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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 448, कुल 508 में से

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पृष्ठ 448

का ग्रहण कैसे कर सकता हूँ ? मेरी प्यास थोड़े-से जल से नही बुझेगी । क्या यहाँ कोई
सरोवर नही है ?' तब उस कपट-मुनि ने कहा- 'यहाँ से समीप में ही एक दिव्य सरोवर है।
यदि तुम उस सरोवर में आँखें बन्द करके उसके अमृत-सम निर्मल जल का पान करोगे,
तो तुम्हारा शरीर दिव्य हो जायगा और दिव्य ओषधि तुम्हें तुरन्त दिखाई पड़ेगी।' इतना कहकर
हनुमान् को मार्ग बताने के लिए उस कपटमुनि ने शिष्यो को भेजा ।
हनुमान् कपटमुनि के शिष्यो की सहायता से उस सरोवर के पास पहुँचा । उस
सरोवर के तट पर आम, मदार, माधवी, वकुल, सागवान, कुटज, चन्दन, साल, नीम, अर्जुन,
अशोक, निंबु, कदम्ब, तमाल आदि के वृक्ष सुशोभित थे । सरोवर में सुन्दर तथा
कोमल कमल, कल्हार तथा विमल कैरव विकसित थे । कही कलहंस कल-कूजन करते हुए
विलासपूर्ण गति से परस्पर कौतुक करते हुए विहार कर रहे थे, कही हंस की चोचो
का स्पर्श करनेवाले वक, क्रौंच तथा कारण्डव पक्षियो का समूह विचरण कर रहा था । किसी
स्थान पर कैरव-मुकुलो के अग्र-भाग पर भ्रमर झुंड-के-झुंड अचल बैठे हुए मधुपान कर रहे थे
और किसी स्थान पर भ्रमर-समूह मकरन्द-पान करने के निमित्त आया हुआ था, किन्तु
कमलिनियो के विकसित न होने के कारण गायको की तरह उसके चारो ओर मँडराते हुए
फिर रहे थे । तोते की चोचो से चीरे जाने से फलो का रस, पत्तो से होकर लाल
कमलिनियो पर ऐसे झर रहा था, मानो सरोवर के तट पर स्थित आम के वृक्ष शिव से
(वसन्त के मित्र) कामदेव को फिर प्राप्त करने के उद्देश्य से अग्नियो में घी की आहुति
दे रहे हो । दूसरे स्थान में लाल कमलिनियो में झरनेवाला फलो का रस पान करके
मधुप आकाश की ओर ऐसे उड़ रहे थे, मानो होमकुंड से धुआँ उड़ रहा हो । वह
सरोवर ऐसा दीख रहा था कि मानो कमलपत्र-रूपी थालियो में हिम-शीकर-रूपी
अक्षत रखे हुए, उत्फुल्ल कुवलयो के लोचनो से, हनुमान् के आगमन की प्रतीक्षा कर रहा हो ।
उस सरोवर को देखकर हनुमान् अत्यधिक हर्षित हुआ और आँखें बन्द करके उस
सरोवर में उतर गया और अत्यधिक प्यास के कारण जल का पान करने लगा ।
१२५ मकरी का हनुमान् को निगल जाना
संसार-रूपी सागर में विषय-रस को बडे चाव से पीनेवाले तृषित व्यक्ति को संसार
की माया जैसे निगल जाती है, वैसे ही उस सरोवर से उस समय एक विशालकाय मकरी
निकली और उसने हनुमान् के चरणो को कसकर पकड़ लिया । हनुमान् ने अपने चरणो को खींच
लेने का उद्धत शक्ति से प्रयत्न किया, किन्तु छुड़ा न सका । तब वह बड़े धैर्य के साथ
खड़े होकर देखने लगा कि वह क्या है ? ध्यान से देखने पर उसे मालूम हुआ कि वह
एक विशालकाय मकरी है । तब उसका क्रोध दुगुना हो गया और उसने भयंकर रूप
धारण करके रघुराम की विजय का आधारभूत अपनी पूँछ उठाकर दुर्वार गति से उस
मकरी के दाँतो पर प्रहार करके उन्हें गिरा दिया, मानो रावण की भोग-लालसा से संचित
पापो को ही झटका देकर गिरा दिया हो, किन्तु वह मकरी हनुमान् को निगल जाने का
उपक्रम करने लगी, मानो वह समत् मुनि के शाप-रूप रोग से मुक्त होने के लिए (हनुमान्-
रूपी) ओषधि को खाना चाहती हो । तब वायुपुत्र सोचने लगा-'हाय, राम के कार्य में