजी के निवास कैलास पर्वत पर तपस्वी बनकर जीवन व्यतीत
कीजिए या योद्धा के समान, युद्ध-भूमि में राम से युद्ध कीजिए और उनके हाथो से
प्राण त्यागकर विष्णु-सायुज्य प्राप्त कीजिए ।"
कालनेमि के इस प्रकार कहते ही रावण की आँखें क्रोध से लाल हो गई और वह
अपने चंद्रहास को निकालकर उसका वध कर डालने के लिए उद्यत हुआ । यह देखकर,
कालनेमि ने कहा-'हे देव, आपकी आज्ञा का पालन करने में अभी जाता हूँ ।'
युद्धकांड (पृष्ठ ४१७)
इसके बाद वह मनोवेग से द्रोण गिरि के निकट पहुँच गया और वहाँ अपनी माया से एक आश्रम का
निर्माण किया । 'उस आश्रम में आम, पुन्नाग, चंपक, पूगीफल, कटहल, चंदन, जामुन,
पाटली, बकुल, कदली, खर्जूर, कर्पूर आदि के सुंदर वृक्ष थे । जहाँ-तहाँ ब्रह्मचारियों
का वेद-पाठ हो रहा था और महनीय मणिदीप-मालिकाएँ जल रही थी । फल-फूल तथा
लताएँ, होम-धूम से धूमिल हो रही थी । कलकंठ शुक, नीलकंठ शारिका तथा कलहंसों
के' मधुर कूजन सर्वत्र सुनाई पड रहे थे । स्थान-स्थान पर हवन तथा स्वरयुक्त मंत्रों का
पठन हो रहा था । ऐसे माया-आश्रम में कालनेमि एक मुनि के समान कपट वेश धारण
किये मन्द प्रकाश में आँखें बन्द करके जप-माला फिराते हुए बैठा था । आकाश-मार्ग से
जाते हुए हनुमान् ने इस आश्रम को देखा और सोचने लगा कि मुनि का यह आश्रम कितना
भव्य दीख रहा है । उस दिन (जब मैं यहाँ आया था) यह यहाँ नहीं था, आज यह
कहाँ से आया ? कहाँ वह क्षीर-सागर, कहाँ वह मेरु पर्वत और कहाँ मुनियों का यह
आश्रम ? कदाचित् मैं मार्ग खो गया हूँ । मैं इस मुनि से मार्ग जान लूँगा । यों सोचकर
वह आकाश से पृथ्वी पर उतर आया । वन के पके हुए फल देखकर उसके मुँह में पानी
भर आया, किन्तु मुनि-शाप के भय से बिना उनको छुए ही मुनि के समक्ष पहुँच गया
और हाथ जोडकर बोला--'हे मुनिनाथ, महाराज राम के आदेश से मैं क्षीर-सागर के
पास जा रहा हूँ । मेरा नाम हनुमान् है । मुझे अत्यधिक प्यास लग रही है, क्या यहाँ
कहीं जल मिल सकता है ?' तब उस कपटमुनि ने मदहास करते हुए कहा--'हमारे
कमंडलु का जल पीकर तुम अपनी प्यास बुझा लो । ये फल लो, इन्हें खाकर इस रात को
यही आराम करो । हे वानरोत्तम, मैं अपने मन में भूत तथा भविष्य की सभी बातें जानता हूँ ।
राम को धोखा देकर रावण उनकी पत्नी सीता को ले गया है । राम ने सहज ही
वालि का वध करके लवण-समुद्र में सेतु को बाँधा और वानर-सेना के साथ लंका को
घेरे हुए है । उन्होंने कुंभकर्ण आदि राक्षसों तथा इन्द्रजीत का संहार किया है । पुत्र-
शोक से क्रुद्ध रावण ने भय से प्राप्त शक्ति-बाण सुमित्रा के पुत्र पर चलाया, तो लक्ष्मण
मूर्च्छित हो गिर पड़े । उस लक्ष्मण को जीवित करने के निमित्त ओषधियाँ ले जाने को तुम
आये हो । अबतक तुम वायु-वेग से एक सहस्र योजन का मार्ग तय करके आये हो ।
कोई अधर्मी मुझे देख नहीं सकता । तुम मुझे देख पाये, इससे मुझे निश्चय हो गया है
कि तुम उत्तम व्यक्ति हो । जगत् के कल्याण के लिए राम ने जन्म लिया है, इसलिए
हमें भी राम का कार्य संपन्न करना चाहिए । मैं तुम्हें ऐसे दिव्य मंत्र दूँ गा, जिनमें तुम्हें
दिव्य ओषधि दिखाई पड़े । प्रात काल के सूर्य का दर्शन करते ही शक्ति से संपन्न होनेवाली
संजीवनी आदि कितनी ही ओषधियाँ हमारे इस वन में हैं । उनमें से जो ओषधि चाहिए,
उसे तुम लंका ले जाओ । 'मेरे मंत्रों की शक्ति से तुम पलक मारने की देर में (लंका)
पहुँच जाओगे ।'
तब उस कपटमुनि को देखकर हनुमान् ने कहा--'हे तपस्वी । जब लक्ष्मण बुरी
दशा में वहाँ पड़े हुए हैं, तब क्या मुझे उचित है कि मैं यहाँ सुख से सो जाऊँ ? हे
स्वामिन्, अपने प्रभु की कार्य-सिद्धि के रूप में लक्ष्मण को प्राप्त करने के पहले मैं इन फलों
५३
का ग्रहण कैसे कर सकता हूँ ? मेरी प्यास थोड़े-से जल से नही बुझेगी । क्या यहाँ कोई
सरोवर नही है ?' तब उस कपट-मुनि ने कहा- 'यहाँ से समीप में ही एक दिव्य सरोवर है।
यदि तुम उस सरोवर में आँखें बन्द करके उसके अमृत-सम निर्मल जल का पान करोगे,
तो तुम्हारा शरीर दिव्य हो जायगा और दिव्य ओषधि तुम्हें तुरन्त दिखाई पड़ेगी।' इतना कहकर
हनुमान् को मार्ग बताने के लिए उस कपटमुनि ने शिष्यो को भेजा ।
हनुमान् कपटमुनि के शिष्यो की सहायता से उस सरोवर के पास पहुँचा । उस
सरोवर के तट पर आम, मदार, माधवी, वकुल, सागवान, कुटज, चन्दन, साल, नीम, अर्जुन,
अशोक, निंबु, कदम्ब, तमाल आदि के वृक्ष सुशोभित थे । सरोवर में सुन्दर तथा
कोमल कमल, कल्हार तथा विमल कैरव विकसित थे । कही कलहंस कल-कूजन करते हुए
विलासपूर्ण गति से परस्पर कौतुक करते हुए विहार कर रहे थे, कही हंस की चोचो
का स्पर्श करनेवाले वक, क्रौंच तथा कारण्डव पक्षियो का समूह विचरण कर रहा था । किसी
स्थान पर कैरव-मुकुलो के अग्र-भाग पर भ्रमर झुंड-के-झुंड अचल बैठे हुए मधुपान कर रहे थे
और किसी स्थान पर भ्रमर-समूह मकरन्द-पान करने के निमित्त आया हुआ था, किन्तु
कमलिनियो के विकसित न होने के कारण गायको की तरह उसके चारो ओर मँडराते हुए
फिर रहे थे । तोते की चोचो से चीरे जाने से फलो का रस, पत्तो से होकर लाल
कमलिनियो पर ऐसे झर रहा था, मानो सरोवर के तट पर स्थित आम के वृक्ष शिव से
(वसन्त के मित्र) कामदेव को फिर प्राप्त करने के उद्देश्य से अग्नियो में घी की आहुति
दे रहे हो । दूसरे स्थान में लाल कमलिनियो में झरनेवाला फलो का रस पान करके
मधुप आकाश की ओर ऐसे उड़ रहे थे, मानो होमकुंड से धुआँ उड़ रहा हो । वह
सरोवर ऐसा दीख रहा था कि मानो कमलपत्र-रूपी थालियो में हिम-शीकर-रूपी
अक्षत रखे हुए, उत्फुल्ल कुवलयो के लोचनो से, हनुमान् के आगमन की प्रतीक्षा कर रहा हो ।
उस सरोवर को देखकर हनुमान् अत्यधिक हर्षित हुआ और आँखें बन्द करके उस
सरोवर में उतर गया और अत्यधिक प्यास के कारण जल का पान करने लगा ।
१२५ मकरी का हनुमान् को निगल जाना
संसार-रूपी सागर में विषय-रस को बडे चाव से पीनेवाले तृषित व्यक्ति को संसार
की माया जैसे निगल जाती है, वैसे ही उस सरोवर से उस समय एक विशालकाय मकरी
निकली और उसने हनुमान् के चरणो को कसकर पकड़ लिया । हनुमान् ने अपने चरणो को खींच
लेने का उद्धत शक्ति से प्रयत्न किया, किन्तु छुड़ा न सका । तब वह बड़े धैर्य के साथ
खड़े होकर देखने लगा कि वह क्या है ? ध्यान से देखने पर उसे मालूम हुआ कि वह
एक विशालकाय मकरी है । तब उसका क्रोध दुगुना हो गया और उसने भयंकर रूप
धारण करके रघुराम की विजय का आधारभूत अपनी पूँछ उठाकर दुर्वार गति से उस
मकरी के दाँतो पर प्रहार करके उन्हें गिरा दिया, मानो रावण की भोग-लालसा से संचित
पापो को ही झटका देकर गिरा दिया हो, किन्तु वह मकरी हनुमान् को निगल जाने का
उपक्रम करने लगी, मानो वह समत् मुनि के शाप-रूप रोग से मुक्त होने के लिए (हनुमान्-
रूपी) ओषधि को खाना चाहती हो । तब वायुपुत्र सोचने लगा-'हाय, राम के कार्य में
विघ्न पड गया । कदाचित् में यहाँ इस प्रकार मर जाऊँगा । हाय, अब क्या उपाय है ?'
फिर, हनुमान् ने यह निश्चय करके कि इसके पेट में पहुँचकर में इसका वध कर डालूँगा,
मकरी को अपना शरीर निगलने दिया । निदान वह भुजबली अधकूप के सदृश दीखनेवाले उस
मकरी के उदर में पहुँच गया । वह मकरी वडी प्रसन्नता से जल के मध्य-भाग में चली गई ।
तब हनुमान् भयंकर क्रोध से उस मकरी की आँतो तथा नसो को ऐंठने और तोडने
लगा और विषग्रास की भाँति उस महा मकरी के उदर में अविराम गति से जहाँ-तहाँ
घूमते हुए अग्नि की भाँति उसका उदर जलाने लगा । तब वह मकरी धैर्य खोकर प्यास
की तीव्रता का सहन नही कर सकने के कारण अपने सूखे हुए मुख-गह्वर को खोलकर पड
रही । तब क्रूर नक्र, ग्राह आदि से युक्त जल-प्रवाह हनुमान् पर गिरने लगा ।* तब वायुपुत्र
काटी हुई आँतो का पिंड बनाकर बाहर ले आया और शीघ्र उसका गला घोट दिया ।
मकरी ने भी यह सोचकर कि यह आहार पचाने-योग्य नही है, अवश हो पडी रही । तब
हनुमान् ने उसे तट पर घसीटकर उसको चीर डाला । उस समय उस मकरी के रक्त से
युक्त वह सरोवर प्रलय-काल में भयकर वडवानल की ज्वालाओ से युक्त समुद्र के समान
लाल दीखने लगा ।
तब वह मकरी देव-स्त्री का रूप धरकर अपनी चंचलता छोडकर, स्थिरता के साथ
वादलो में प्रकाशित होनेवाली बिजली की भाँति विमान में बैठी आकाश-मार्ग में दिखाई
पडी । पवन-पुत्र के पुण्य प्रताप से शापमुक्त हो वह अत्यन्त हर्षित हुई और वह देव-स्त्री
हनुमान् को देख कर बोली--'हे कपिकुंजर, हे वानरेन्द्र, में तुम्हारे कारण आज शापमुक्त
हुई । मैं अभी इन्द्रलोक में जा रही हूँ । जाने से पहले में तुम्हें एक बात बतलाना चाहती हूँ ।'
इतना कहकर हनुमान् को सरोवर के निकट भेजनेवाले उस कपट-तपस्वी को दिखाकर
बोली--'हे कपिश्रेष्ठ, यह कोई मुनि नही है । इस पर विश्वास मत करो । यह एक
राक्षस है और दानवेन्द्र के आदेश से तुम्हें मारने के लिए यहाँ आया है । मेरे इस सरोवर
में रहने की बात जानकर मुझसे तुम्हें मरवाने के लिए ही यहाँ भेजा । यह वध्य है । इस पर
विश्वास मत करो । वह यहाँ रहने योग्य नही है । अत, तुम शीघ्र इसका सहार करके
ओषधियो को प्राप्त करने के लिए जाओ । द्रोणाद्रि पहुँचने का मार्ग यही है ।'
१२६. धान्यमालिनी का वृतांत
देव-रमणी की बातें सुनकर हनुमान् को आश्चर्य हुआ । उसने उस रमणी को देखकर
कहा--'हे सुन्दरी, पहले तुम मकरी कैसे हुई और फिर अब देव-कान्ता कैसे बनी ?' तब
वह कहने लगी--'हे वीरवर, हे पावनचरित, हे कनकाद्रिसम धीर, में धान्यमालिनी नामक
गंधर्व-कन्या हूँ । मैं अपना पूर्व-वृत्तात सुनाता हूँ, सुनो । अखिल लोक के आराध्य सदाशिव
जब रजताद्रि पर गोष्ठी में बैठे थे, तब मैंने अपनी नृत्य तथा संगीत-कला का प्रदर्शन
करके उनको प्रसन्न किया और उनसे एक अनुपम विमान प्राप्त किया । उस विमान में बैठकर
मैं प्रतिदिन इस सरोवर में जलक्रीडा करने आने लगी । एक दिन की बात है कि शाण्डिल्य
*विशाल मकरी के मुंह खोलने से उसके मुख से होकर मीन, ग्राह आदि के साथ
सरोवर का जल उसके शरीर के अन्दर बहने लगा ।—ले०
४२० रंगनाथ-रामायण
नामक मुनि यहाँ आये और बड़ी आसक्ति से मुझे देखते हुए मन-ही-मन महान्-आनन्द-
का अनुभव करने लगे । फिर भोग की लालसा से प्रेरित तथा काम-पीडा से अभिभूत हो,
इसका भी विचार किये बिना कि कहाँ मेरे जैसा तपोधन तथा पुण्यात्मा मुनि और कहाँ
यह सुन्दरी, मुझ पर अनुरक्त हो गये और निर्लज्ज हो, लोलुप-दृष्टि से मुझे देखने-लगे ।
यह देखकर मैंने उनसे कहा—'हे मुनीन्द्र, कहाँ आप, कहाँ मैं और कहाँ आपकी यह लोलुप
दृष्टि ? आप तपस्वी तथा पुण्यात्मा हैं, आपका यह कार्य आपके तप में विघ्न-डालनेवाला है।'
तब मुनि कामातुर हो, तपस्या का पवित्र संकल्प त्याग कर कहने लगे—'हे सुन्दरी,
यही मेरी तपस्या और पुण्य का फल है, यही मेरे लिए स्वर्ग का सोपान-है,
यही मेरे लिए मोक्ष का साधन है !' तब मैंने उनसे कहा—'हे मुनि, मैं अभी रजस्वला हूँ,
अतः आपको मेरा स्पर्श नहीं करना चाहिए । इन दिनों मैं आपके ही घर में रहूँगी ।
स्नान तथा शुद्धि के पश्चात् आप मुझे प्राप्त कर सकते हैं।' इस प्रकार, मुनि को समझा-
कर मैं उस मुनि के साथ गंधमादन को गई और मुनि के घर में ही निष्ठा से रहने-
लगी । उस दिन रात को रावण सभी दिशाओं पर विजय प्राप्त करके अपनी सेना के
साथ उस पर्वत पर ठहरा । जब मैं पर्वत-शिखर पर गाने लगी, तब मेरा गाना सुनकर
रावण मेरे पास आया और अपना प्रताप, अपना सौन्दर्य, अपनी महत्ता तथा अपना नाम
बताकर मुझे प्रलोभन देने लगा कि 'हे सुन्दरी, तुम अपने रूप-यौवन तथा विलास के साथ
मेरा आलिंगन करो।' मैंने कहा—'मैं विवश हूँ, अतः तुमको मेरा स्पर्श नहीं करना चाहिए।'
तब उस राक्षस ने कहा—'हे सुन्दरी, मेरे लिए रजस्वला स्त्रियाँ तथा परस्त्रियाँ अधिक-
प्रिय हैं, अतः तुम मुझे मत ठुकराओ ।' इस प्रकार मुझे अपने प्रिय वचनों से प्रसन्न करके
उसने मेरे साथ रति-क्रीड़ा की । इससे अतिकाय का जन्म हुआ । मैंने उस पुत्र को दानवेन्द्र-
को सौंप दिया । तीन दिन के पश्चात् शुद्धि-स्नान आदि से निवृत्त होकर मैं मुनीश्वर-
के समक्ष जाकर खडी हो गई । तब उस मुनि ने मुझे देखकर कहा—'मेरे घर में रहती हुई,
तुम मुझे धोखा देकर किसके साथ प्रीति से रति क्रीडा में प्रवृत्त हुई थी ? हे तन्वी,
तुम्हारे यौवन का उपभोग किसने किया ? तुमने-बिना सोचे-समझे ऐसा क्यों किया ?
यदि विवेक के साथ विचार किया जाय, तो तुम्हारी यह करतूत स्त्री-सुलभ ही प्रतीत
होती है । परहित कहाँ और युवतियाँ कहाँ ? शीलाचरण कहाँ और सुंदरियाँ कहाँ ?
कमललोचनियां कहाँ और सत्य कहाँ ? कामिनियाँ कहाँ और करुणा कहाँ ? (काश,—
दोनों बातें एक साथ ही देखी जाती ?) इस प्रकार कहते हुए उस मुनि ने अत्यधिक क्रोध
से निर्दय हो मुझे घोर शाप दिया—'तुम अपने विलास को खोकर इस सरोवर में मकरी
बनकर रहो । जिसने तुम्हारे साथ रति-क्रीड़ा की, वह तुम्हारे इस पाप से अपने पुत्र,
मित्र तथा सेना के साथ भस्म हो जायगा ।'
"मुनि का यह घोर शाप सुनकर मैं विचलित हो उठी और उस पुण्यात्मा के समक्ष
हाथ जोड़कर कहने लगी—'हे मुनिश्रेष्ठ, मैं इस शाप-रूपी समुद्र को किस नौका की सहायता
से पार कर सकूँगी ? इस शाप-रूपी दावानल को मैं किस जल से बुझा सकूँगी ?
हे दयालु, मुझ पर दया दिखाइए।' भयाक्रान्त-हो, इस प्रकार आर्तनाद करनेवाली मुझे देखकर
ज्ञान-दृष्टि से अनुमान करके, उस कृपानिधान ने कहा—'हे सुन्दरी कुछ समय के पश्चात्
हनुमान् राम के कार्यार्थ यहाँ आनेवाला है । उसके द्वारा तुम्हारे शाप की मुक्ति होगी ।'
इतना कहकर वह मुनि गंगा नदी के तट पर चले गये । आज मैं शाप-मुक्त हो गई हूँ ।
अतः मैं जा रही हूँ ।" यो कहती हुई वह कमलाक्षी हनुमान् को आशीर्वाद देकर वहाँ से
स्वर्ग चली गई ।
१२७. कालनेमि का वध
हनुमान् वहाँ से सीधे कालनेमि के सामने उपस्थित हुआ । उस समय वह पापी,
अचल समाधि में निमग्न रहनेवाले (मुनि) की भाँति कुम्भक-क्रिया के द्वारा अपने वक्ष स्थल
को फुलाकर मुख को किंचित् झुकाकर, ध्यान-मग्न रहनेवाले की भाँति आँखें बंद किये हुए
जप-माला को फेरते हुए जप करनेवाले की भाँति ओठ हिलाते हुए बैठा था । हनुमान्
के आते ही उसने आँखें खोलकर, हनुमान् से कहा—'सरोवर निकट ही तो है ? तुमने
इतना विलंब क्यो किया ? देखो कितनी रात बीत गई है । यदि तुम मंत्रोपदेश ग्रहण
करने की इच्छा रखते हो, तो क्या गुरु-पूजा की व्यवस्था कुछ करोगे ?'
तब पवनपुत्र ने कहा—'लो, अब तुम्हारे लिए यही गुरु-पूजा है ।' यो कहकर
उसने अपनी कठोर मुष्टि से उस राक्षस के बाहुमध्य में प्रहार किया । तुरन्त उस दैत्य ने
अपना वह रूप छोड़कर एक पक्षी का रूप ले लिया और हनुमान् पर आक्रमण किया । उसके
आक्रमण करते ही हनुमान् ने उसे कसकर पकड़ लिया और उसके दोनो पंखो को तोड़कर
फेंक दिया । तुरन्त उस राक्षस ने वह रूप भी त्याग दिया और अपनी माया से एक गंभीर
सिंह का रूप धारण किया और आकाश की ओर भयकर दृष्टि को दिखाते हुए गर्जन करके
हनुमान् को धमकाने लगा । किन्तु, हनुमान् निर्भीक हो अपनी मुष्टि से उस कालनेमि के
सिर पर ऐसा प्रहार किया कि उसका सिर फट गया । तुरन्त वह राक्षस सिंह का रूप
भी छोड़कर सुग्रीव के रूप में आया और कहने लगा—'हे पवनपुत्र, यहाँ क्या कर रहे हो ?
चलो, लक्ष्मण के प्राण लौट आये हैं । अब तुम्हें द्रोणाचल जाने की आवश्यकता
नहीं है । अब हमें ओषधि नही चाहिए ।' पहले हनुमान् को भ्रम हुआ कि वह सुग्रीव
ही है, किन्तु ध्यानपूर्वक देखने के पश्चात् निश्चय कर लिया कि वह सुग्रीव नहीं है ।
तब अत्यन्त क्रोध से उसके वक्ष पर ऐसा प्रहार किया कि वह राक्षस मूर्च्छित होकर गिर
पड़ा, किन्तु शीघ्र ही वह दानव सँभल गया और शतशृंगी होकर धनुष से पैने शर
चलाकर हनुमान् को कष्ट पहुँचाने लगा । तब हनुमान् ने भी अपनी मुष्टियो तथा चरणो
के आघात से उसकी सारी शक्ति शिथिल कर दी और उसे आकाश से पृथ्वी की ओर
खींच लिया । उसके पश्चात् उसने राक्षस का सिर ऐंठकर उसे धड से अलग करके पृथ्वी
पर ऐसा फेंक दिया, जैसे मत्त गज मृणाल को तोड़कर फेंक देता है । उसके बाद विजय-
गर्व से सिंहनाद करते हुए हनुमान् तुरन्त द्रोणाचल पर पहुँच गया ।
द्रोणाचल पर पहुँचकर हनुमान् अनेक दिव्य लताओं की आभा से तथा निर्मल
मणिसमूह की कांतिवाले दीप-वृक्षो की दीप्ति से भासमान उस पर्वत पर घूम-घूमकर दिव्य
ओषधियो का अन्वेषण करने लगा । वह किसी लता को देखकर 'यही वह सुगन्धि है, यही
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वह लता है,' ऐसा विचार करके उसके पास पहुँचता, तो वह लता छिप जाती । यह देखकर
हनुमान् मन-ही-मन दुखी हो कहने लगा—'हे पर्वतेश्वर, हे पर्वतराज, हे पुण्यात्मा, अनघ
रघुराम की आज्ञा से दिव्य ओषधि ले जाने के निमित्त मै आया हूँ । हे नगराज, जो कार्य
समस्त लोको के हित में है, उसको सपन्न करने के लिए आये हुए मुझे आप क्यो इस
प्रकार धोखा दे रहे हैं ? आप शीघ्र अपने पास रहनेवाली ओषधि-लताओ को प्रकट कीजिए।
मुझे शीघ्र जाना है । हे ओषधि-लताओ, यह कार्य लोक-हितार्थ है । अत, मै आपसे प्रार्थना
करता हूँ कि आप अपनी सुन्दर आकृति दिखाइए ।' इस प्रकार प्रार्थना करने पर भी
वे लताएँ अपने रूप छिपाये रही । तब हनुमान् ने फिर कहा—'हे नगकुलतिलक, मेरे
आगमन को देखकर आपने मेरा उचित सत्कार नहीं किया, यह उचित नही है ।'
कई बार विनम्र प्रार्थना करने पर भी जब उस पर्वत ने दिव्य ओषधि-लताओ
को नहीं दिखाया, तब हनुमान् अत्यन्त क्रुद्ध हुआ और कहने लगा—'हे नगकुलाधम, मेरे
इतनी प्रार्थना करने भी तुम्हारा मन मेरी ओर द्रवीभूत नहीं हुआ । भला, गुणहीन तथा
कठोर पत्थर में दया कैसे उत्पन्न होगी ?'
इतना कहते-कहते हनुमान् की क्रोधाग्नि की ज्वालाएँ उनके रोम-रोम में व्याप्त
हो गई । तुरन्त उसने दस योजन विशाल तथा दस योजन ऊँचा रहनेवाले उस भयंकर पर्वत
को सहज ही उखाड़ लिया, मानो यह बता रहा हो कि मैं राम का सामना करनेवाले रावण-
रूपी पर्वत को भी इसी प्रकार उखाड डालूँगा । उस समय सारी पृथ्वी हिल उठी और
आकाश काँपने लगा ।
इन्द्र के आदेश से उस पर्वत की रक्षा करनेवाले अग्नि-सम तेजस्वी चित्रसेन आदि
तेरह करोड़ गंधर्व अपने बल तथा शौर्य का प्रदर्शन करते हुए हनुमान् से कहने लगे—'यह
देवगण का निवास है । यह मेरु-तुल्य पर्वत है और यह जगत् का जीवन है । इसे
तुम मत ले जाओ । तुम इसे नहीं ले जा सकोगे । इसलिए इसे यही छोड़ जाओ । यदि
नही मानोगे, तो तुम्हारे प्राण नही बचेंगे ।' तब युद्ध में यम की भाँति भयंकर दीखनेवाले
हनुमान् ने क्रुद्ध होकर उनकी ओर देखा और उन्हें अपनी पूँछ-रूपी पाश से बाँधकर,
तेजी से घुमाया और कुछ लोगो को समुद्र में फेंक दिया, कुछ लोगो को मार डाला और
कुछ लोगो को पृथ्वी पर पटककर नष्ट कर दिया । उस महावीर की उद्धत शक्ति देखकर
गधर्वो ने सोचा कि उसको पराजित करना असंभव है । अत, दीन होकर उन्होने हनुमान् के
समक्ष वडी भक्ति के साथ हाथ जोडकर कहा—'हे कपिकुंजर, हे वानरेन्द्र, आप इस पर्वत
को ले जाइए ।' इस प्रकार कहते हुए गंधर्व-वीर आशीर्वाद देकर चले गये, तब पवनपुत्र
उस पर्वत को उठाकर आकाश की ओर उड़ा और अपने भयंकर वेग से भूचर तथा खेचर
को आश्चर्य-चकित करते हुए जाने लगा ।
१२८. भरत का स्वप्न
उसी दिन अर्द्धरात्रि के समय भरत ने स्वप्न में देखा कि राम तथा लक्ष्मण
रण-भूमि में सिर पर तैल लगाये हुए, क्लान्त शरीर तथा बलहीन हो, पक के मध्य में
पडे छटपटाते हुए रुदन कर रहे हैं । यह देखकर भरत चौंककर जाग पड़े और अपने
दुःस्वप्न के कारण व्याकुल होते हुए घर से वाहर निकल आये । वे वार-वार स्वप्न में
देखी हुई राम-लक्ष्मण की दशा की कल्पना करके व्याकुल होते रहे । साथ-ही-साथ, उसी
समय उन्होंने कई और दुःशकुन देखे, तो वे और भी भयभीत हो सोचने लगे, यह कैसा
पाप है ? कैसा अपशकुन है ? न जाने भविष्य में क्या होनेवाला है ? न जाने वन में
राम तथा लक्ष्मण को क्या हो गया है ? न जाने, जानकी की क्या दशा हुई ? चौदह
वर्ष पूरे होने को हैं, किन्तु उनका कोई समाचार नहीं मिल रहा है । सत्यनिष्ठ, उदार,
सदाचारी, कृतार्थ, उन लोगों के लिए मैं अपना सारा पुण्य अर्पण करता हूँ, जिससे
उनपर कोई विपत्ति न आये ।
इस प्रकार सोचकर भरत ने तुरन्त वेदनिष्ठ ब्राह्मणों को बुलाया और वेदविधि से
सब प्रकार के दान-धर्म आदि करके, हवन आदि के द्वारा शान्ति-कर्म कराया ।
उसी समय हनुमान् आकाश-मार्ग से चंचल वाल-सूर्य की भाँति, नदीग्राम के ऊपर
होकर जाते हुए, जटाभार एवं वल्कल धारण किये हुए, राम के समान दिखाई पडनेवाले,
घनश्याम वर्णवाले सूर्यवंशज भरत को देखकर अत्यन्त आश्चर्य-चकित हो सोचने लगे—
'क्या सौमित्र की मृत्यु हो जाने से सीता को भी तजकर रामचन्द्र अकेले यहाँ आ गये हैं?,
क्या मैं इनसे पूछकर जान लूँ ?' फिर, वह कपिकुलोत्तम हनुमान् (भरत से) न पूछने
का निश्चय करके मन-ही-मन सोचने लगा—'रघुराम शरणागतरक्षक, सद्धर्मनिरत तथा
श्रेष्ठ वलशाली हैं । क्या, वे अपने सत्य तथा यश की उपेक्षा करके अपनी धर्मपत्नी तथा
अनुज को त्याग कर सुग्रीव आदि वानर-वीरों को युद्ध-क्षेत्र में ही छोड़ रावण को सजीव
छोड़कर अकेले यहाँ आयेंगे ? ऐसा कभी नहीं हो सकता । एक साधारण मनुष्य की भाँति
सोचकर मैने राम के प्रति अपराध किया है । कदाचित् राम से मिलता-जुलता कोई और
तपस्वी यहाँ रहता होगा ।' इस प्रकार सोचते हुए हनुमान् शीघ्रगति से लका के मार्ग में
जाने लगे ।
उसी समय भरत आकाश-मार्ग से जानेवाले हनुमान् को देखकर सोचने लगे—
'न जाने क्यों यह दुष्ट-ग्रह यहाँ दिखाई पड़ रहा है । इसे अपने भयंकर वाणों से नीचा
गिराना चाहिए ।' ऐसा निश्चय करके शक्तिशाली धनुष-वाण हाथ में लेकर वे वाण चलाने
का उपक्रम करने लगे । उसी समय आकाशवाणी हुई—'हे अनघ, तुम इसके प्रति मित्र-
भाव रखो, यह तुम्हारा हित है, इस पर तुम क्रोध मत करो ।' इस आकाशवाणी को सुन-
कर भरत ने धनुष-वाण नीचे डाल दिया ।
१२९. हनुमान् का माल्यवान् से युद्ध करना
निदान हनुमान् समुद्र के निकट पहुँच गया । इतने में रावण की आज्ञा से माल्यवान् ने
अपने दस करोड़ महाबली तथा पराक्रमी राक्षम-सैनिकों के साथ आकर हनुमान् का
मार्ग रोका । हनुमान् ने द्रोण पर्वत को सावधानी से थामे हुए, उन राक्षसों का सामना
किया । राक्षस-वीर भी वडी भयंकर गति से हनुमान् से भिड गये और परशु, तोमर, चक्र,
शूल, करवाल एवं मुद्गर आदि अस्त्र चलाते हुए हनुमान् को मारने लगे । किन्तु, अनुपम
विक्रमी पवनकुमार ने उनके प्रहारों की परवाह किये बिना, अपनी भयंकर पूँछ में राक्षस-
वीरो को बाँधकर समुद्र में फेंक दिया, उसने कुछ राक्षसो को पद-प्रहार से मार डाला,
कुछ वीरो को अपने भयंकर गर्जन से मार डाला, कुछ राक्षसो का अपनी पूँछ से संहार
किया और अपनी दृष्टि-मात्र से कुछ राक्षसो का वध कर दिया । कुछ राक्षसो को उसने
नीचे गिरा दिया, कुछ राक्षसो को दबा दिया और कुछ को चीर डाला ।
तब माल्यवान् क्रोधोन्मत्त होकर यम के समान भयंकर रूप धारण किये हुए हनुमान्
पर शर-वृष्टि करने लगा । किन्तु, हनुमान् ने उन वाणो को अपनी पूँछ से ही तोड़ डाला
और क्रोध से उसके धनुष को खंड-खंड कर दिया । फिर, उसने अपनी पूँछ से माल्यवान् के
पैरो को बाँधकर ऊपर उठाया और पृथ्वी पर पटक दिया । तब माल्यवान् ने हनुमान् पर
अपना शूल चलाया । उसकी भी उपेक्षा करके खड़े हुए हनुमान् को देखकर उस राक्षस ने
अपनी शक्ति से उसके वक्ष पर भयंकर प्रहार किया । इस आघात से हनुमान् के वक्ष से
रक्त की धारा बहने लगी । हनुमान् थोड़ी देर तक मौन खडा रहा, और फिर अत्यधिक
रोष से उस राक्षस के सिर पर भयंकर पद-प्रहार करके आकाश में जाकर उड़ गया ।
इससे राक्षस का सिर फूट गया और उससे रक्त की धारा बहने लगी । माल्यवान् इस
भयंकर प्रहार से थोड़ी देर तक मूच्छित पडा रहा, किन्तु शीघ्र ही सचेत होकर उसने हनुमान्
पर अपनी गदा फेंकते हुए कहा-'युद्ध में यही गदा तुम्हारा अन्त कर देगी ।' उस गदा
के लगने से भयंकर ज्वालाएँ निकल पडी । यह देखकर माल्यवान् ने कहा-'हे वानर,
इस पर्वत को समुद्र में फेंककर जाओ, तो मैं तुम्हारा वध नहीं करूँगा । पूर्वकाल में समुद्र
के मध्य में गरुड पर आरूढ हो विष्णु स्वयं मुझसे युद्ध करने आया था और मुझे अजेय
जानकर लौट गया था । मेरा प्रताप सारा संसार जानता है, तुम मुझसे युद्ध नही कर सकते ।'
तब हनुमान् ने माल्यवान् को देखकर क्रोध से कहा-'हे वृद्ध राक्षस, मेरे प्रताप से
भीत हुए बिना तुम मुझसे युद्ध करने चले हो ? तुम्हारी शक्ति ही कितनी है ?'
हनुमान् के इन दर्प-पूर्ण वचनो को सुनकर माल्यवान् का क्रोध और भी बढ़ गया । उसने
अपने भयंकर खड्ग चन्द्रहास को निकालकर उद्धत शक्ति से उसे हनुमान् पर चलाया ।
हनुमान् के वज्रसम शरीर पर लगते ही वह चन्द्रहास चूर-चूर हो गया । उस खड्ग के
प्रहार से हनुमान् ने थोडी देर तक पीड़ा का अनुभव किया, किन्तु शीघ्र ही संभलकर
अपनी भयंकर पूँछ को उस राक्षस के कण्ठ में लपेटकर आकाश में बडे वेग से घुमाकर
फिर समुद्र में फेंक दिया । माल्यवान् समुद्र में गिरकर उसी मार्ग से पाताल में पहुँच गया।
हतशेष राक्षस धैर्य खोकर भाग गये । पर्वत जैसी विशाल विजय को तथा पर्वत को लिये हुए
हनुमान् आगे बढा, तो सभी देवता उसकी प्रशंसा करने लगे ।
१३०. लक्ष्मण के लिए राघव का शोक
द्रोण पर्वत की दीप्ति को दूर से देखकर सूर्यवशज राम को भ्रम हुआ कि प्रभात
होनेवाला है । तब अत्यन्त भय-विह्वल हो, समरलक्ष्मी-रतिश्रांत लक्ष्मण को रण-शय्या
पर सोते देखकर राम कहने लगे-'हे लक्ष्मण, तुम्हारे जैसे अनुज के रहने से ही में वन-
गमन की तपस्या का भार वहन कर सका । वह देखो, संसार के समस्त जीवो के लिए
दिन निकल रहा है, किन्तु मेरे लिए दिन डूब रहा है । मैं वन में पत्नी को खो बैठा
और युद्ध में तुमको खो दिया । हे सौमित्र, अब मुझे संप्राप्त अपयश-रूपी पंक को कौन
धो सकेगा ? यदि माता सुमित्रा मुझे देखकर कहें कि हे तात, बडी तपस्या के उपरान्त
प्राप्त, उन्नत, पुण्यशील, महनीय चरित्रवान्, मानधन अपने पुत्र को मैंने तुम्हारा विश्वास
करके तुम्हें सौंपा था । ऐसे पुत्र को वन में ले जाकर तुमने उसका अन्त कर दिया, अब
मैं क्या करूँ ? तब मैं उनसे क्या कहूँगा ? मुझसे मिलने के लिए जब भरत तथा शत्रुघ्न
आयेंगे और पूछेंगे कि लक्ष्मण कहाँ है, तो मैं क्या उत्तर दूँगा ? दीन होकर मैं वहाँ
जाऊँगा भी कैसे ? मैं इसके कारण चिन्तित तथा दुखी नहीं हूँ । मेरी चिन्ता का कारण
दूसरा है । पापी रावण के दुष्कर्मों को देखकर मन-ही-मन दुखी हो, अपने भाई का
त्याग कर मेरा मित्र तथा सेवक बनकर विभीषण ने मेरी शरण ली । ऐसे शरणार्थी
विभीषण को आश्वासन देते हुए मैंने कहा था---'मैं तुम्हें राक्षसों का राज्य देता हूँ ।'
मैंने उसका राज्यतिलक भी कर दिया । किन्तु, उस प्रण को पूरा करने की क्षमता मुझमें
नही रही । लो, सूर्योदय भी होने लगा है, अब लक्ष्मण के बचने की आशा नही है ।
मुझे भी अब जीवित नही रहना चाहिए। पापरहित लक्ष्मण के जीवन के साथ ही मेरा जीवन है।
अब यह शोक मेरे लिए असह्य हो गया है । किन्तु, शरणार्थी को त्यागना नही चाहिए,
इस पृथ्वी पर यह क्षत्रियों का धर्म नहीं है । राजाओं को चाहिए कि स्वयं दुख भोगते
हुए भी, अपने आश्रितों की रक्षा करे । इसलिए हे सुग्रीव, तुम इस विभीषण को साथ
लेकर अयोध्या जाओ और पुण्यात्मा भरत को यहाँ का सारा समाचार समझाकर कहो
और उन्हें मेरा यह आदेश सुनाओ कि वह इस विभीषण को लंका के बदले अयोध्या का
राज्य देकर पुण्य-लग्न में इसका राजतिलक कर दे । उसके पश्चात् तुम तथा वालिपुत्र
दोनों अपनी सेनाओं को लेकर किष्किन्धा को लौट जाना ।"
राम को ऐसे दीन वचन कहते सुनकर सुग्रीव अत्यन्त सभ्रमित हुआ । वह सान्त्वना
देते हुए कहने लगा--'हे देव ! ध्यानपूर्वक देखने से पता चलता है कि अभी प्रभात नही
होगा । अभी तो रात का चौथा पहर प्रारंभ हुआ है । वायुपुत्र शीघ्र आ जायगा ।
आप संताप त्यागिए ।' फिर भी, राम अत्यधिक शोकाग्नि में जलते हुए पृथ्वी पर लोट-
लोटकर कहने लगे--'हे तात, मैं जब पिता की आज्ञा से अकेले वन के लिए चला, तो
तुम विना पिता के आदेश लिये ही अपने-आप मेरे साथ चले आये और असंख्य दुःख
भोगते रहे । इसे देखकर मैं बहुत दुखी होता था । आज तुम शत्रु के हाथों में अपनी
शक्ति खोकर इस प्रकार पृथ्वी पर पड़े हुए हो । अब मैं कैसे जीवित रह सकूँगा ?
कैसे यह दुख सह सकूँगा ? कौन-सा मुंह लेकर अयोध्या को लौटूंगा ? अब मुझे सीता
किसलिए चाहिए ? अब मेरा जीवन ही किस काम का है ? मुझे अब राज्य किसलिए
चाहिए ? जिस दिन पिता ने मुझे यहाँ भेजा, उसी दिन से तुम मुझे पितृवत् मानते आ
रहे हो । मेरे भाग्य ने आज रुष्ट होकर रावण के द्वारा तुम्हारी ऐसी गति करा दी ।
भिन्न-भिन्न देशों में खोजने के पश्चात् योग्य पत्नियों को प्राप्त किया जा सकता है, देश-
देशान्तरों में भ्रमण करके वधु-जनों को भी प्राप्त कर सकते हैं, किन्तु अनुज को प्राप्त
करना असम्भव है ।' इस प्रकार, विलाप करते हुए राम अनुज के चेतना-हीन शरीर पर