रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 455, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंऔर युद्ध में तुमको खो दिया । हे सौमित्र, अब मुझे संप्राप्त अपयश-रूपी पंक को कौन
धो सकेगा ? यदि माता सुमित्रा मुझे देखकर कहें कि हे तात, बडी तपस्या के उपरान्त
प्राप्त, उन्नत, पुण्यशील, महनीय चरित्रवान्, मानधन अपने पुत्र को मैंने तुम्हारा विश्वास
करके तुम्हें सौंपा था । ऐसे पुत्र को वन में ले जाकर तुमने उसका अन्त कर दिया, अब
मैं क्या करूँ ? तब मैं उनसे क्या कहूँगा ? मुझसे मिलने के लिए जब भरत तथा शत्रुघ्न
आयेंगे और पूछेंगे कि लक्ष्मण कहाँ है, तो मैं क्या उत्तर दूँगा ? दीन होकर मैं वहाँ
जाऊँगा भी कैसे ? मैं इसके कारण चिन्तित तथा दुखी नहीं हूँ । मेरी चिन्ता का कारण
दूसरा है । पापी रावण के दुष्कर्मों को देखकर मन-ही-मन दुखी हो, अपने भाई का
त्याग कर मेरा मित्र तथा सेवक बनकर विभीषण ने मेरी शरण ली । ऐसे शरणार्थी
विभीषण को आश्वासन देते हुए मैंने कहा था---'मैं तुम्हें राक्षसों का राज्य देता हूँ ।'
मैंने उसका राज्यतिलक भी कर दिया । किन्तु, उस प्रण को पूरा करने की क्षमता मुझमें
नही रही । लो, सूर्योदय भी होने लगा है, अब लक्ष्मण के बचने की आशा नही है ।
मुझे भी अब जीवित नही रहना चाहिए। पापरहित लक्ष्मण के जीवन के साथ ही मेरा जीवन है।
अब यह शोक मेरे लिए असह्य हो गया है । किन्तु, शरणार्थी को त्यागना नही चाहिए,
इस पृथ्वी पर यह क्षत्रियों का धर्म नहीं है । राजाओं को चाहिए कि स्वयं दुख भोगते
हुए भी, अपने आश्रितों की रक्षा करे । इसलिए हे सुग्रीव, तुम इस विभीषण को साथ
लेकर अयोध्या जाओ और पुण्यात्मा भरत को यहाँ का सारा समाचार समझाकर कहो
और उन्हें मेरा यह आदेश सुनाओ कि वह इस विभीषण को लंका के बदले अयोध्या का
राज्य देकर पुण्य-लग्न में इसका राजतिलक कर दे । उसके पश्चात् तुम तथा वालिपुत्र
दोनों अपनी सेनाओं को लेकर किष्किन्धा को लौट जाना ।"
राम को ऐसे दीन वचन कहते सुनकर सुग्रीव अत्यन्त सभ्रमित हुआ । वह सान्त्वना
देते हुए कहने लगा--'हे देव ! ध्यानपूर्वक देखने से पता चलता है कि अभी प्रभात नही
होगा । अभी तो रात का चौथा पहर प्रारंभ हुआ है । वायुपुत्र शीघ्र आ जायगा ।
आप संताप त्यागिए ।' फिर भी, राम अत्यधिक शोकाग्नि में जलते हुए पृथ्वी पर लोट-
लोटकर कहने लगे--'हे तात, मैं जब पिता की आज्ञा से अकेले वन के लिए चला, तो
तुम विना पिता के आदेश लिये ही अपने-आप मेरे साथ चले आये और असंख्य दुःख
भोगते रहे । इसे देखकर मैं बहुत दुखी होता था । आज तुम शत्रु के हाथों में अपनी
शक्ति खोकर इस प्रकार पृथ्वी पर पड़े हुए हो । अब मैं कैसे जीवित रह सकूँगा ?
कैसे यह दुख सह सकूँगा ? कौन-सा मुंह लेकर अयोध्या को लौटूंगा ? अब मुझे सीता
किसलिए चाहिए ? अब मेरा जीवन ही किस काम का है ? मुझे अब राज्य किसलिए
चाहिए ? जिस दिन पिता ने मुझे यहाँ भेजा, उसी दिन से तुम मुझे पितृवत् मानते आ
रहे हो । मेरे भाग्य ने आज रुष्ट होकर रावण के द्वारा तुम्हारी ऐसी गति करा दी ।
भिन्न-भिन्न देशों में खोजने के पश्चात् योग्य पत्नियों को प्राप्त किया जा सकता है, देश-
देशान्तरों में भ्रमण करके वधु-जनों को भी प्राप्त कर सकते हैं, किन्तु अनुज को प्राप्त
करना असम्भव है ।' इस प्रकार, विलाप करते हुए राम अनुज के चेतना-हीन शरीर पर