रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविघ्न पड गया । कदाचित् में यहाँ इस प्रकार मर जाऊँगा । हाय, अब क्या उपाय है ?'
फिर, हनुमान् ने यह निश्चय करके कि इसके पेट में पहुँचकर में इसका वध कर डालूँगा,
मकरी को अपना शरीर निगलने दिया । निदान वह भुजबली अधकूप के सदृश दीखनेवाले उस
मकरी के उदर में पहुँच गया । वह मकरी वडी प्रसन्नता से जल के मध्य-भाग में चली गई ।
तब हनुमान् भयंकर क्रोध से उस मकरी की आँतो तथा नसो को ऐंठने और तोडने
लगा और विषग्रास की भाँति उस महा मकरी के उदर में अविराम गति से जहाँ-तहाँ
घूमते हुए अग्नि की भाँति उसका उदर जलाने लगा । तब वह मकरी धैर्य खोकर प्यास
की तीव्रता का सहन नही कर सकने के कारण अपने सूखे हुए मुख-गह्वर को खोलकर पड
रही । तब क्रूर नक्र, ग्राह आदि से युक्त जल-प्रवाह हनुमान् पर गिरने लगा ।* तब वायुपुत्र
काटी हुई आँतो का पिंड बनाकर बाहर ले आया और शीघ्र उसका गला घोट दिया ।
मकरी ने भी यह सोचकर कि यह आहार पचाने-योग्य नही है, अवश हो पडी रही । तब
हनुमान् ने उसे तट पर घसीटकर उसको चीर डाला । उस समय उस मकरी के रक्त से
युक्त वह सरोवर प्रलय-काल में भयकर वडवानल की ज्वालाओ से युक्त समुद्र के समान
लाल दीखने लगा ।
तब वह मकरी देव-स्त्री का रूप धरकर अपनी चंचलता छोडकर, स्थिरता के साथ
वादलो में प्रकाशित होनेवाली बिजली की भाँति विमान में बैठी आकाश-मार्ग में दिखाई
पडी । पवन-पुत्र के पुण्य प्रताप से शापमुक्त हो वह अत्यन्त हर्षित हुई और वह देव-स्त्री
हनुमान् को देख कर बोली--'हे कपिकुंजर, हे वानरेन्द्र, में तुम्हारे कारण आज शापमुक्त
हुई । मैं अभी इन्द्रलोक में जा रही हूँ । जाने से पहले में तुम्हें एक बात बतलाना चाहती हूँ ।'
इतना कहकर हनुमान् को सरोवर के निकट भेजनेवाले उस कपट-तपस्वी को दिखाकर
बोली--'हे कपिश्रेष्ठ, यह कोई मुनि नही है । इस पर विश्वास मत करो । यह एक
राक्षस है और दानवेन्द्र के आदेश से तुम्हें मारने के लिए यहाँ आया है । मेरे इस सरोवर
में रहने की बात जानकर मुझसे तुम्हें मरवाने के लिए ही यहाँ भेजा । यह वध्य है । इस पर
विश्वास मत करो । वह यहाँ रहने योग्य नही है । अत, तुम शीघ्र इसका सहार करके
ओषधियो को प्राप्त करने के लिए जाओ । द्रोणाद्रि पहुँचने का मार्ग यही है ।'
१२६. धान्यमालिनी का वृतांत
देव-रमणी की बातें सुनकर हनुमान् को आश्चर्य हुआ । उसने उस रमणी को देखकर
कहा--'हे सुन्दरी, पहले तुम मकरी कैसे हुई और फिर अब देव-कान्ता कैसे बनी ?' तब
वह कहने लगी--'हे वीरवर, हे पावनचरित, हे कनकाद्रिसम धीर, में धान्यमालिनी नामक
गंधर्व-कन्या हूँ । मैं अपना पूर्व-वृत्तात सुनाता हूँ, सुनो । अखिल लोक के आराध्य सदाशिव
जब रजताद्रि पर गोष्ठी में बैठे थे, तब मैंने अपनी नृत्य तथा संगीत-कला का प्रदर्शन
करके उनको प्रसन्न किया और उनसे एक अनुपम विमान प्राप्त किया । उस विमान में बैठकर
मैं प्रतिदिन इस सरोवर में जलक्रीडा करने आने लगी । एक दिन की बात है कि शाण्डिल्य
*विशाल मकरी के मुंह खोलने से उसके मुख से होकर मीन, ग्राह आदि के साथ
सरोवर का जल उसके शरीर के अन्दर बहने लगा ।—ले०