रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२२ रंगनाथ रामायण
वह लता है,' ऐसा विचार करके उसके पास पहुँचता, तो वह लता छिप जाती । यह देखकर
हनुमान् मन-ही-मन दुखी हो कहने लगा—'हे पर्वतेश्वर, हे पर्वतराज, हे पुण्यात्मा, अनघ
रघुराम की आज्ञा से दिव्य ओषधि ले जाने के निमित्त मै आया हूँ । हे नगराज, जो कार्य
समस्त लोको के हित में है, उसको सपन्न करने के लिए आये हुए मुझे आप क्यो इस
प्रकार धोखा दे रहे हैं ? आप शीघ्र अपने पास रहनेवाली ओषधि-लताओ को प्रकट कीजिए।
मुझे शीघ्र जाना है । हे ओषधि-लताओ, यह कार्य लोक-हितार्थ है । अत, मै आपसे प्रार्थना
करता हूँ कि आप अपनी सुन्दर आकृति दिखाइए ।' इस प्रकार प्रार्थना करने पर भी
वे लताएँ अपने रूप छिपाये रही । तब हनुमान् ने फिर कहा—'हे नगकुलतिलक, मेरे
आगमन को देखकर आपने मेरा उचित सत्कार नहीं किया, यह उचित नही है ।'
कई बार विनम्र प्रार्थना करने पर भी जब उस पर्वत ने दिव्य ओषधि-लताओ
को नहीं दिखाया, तब हनुमान् अत्यन्त क्रुद्ध हुआ और कहने लगा—'हे नगकुलाधम, मेरे
इतनी प्रार्थना करने भी तुम्हारा मन मेरी ओर द्रवीभूत नहीं हुआ । भला, गुणहीन तथा
कठोर पत्थर में दया कैसे उत्पन्न होगी ?'
इतना कहते-कहते हनुमान् की क्रोधाग्नि की ज्वालाएँ उनके रोम-रोम में व्याप्त
हो गई । तुरन्त उसने दस योजन विशाल तथा दस योजन ऊँचा रहनेवाले उस भयंकर पर्वत
को सहज ही उखाड़ लिया, मानो यह बता रहा हो कि मैं राम का सामना करनेवाले रावण-
रूपी पर्वत को भी इसी प्रकार उखाड डालूँगा । उस समय सारी पृथ्वी हिल उठी और
आकाश काँपने लगा ।
इन्द्र के आदेश से उस पर्वत की रक्षा करनेवाले अग्नि-सम तेजस्वी चित्रसेन आदि
तेरह करोड़ गंधर्व अपने बल तथा शौर्य का प्रदर्शन करते हुए हनुमान् से कहने लगे—'यह
देवगण का निवास है । यह मेरु-तुल्य पर्वत है और यह जगत् का जीवन है । इसे
तुम मत ले जाओ । तुम इसे नहीं ले जा सकोगे । इसलिए इसे यही छोड़ जाओ । यदि
नही मानोगे, तो तुम्हारे प्राण नही बचेंगे ।' तब युद्ध में यम की भाँति भयंकर दीखनेवाले
हनुमान् ने क्रुद्ध होकर उनकी ओर देखा और उन्हें अपनी पूँछ-रूपी पाश से बाँधकर,
तेजी से घुमाया और कुछ लोगो को समुद्र में फेंक दिया, कुछ लोगो को मार डाला और
कुछ लोगो को पृथ्वी पर पटककर नष्ट कर दिया । उस महावीर की उद्धत शक्ति देखकर
गधर्वो ने सोचा कि उसको पराजित करना असंभव है । अत, दीन होकर उन्होने हनुमान् के
समक्ष वडी भक्ति के साथ हाथ जोडकर कहा—'हे कपिकुंजर, हे वानरेन्द्र, आप इस पर्वत
को ले जाइए ।' इस प्रकार कहते हुए गंधर्व-वीर आशीर्वाद देकर चले गये, तब पवनपुत्र
उस पर्वत को उठाकर आकाश की ओर उड़ा और अपने भयंकर वेग से भूचर तथा खेचर
को आश्चर्य-चकित करते हुए जाने लगा ।
१२८. भरत का स्वप्न
उसी दिन अर्द्धरात्रि के समय भरत ने स्वप्न में देखा कि राम तथा लक्ष्मण
रण-भूमि में सिर पर तैल लगाये हुए, क्लान्त शरीर तथा बलहीन हो, पक के मध्य में
पडे छटपटाते हुए रुदन कर रहे हैं । यह देखकर भरत चौंककर जाग पड़े और अपने