रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४९२ रंगनाथ रामायण
करने लगे । शक्ति-वाण के लगते ही लक्ष्मण चकराकर पृथ्वी पर ऐसे गिर पड़े,
जैसे प्रलय-काल में महामेरु पर्वत ढह जाता है ।
धरती पर पड़े हुए अपने अनुज को देखकर, राम का हृदय शोकाग्नि से जलने
लगा और आँखों से अश्रुपात होने लगा । लक्ष्मण के विशाल वक्ष में अच्छी तरह गड़े हुए
उस शक्ति-वाण को निकालने के लिए सभी वानर-वीर यत्न करने लगे, किन्तु उनसे वह
निकल नहीं सका । तब राम ने रावण के द्वारा चलाये जानेवाले वाण-समूह की उपेक्षा
करते हुए, उस शक्ति वाण को लक्ष्मण के वक्ष से निकालकर फेंक दिया । उसके पश्चात्
उन्होंने सभी वानर-वीरों को देखकर कहा—"हे वीरो, अपना शौर्य प्रदर्शित करने का यही
समय है, शोक में पड़कर युद्ध से विमुख होने का समय नहीं है । अब तुम लोग लक्ष्मण
की रक्षा करते रहो और मेरी यह प्रतिज्ञा सुन लो । मैं आज इस दुष्कर्मी दशकंठ का
संहार करके, उन सभी दुःखों को दूर करूँगा, जिन्हें मैंने, राज्य छोड़ने, बन्धुजनों से अलग
होने, वनों में भटकने, धनुष-वाण लिये हुए भी, अपनी प्राण-प्रिय धर्म-पत्नी को खोने तथा
मायावी राक्षसों से युद्ध करने से प्राप्त किया था । समर-भूमि में इसका वध करने के लिए
मैंने असमान विक्रमी वालि का संहार किया और कपिराज के रूप में सुग्रीव का अभिषेक
किया । प्रचंड ग्राह-संकुल तथा आकाश का स्पर्श करनेवाली तरंगों से युक्त अनंत सागर
पर सेतु बाँधकर मैं कपि-सेना के साथ समुद्र को पार करके आया और लंका को घेर
लिया । यहाँ अब मैं अपने सौमित्र को खो बैठा हूँ । यदि युद्ध में रावण मेरे दृष्टि-पथ में
आये, तो अपनी दृष्टि के विष से ही उसका अंत कर दूँगा, जैसे क्रूर सर्प दुष्ट जंतुओं को मार
डालता है । अब मैं दशकंठ को जीवित लौटने नहीं दूँगा, उसे मैं अपने वाण-समूह का
लक्ष्य बना दूँगा । आज सभी वानर पर्वतों पर चढ़कर हमारे युद्ध का कौशल देखते रहें ।
आज सभी दिक्पाल तथा समस्त लोक मेरे धनुर्विद्या-कौशल को भली भाँति देख लें और
युद्ध में मेरे पराक्रम को देखकर, मुझ रघुराम के विक्रम को जान लें । आज रावण भले
ही देवलोक में छिप जाय, समुद्र के गर्भ में डूब जाय, पृथ्वी में समा जाय, और रसातल
में प्रवेश कर जाय, तब भी मैं उसका संहार किये बिना नहीं छोड़ूँगा । यदि निश्चय ही
मैंने रवि-कुल में जन्म लिया है, यदि मैं रवि-समान तेजस्वी दशरथ का पुत्र हूँ, यदि मैं
राम हूँ, यदि रावण युद्ध-क्षेत्र में डटा रहा, तो मैं किसी भी प्रकार उसका वध करूँगा ।
इस युद्ध-क्षेत्र में या तो रावण रहेगा या राम रहेगा । राम तथा रावण दोनों का यहाँ
रहना अब असंभव है ।"
ऐसी प्रतिज्ञा करके राम ने दशकंठ पर भीषण वाण चलाने लगे । दशकंठ ने भी
उनके वाणों के प्रतिवाण चलाये, तो उन वाणों के परस्पर टकराने से निकलनेवाली अग्नि-
ज्वालाएँ आकाश तक व्याप्त हो गईं और घोर ध्वनि होने लगी । इस ध्वनि के साथ
धनुषों के टंकारों की ध्वनि मिलकर समस्त लोकों को भयभीत करने लगी ।
१२१. रावण का चिंतित होना
राम के वाणों के प्रहार से रावण जर्जर हो गया और उनके वाणों के वेग का
सहन न कर सकने के कारण राक्षसेन्द्र, सिंह को देखकर भागनेवाले गजराज की भाँति,