रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 443, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंयुद्धकांड ४१३
युद्ध-भूमि को छोड़कर भागने लगा । तब उसके केश खुल गये, सुदर रत्न-खचित आभूषण
बिखरने लगे, समस्त भूत तालियाँ बजाकर अट्टहास करने लगे, और वानर हर्ष के निनाद
प्रकट करने लगे । भागते समय उसके चरण-घात से पृथ्वी भी काँपने लगी ।
इस प्रकार, लका में प्रविष्ट होकर वह अपने सभा-मडप में आसीन हुआ । फिर,
वह विभीषण के हितवचनों, राम के प्रहारो का तथा कुंभकर्ण, अतिकाय, महान् इंद्रजीत
आदि वीरो की मृत्यु का स्मरण करके मन-ही-मन शोक-सतप्त हो निश्चेष्ट बैठा रहा ।
कुछ समय के उपरान्त वह सँभलकर अत पुर में पहुँचा और उद्विग्न हो, अपनी पत्नी को
बुलाकर सिर झुकाये हुए कहने लगा—'हे प्रिये, राम के अद्वितीय विक्रम का वृत्तात सुनो।
मैं कैसे कहूँ ? वह देखो, मेरे समक्ष सहस्रो राम दीख रहे हैं । मैं इस लका में जहाँ भी
देखता हूँ, वहाँ राम-ही-राम मुझे दिखाई पडता है । अब विजय की कोई आशा नही है ।
अब शकर के चरण ही मेरे लिए शरण हैं । जिस देव के दिव्य तथा भयकर बाण के
आघात से त्रिपुर भस्मीभूत हुए, जिनके मुकुट पर चन्द्रकला रमणीय गति से सुशोभित
हो रही है, जिनके हाथो में पिनाक, खड्ग, त्रिशूल आदि विलसित हैं, जो अखिल
लोक के ईश हैं, जिन्होंने दक्ष-यज्ञ का विध्वंस किया था, क्रुद्ध होकर जिन्होंने अधकासुर का सहार
किया था, वेद जिस देव की स्तुति करते हैं, तथा जो देवाधिदेव हैं, उस शिवजी की अब
मैं उपासना करूँगा ।'
इस प्रकार निश्चय करके वह स्नान आदि से निवृत्त हुआ, ब्राह्मणो को विविध
दान देकर उन्हें तृप्त किया तथा मद, दर्प आदि ( राजस भावो का ), त्याग कर
सात्त्विक भाव ग्रहण किया । उसके पश्चात् उसने, रक्ताबर, रक्त माल्य, रक्त उपवीत,
रक्त चदन तथा रक्तवर्ण की जपमाला आदि धारण की और फिर बडी भक्ति के साथ
मत्र का जप करते हुए, शिव के मदिर में पहुँचा । वहाँ एकनिष्ठ हो उसने एक वेदी
बनाई, दर्भांकुर आदि एकत्र किये । फिर सभी, दिशाओ में यज्ञ के रक्षणार्थ भयकर राक्षसो
को नियुक्त किया और यज्ञ करने के लिए उद्यत हुआ । इसकी सूचना मिलते ही मदोदरी
वहाँ आ पहुँची और दशकठ को देखकर कहने लगी—'हे दानवेन्द्र, क्या, आपको उचित है
कि इस प्रकार दीन होकर अपना शौर्य खो बैठें । आपके क्रोध करने से सभी समुद्र गर्जन
करने से डरते हैं, पवन चलने से डरता है, अग्निदेव तीव्र ज्वालाओ के साथ जलने से डरता है
और आकाश में सूर्य प्रचंड तेज से दीप्त होने से डरता है । आपके नाम से सारे जग
विचलित होते हैं । ऐसे आप, अपना साहस खोकर ऐसी दशा को क्यो प्राप्त हुए ? यदि
आपमें इतना साहस नहीं था, तो उस दिन राम की पत्नी को क्यो ले आये ? उस दिन
मारीच ने जो हित-वचन आपसे कहे थे, उन्हें आपने बुरा मान लिया और नीति-विरुद्ध
वचन कहे थे । नीति का विचार करके तथा आपके अहित की सभावना देखकर धर्मात्मा
विभीषण ने बार-बार आपसे कहा था कि हे राक्षसेन्द्र, आप अनुचित मार्ग पर क्यो जा
रहे हैं ? सीता को छोड़ देने में ही आपका हित है । किंतु आपने उनके वचनो पर ध्यान
नहीं दिया । मातामह माल्यवान् ने आपको नीति सुझाई, तो क्या आपने उसको स्वीकार
किया ? आपकी माता ने स्वयं उचित कर्त्तव्य का आदेश दिया, तो क्या आपने उन पर