रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 445, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंयुद्धकांड ४१५
यही मेरी प्रेरणा था, यही मेरा शौर्य था, यही मेरा धैर्य तथा विनय था और यही मेरी
विजय था । इतना ही क्यो, मेरे लिए भाग्य-देवता तथा मेरा पावन राज्य-पद भी यही था ।”
इस प्रकार, जब राम शोक से अभिभूत हो प्रलाप कर रहे थे, तब सुषेण ने राम
को देखकर कहा—'हे देव, आप इस प्रकार शोक क्यो करते है ? आप धैर्य धरकर इनकी
ओर देखिए । यदि इनके शरीर में प्राण नही रहते, तो क्या, उनके मुख पर ऐसी आभा
दिखाई देती ? या उनकी आँखें कमलो की सुदरता लिये रहती ? या उनकी सुंदर हथेलियाँ
लाल कमल की भाँति सुशोभित रहती ?'
इस प्रकार राम को आश्वासन देकर उसने उन्हें शात किया और हनुमान् को
देखकर कहा—'इसके पहले जाबवान् के कहने से तुम ओषधियो का पता जानते ही हो ।
महाद्रोण पर्वत के, दक्षिण शिखर पर विशल्यकरणी, सौवर्णकरणी, सधानकरणी तथा
सजीवकरणी ओषधियाँ अपनी काति से प्रकाशित रहती है । तुम शीघ्र इन चारो ओषधियो
को ले आओ । उनकी सहायता से लक्ष्मण के प्राण लौट आयेंगे । पूर्वकाल में देवासुरो ने
क्षीर-सागर का मथन करके जो अमृत प्राप्त किया था, उसे वही छिपा रखा है । उसी
अमृत से इन ओषधी-लताओ ने जन्म लिया है । लवण-समुद्र को पार करके जाने के बाद
कुशद्वीप मिलेगा, उसे पार करके आगे बढो, तो क्षीर-सागर मिलेगा । उसे भी पार कर
जाओ, तो चद्र तथा द्रोण पर्वतो को देखोगे । वहाँ देवेन्द्र की आज्ञा से मदराचल की भाँति
विशालकाय गधर्व उन ओषधियो की रक्षा करते रहते हैं । गधर्वों से तुम्हारा युद्ध होगा ।
वही राक्षस भी घूमते रहते हैं । वे बडे मायावी हैं, उनसे सावधान रहना । द्रोणाद्रि से
उन ओषधियो को लाकर, लक्ष्मण के प्राणों को लौटाओ, जिससे रघुपति प्रसन्न हों । यहाँ
से वह पर्वत तेईस लाख, बीस हजार दो सौ दस योजन दूर है । तुम वायु-वेग से जाकर
सूर्योदय के पहले ही यहाँ लौट आओ । सूर्योदय हुआ, तो वे ओषधियाँ अपनी काति खोकर
शक्तिहीन हो जायेंगी । उसके पश्चात् लक्ष्मण को मूर्च्छा से जगाना असभव होगा । इसलिए
हे वानरोत्तम, तुम शीघ्र जाकर वापस आओ । उन ओषधियो के लक्षण भी तुम्हें जान
लेना चाहिए । उनके फल हरे होगे, फूल लाल होगे और पत्ते सफेद होगे । तुम शीघ्र
विभीषण, जाबवान्, सुग्रीव तथा अगद की अनुमति लेकर जाओ ।'
सुषेण के इन वचनो को सुनकर हनुमान् ने कहा—'ऐसा ही हो ।' तब पवनपुत्र
को देखकर राम ने कहा—'मूर्च्छित पडे हुए लक्ष्मण को प्राण-दान करके तुम त्रिभुवनो में
अचल कीर्ति प्राप्त करो । मेरे तीन भाई हैं । हे अनिलकुमार, आज से तुम्हारे साथ मेरे
चार भाई होगे ।'
१२३ सजीवनी लाने के लिए हनुमान् का द्रोणाद्रि को जाना
राम की बातें सुनकर हनुमान् ने कहा—'हे सूर्यकुलतिलक, सेवक हनुमान्
के रहते हुए आप चिंता क्यो करते है ? हे राजन्, आपकी आज्ञा शिरोधार्य करके शीघ्र
ही सप्त द्वीपो के उस पार रहने पर भी ओषधियो के उस पर्वत को सूर्य के उदयाचल
पर आने के पहले ही ले आऊँगा ।' इस प्रकार कहते हुए उसने राम के चरणो पर गिर-
कर प्रणाम किया । तब राम ने उसे उठाकर हृदय से लगा लिया और कहा—'हे अजनि-