रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 439, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंयुद्धकांड [Page 409]
किंतु शीघ्र ही उठकर सुग्रीव ने अपना परिघ घुमाकर उस राक्षस पर ऐसा फेंका कि वह
उसके अंगो से लगकर चूर-चूर हो गया । तब क्रोध से जलते हुए उस राक्षस ने अपने करवाल
को सुग्रीव पर फेंका, तो सुग्रीव ने उस कृपाण को लेकर उसे चमकाते हुए उस राक्षस के
मकर-कुण्डलो से दीप्त मस्तक पर ऐसा प्रहार किया कि वह पृथ्वी पर लोट गया । यह
देखकर राक्षस लका की ओर भागने लगे ।
तब सुपार्श्व ने अपने बल के गर्व से फूलते हुए अंगद की सेना पर आक्रमण किया
और तीक्ष्ण शरो के प्रहार से कुछ वानरो के सिर काट डाले, कुछ लोगो के हाथ काटे
और कुछ लोगो का सहार किया । तब वानर भयभीत होकर भागने लगे । यह देख अगद
उस राक्षस के रथ पर कूदा और उसी का परिघ छीनकर उससे उस राक्षस पर ऐसा
प्रहार किया कि वह व्याकुल होकर पृथ्वी पर लुढ़क गया । इतने में जाम्बवान् ने एक विशाल
चट्टान उठाकर उस पर ऐसा फेंका कि उसका रथ टूट गया और अश्व तथा सारथी मर
गये । इतने में सुपार्श्व सचेत हुआ और क्रोध से जलते हुए, अगद के कंधे पर दस बाण
चलाये, जाम्बवान् पर तीन बाण चलाये और गवाक्ष पर पाँच बाण चलाये । अंगद बडे
रोष से परिघ घुमाकर उस राक्षस पर फेंका, तो वह पृथ्वी पर मूर्च्छित होकर गिर पड़ा ।
इसी समय अंगद उस राक्षस का धनुष तोडने लगा, तो वह राक्षस संभलकर उठ बैठा और
परशु उठाकर उससे अगद पर ऐसा आघात किया कि अगद मूर्च्छित होकर गिर पड़ा । फिर,
शीघ्र ही सँभलकर अंगद ने अपनी वज्र-सम मुष्टि से उस राक्षस को ऐसा मारा कि वह
कुलिश के आघात से गिरनेवाले कुलपर्वत की भाँति युद्ध-भूमि में गिर पडा । यह देखकर
देवता हर्ष से निनाद करने लगे और राक्षस-सेना के पैर उखड गये । तब दशानन कहने
लगा—'महा पराक्रमी सुपार्श्व नष्ट हुआ, बाहुबली युद्धोन्मत्त की मृत्यु हो गई, विरूपाक्ष
का वध हुआ और श्रेष्ठ राक्षस-वीर युद्ध में काम आये । अब बल-समन्वित इन राज-
कुमारो को मैं स्वयं जीतूँगा और अपने वधुओ की मृत्यु की शोकाग्नि से जलनेवाली लंका
के रहनेवालो के दुख को दूर करूँगा । अविरल क्षात्र धर्म-रूपी जड़, नव-विजय से उन्नत
लक्ष्मण-रूपी प्रकाड (तना), सूर्यपुत्र तथा अन्य वानर-वीर-रूप शाखाएँ, राम की अखड
कीर्त्ति-रूपी मंजरी, सीता-रूपी फल से युक्त हो, देवताओ के लिए आश्रय-रूपी छाया प्रदान
करनेवाले राम-रूपी वृक्ष को मैं उखाड दूँगा और उसे अपने मन के दुःख को दूर करने-
वाली ओषधि बनाकर, इस संसार में जीवन-यापन करूँगा ।'
११९. रावण का राघवौं पर आक्रमण करना
इस प्रकार कहते हुए असुरेश्वर ने क्रोधोद्दीप्त मन से अपने सारथी से कहा—
'तुम अपनी चतुरता का प्रदर्शन करते हुए रथ को राघवो पर चलाओ, मै आज उनका
सहार करूँगा । यदि वे युद्ध में मरेंगे, तो सभी वानर तितर-बितर होकर भाग जायेंगे ।'
रावण के आदेशानुसार सारथी ने रथ की नेमियो का भयावह रव करते हुए उसे राघवो
के निकट चलाया । बंदी, मागध तथा सूत रावण की विपुल कीर्ति का गान करने लगे,
राक्षस-सेना भीषण गर्जन करने लगी और निसान घोर रव करते हुए बजने लगे । तब
दशकंठ धनुष का भयकर टकार करते हुए वानर-सेना पर दारुण अस्त्र चलाने लगा । ब्रह्मा से
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