रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 454, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंवीरो को बाँधकर समुद्र में फेंक दिया, उसने कुछ राक्षसो को पद-प्रहार से मार डाला,
कुछ वीरो को अपने भयंकर गर्जन से मार डाला, कुछ राक्षसो का अपनी पूँछ से संहार
किया और अपनी दृष्टि-मात्र से कुछ राक्षसो का वध कर दिया । कुछ राक्षसो को उसने
नीचे गिरा दिया, कुछ राक्षसो को दबा दिया और कुछ को चीर डाला ।
तब माल्यवान् क्रोधोन्मत्त होकर यम के समान भयंकर रूप धारण किये हुए हनुमान्
पर शर-वृष्टि करने लगा । किन्तु, हनुमान् ने उन वाणो को अपनी पूँछ से ही तोड़ डाला
और क्रोध से उसके धनुष को खंड-खंड कर दिया । फिर, उसने अपनी पूँछ से माल्यवान् के
पैरो को बाँधकर ऊपर उठाया और पृथ्वी पर पटक दिया । तब माल्यवान् ने हनुमान् पर
अपना शूल चलाया । उसकी भी उपेक्षा करके खड़े हुए हनुमान् को देखकर उस राक्षस ने
अपनी शक्ति से उसके वक्ष पर भयंकर प्रहार किया । इस आघात से हनुमान् के वक्ष से
रक्त की धारा बहने लगी । हनुमान् थोड़ी देर तक मौन खडा रहा, और फिर अत्यधिक
रोष से उस राक्षस के सिर पर भयंकर पद-प्रहार करके आकाश में जाकर उड़ गया ।
इससे राक्षस का सिर फूट गया और उससे रक्त की धारा बहने लगी । माल्यवान् इस
भयंकर प्रहार से थोड़ी देर तक मूच्छित पडा रहा, किन्तु शीघ्र ही सचेत होकर उसने हनुमान्
पर अपनी गदा फेंकते हुए कहा-'युद्ध में यही गदा तुम्हारा अन्त कर देगी ।' उस गदा
के लगने से भयंकर ज्वालाएँ निकल पडी । यह देखकर माल्यवान् ने कहा-'हे वानर,
इस पर्वत को समुद्र में फेंककर जाओ, तो मैं तुम्हारा वध नहीं करूँगा । पूर्वकाल में समुद्र
के मध्य में गरुड पर आरूढ हो विष्णु स्वयं मुझसे युद्ध करने आया था और मुझे अजेय
जानकर लौट गया था । मेरा प्रताप सारा संसार जानता है, तुम मुझसे युद्ध नही कर सकते ।'
तब हनुमान् ने माल्यवान् को देखकर क्रोध से कहा-'हे वृद्ध राक्षस, मेरे प्रताप से
भीत हुए बिना तुम मुझसे युद्ध करने चले हो ? तुम्हारी शक्ति ही कितनी है ?'
हनुमान् के इन दर्प-पूर्ण वचनो को सुनकर माल्यवान् का क्रोध और भी बढ़ गया । उसने
अपने भयंकर खड्ग चन्द्रहास को निकालकर उद्धत शक्ति से उसे हनुमान् पर चलाया ।
हनुमान् के वज्रसम शरीर पर लगते ही वह चन्द्रहास चूर-चूर हो गया । उस खड्ग के
प्रहार से हनुमान् ने थोडी देर तक पीड़ा का अनुभव किया, किन्तु शीघ्र ही संभलकर
अपनी भयंकर पूँछ को उस राक्षस के कण्ठ में लपेटकर आकाश में बडे वेग से घुमाकर
फिर समुद्र में फेंक दिया । माल्यवान् समुद्र में गिरकर उसी मार्ग से पाताल में पहुँच गया।
हतशेष राक्षस धैर्य खोकर भाग गये । पर्वत जैसी विशाल विजय को तथा पर्वत को लिये हुए
हनुमान् आगे बढा, तो सभी देवता उसकी प्रशंसा करने लगे ।
१३०. लक्ष्मण के लिए राघव का शोक
द्रोण पर्वत की दीप्ति को दूर से देखकर सूर्यवशज राम को भ्रम हुआ कि प्रभात
होनेवाला है । तब अत्यन्त भय-विह्वल हो, समरलक्ष्मी-रतिश्रांत लक्ष्मण को रण-शय्या
पर सोते देखकर राम कहने लगे-'हे लक्ष्मण, तुम्हारे जैसे अनुज के रहने से ही में वन-
गमन की तपस्या का भार वहन कर सका । वह देखो, संसार के समस्त जीवो के लिए
दिन निकल रहा है, किन्तु मेरे लिए दिन डूब रहा है । मैं वन में पत्नी को खो बैठा