सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 447, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 447

युद्धकांड (पृष्ठ ४१७)

इसके बाद वह मनोवेग से द्रोण गिरि के निकट पहुँच गया और वहाँ अपनी माया से एक आश्रम का
निर्माण किया । 'उस आश्रम में आम, पुन्नाग, चंपक, पूगीफल, कटहल, चंदन, जामुन,
पाटली, बकुल, कदली, खर्जूर, कर्पूर आदि के सुंदर वृक्ष थे । जहाँ-तहाँ ब्रह्मचारियों
का वेद-पाठ हो रहा था और महनीय मणिदीप-मालिकाएँ जल रही थी । फल-फूल तथा
लताएँ, होम-धूम से धूमिल हो रही थी । कलकंठ शुक, नीलकंठ शारिका तथा कलहंसों
के' मधुर कूजन सर्वत्र सुनाई पड रहे थे । स्थान-स्थान पर हवन तथा स्वरयुक्त मंत्रों का
पठन हो रहा था । ऐसे माया-आश्रम में कालनेमि एक मुनि के समान कपट वेश धारण
किये मन्द प्रकाश में आँखें बन्द करके जप-माला फिराते हुए बैठा था । आकाश-मार्ग से
जाते हुए हनुमान् ने इस आश्रम को देखा और सोचने लगा कि मुनि का यह आश्रम कितना
भव्य दीख रहा है । उस दिन (जब मैं यहाँ आया था) यह यहाँ नहीं था, आज यह
कहाँ से आया ? कहाँ वह क्षीर-सागर, कहाँ वह मेरु पर्वत और कहाँ मुनियों का यह
आश्रम ? कदाचित् मैं मार्ग खो गया हूँ । मैं इस मुनि से मार्ग जान लूँगा । यों सोचकर
वह आकाश से पृथ्वी पर उतर आया । वन के पके हुए फल देखकर उसके मुँह में पानी
भर आया, किन्तु मुनि-शाप के भय से बिना उनको छुए ही मुनि के समक्ष पहुँच गया
और हाथ जोडकर बोला--'हे मुनिनाथ, महाराज राम के आदेश से मैं क्षीर-सागर के
पास जा रहा हूँ । मेरा नाम हनुमान् है । मुझे अत्यधिक प्यास लग रही है, क्या यहाँ
कहीं जल मिल सकता है ?' तब उस कपटमुनि ने मदहास करते हुए कहा--'हमारे
कमंडलु का जल पीकर तुम अपनी प्यास बुझा लो । ये फल लो, इन्हें खाकर इस रात को
यही आराम करो । हे वानरोत्तम, मैं अपने मन में भूत तथा भविष्य की सभी बातें जानता हूँ ।
राम को धोखा देकर रावण उनकी पत्नी सीता को ले गया है । राम ने सहज ही
वालि का वध करके लवण-समुद्र में सेतु को बाँधा और वानर-सेना के साथ लंका को
घेरे हुए है । उन्होंने कुंभकर्ण आदि राक्षसों तथा इन्द्रजीत का संहार किया है । पुत्र-
शोक से क्रुद्ध रावण ने भय से प्राप्त शक्ति-बाण सुमित्रा के पुत्र पर चलाया, तो लक्ष्मण
मूर्च्छित हो गिर पड़े । उस लक्ष्मण को जीवित करने के निमित्त ओषधियाँ ले जाने को तुम
आये हो । अबतक तुम वायु-वेग से एक सहस्र योजन का मार्ग तय करके आये हो ।
कोई अधर्मी मुझे देख नहीं सकता । तुम मुझे देख पाये, इससे मुझे निश्चय हो गया है
कि तुम उत्तम व्यक्ति हो । जगत् के कल्याण के लिए राम ने जन्म लिया है, इसलिए
हमें भी राम का कार्य संपन्न करना चाहिए । मैं तुम्हें ऐसे दिव्य मंत्र दूँ गा, जिनमें तुम्हें
दिव्य ओषधि दिखाई पड़े । प्रात काल के सूर्य का दर्शन करते ही शक्ति से संपन्न होनेवाली
संजीवनी आदि कितनी ही ओषधियाँ हमारे इस वन में हैं । उनमें से जो ओषधि चाहिए,
उसे तुम लंका ले जाओ । 'मेरे मंत्रों की शक्ति से तुम पलक मारने की देर में (लंका)
पहुँच जाओगे ।'
तब उस कपटमुनि को देखकर हनुमान् ने कहा--'हे तपस्वी । जब लक्ष्मण बुरी
दशा में वहाँ पड़े हुए हैं, तब क्या मुझे उचित है कि मैं यहाँ सुख से सो जाऊँ ? हे
स्वामिन्, अपने प्रभु की कार्य-सिद्धि के रूप में लक्ष्मण को प्राप्त करने के पहले मैं इन फलों
५३