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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 444, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 444

ध्यान दिया ? कुभकर्ण ने जव कहा था कि राम से आप क्यो विरोध ठानते हैं, तो क्या
आप क्रुद्ध नहीं हुए ? इस कार्य से विमुख होने का उपदेश जिन लोगों ने दिया था, उनके
ही वचन आज सिद्ध हुए हैं न ? अपने भुजवल तथा पराक्रम को छोड़कर आज आपने
मुनि-वृत्ति क्यों स्वीकार की है ? इन्द्र से युद्ध करके भी आप परास्त नहीं हुए, अव आप रामचंद्र
को परास्त नहीं करेंगे, तो क्या लोग आपका उपहास नहीं करेंगे ? हे असुरेश्वर, आप युद्ध
करके शत्रु पर विजय पाइए । दीन होकर आप यह सव क्या कर रहे हैं ?"
इस प्रकार जब मंदोदरी ने रावण को उत्तेजित किया, तब रावण ने लज्जा से एक
दीर्घ निःश्वास छोड़ा और कहा—'हे सुंदरी, तुम्हारी वातें सत्य हैं । अव मैं रामचन्द्र से
नहीं डरूँगा । अव तुम जाओ ।' तब प्राणेश्वर को प्रणाम करके आँखों से अश्रु-वर्षा करती
हुई वह चली गई । उसके कहे हुए दुःखपूर्ण वचनों का स्मरण करके रावण ने हवन करना
छोड़ दिया और युद्ध की तैयारी करने के लिए चला गया ।
१२२. लक्ष्मण की मूर्च्छा पर राम का शोक
युद्ध-भूमि में रक्त में भीगे, निश्चेष्ट पड़े हुए शेषनाग के सदृश दीखनेवाले अपने
प्रिय अनुज को देखकर रामचंद्र अधीर होकर शोक करने लगे । वे कहने लगे—"सौमित्र
को इस प्रकार पृथ्वी पर गिरे हुए देखकर मैं किस प्रकार अपने प्राणों को रोक सकता हूँ ?
युद्ध करने की शक्ति मुझमें कैसे आयगी ? अपनी मुष्टि में धनुष कैसे धारण कर सकूँगा ?
आँखों में आंसू उमड़-उमड़कर आते समय, बढ-बढ़कर आनेवाले शत्रुओं को मैं कैसे देख
सकूँगा ? मेरी आँखों के सामने मेरा सहोदर, मेरा प्रिय बंधु, मेरा प्रिय सखा मेरे लिए
प्राणों की वलि देकर मुझे छोड़कर चला गया है । धिक्कार है, मेरे शौर्य को । मुझे
अव इस युद्ध की आवश्यकता ही क्या है ? मुझे विजय ही किसलिए चाहिए ? मुझे अव
राज्य की क्या आवश्यकता है ? मुझे अव सीता ही क्यों चाहिए ? मेरा यह शौर्य किस
काम का ? मैं अव जीवित ही क्यों रहूँ ? हे लक्ष्मण, तुम्हारे साथ मैं भी स्वर्ग चलूँगा ।
हे बंधु, विजयी होकर तुमने पहले शरभ-शार्दूलों से भरे हुए भयंकर वनों में मेरी रक्षा
करते रहे, अव यहाँ तुच्छ दैत्यों के वन के बीच मुझे पराया समझकर छोड़ दिया है ।
हे तात, अपनी उन्नत शक्ति से मेरी रक्षा करने के निमित्त वन में तुम एक क्षण भी
नहीं सोये ? आज इस प्रकार दीर्घ निद्रा में सो जाना क्या तुम्हें उचित है ? मैं वार-
वार दुःख के आवेग से ऊँचे स्वर में तुम्हें पुकारता हूँ, फिर भी तुम बोलते क्यों नहीं हो ?
अव मेरे लिए कौन है ? मैं कहाँ जाऊँ । मैं अंत में शोकाग्नि के हाथों में पड़ गया हूँ ।
शुभलक्षण-सपन्न, सुन्दराकार, अद्वितीय वलवान्, परम भक्त तथा प्रिय सहोदर, गम्भीरचेता,
युद्धविजयी मेरा प्राण-सखा लक्ष्मण मेरे साथ वनवास के लिए आया । अव मैं इसी के साथ
स्वर्ग जाऊँगा । कितने ही बंधु हैं और कितनी ही पत्नियाँ हैं, किन्तु ऐसा सहोदर
पृथ्वी में कहाँ मिलेगा ? यत्न करूँ, तो सीता की समता करनेवाली पत्नी को मैं कहीं-न-
कहीं प्राप्त कर सकता हूँ; पर ऐसे सद्गुणशील, दयालु तथा महावली अनुज को मैं
कहाँ पाऊँगा । क्या, यह केवल मेरा अनुज था ? यह महाबली सतत मेरी सेवा करने-
वाला भक्त भी था । यही मेरा पौरुष था, यही मेरी शांति था, यही मेरी कीर्त्ति था,