रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 436, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंतव विरूपाक्ष आदि राक्षसो ने सेनां को एकत्र होने की घोषणा की । तुरत सभी
राक्षस अपने गर्जनो से आकाश को कँपाते हुए, करवाल, चक्र, खड्ग, परशु, शूल, गदा,
मूसल, मुद्गर, शक्ति आदि विविध एव विचित्र आयुधो से युक्त हो अत्यधिक उत्साह से
आ गये । राक्षस रावण के लिए विविध अस्त्रो से सज्जित, सूर्य-प्रभा से विलसित रथ ले
आये । तव रमणीय रत्नो की कांति से प्रकाशमान कर्ण-भूषण धारण किये हुए; दसो कठो
में रत्न-पदक पहने हुए, दसो मुखो से नाना प्रण करते हुए, केयूर, मणिकंकण आदि भूषणो
से वाहुओ को अलकृत किये हुए; धनुप, शर, खड्ग, चक्र, करवाल, परशु आदि विविध
आयुधो को धारण किये हुए दशकठ रथ पर आरूढ हुआ । उसके दसो मुकुट ऐसे प्रतीत
होते थे, मानो बारह आदित्यो में एक को तो रावण ने बंदी बनाया, दूसरा आकाश में
दीख रहा है, अत बचे हुए दसो आदित्य यहाँ विराज रहे हैं । रावण के रथ के पीछे
रथ, गज, तुरग, पदाति चतुरगिणी सेना भी चलने लगी । उस समय सेना के निसान,
तुरही आदि की ध्वनि तथा सैनिको के सिंहनाद आदि से गूँजनेवाली लका प्रलय के
समय भयकर गर्जन करनेवाले समुद्र के समान दीख रही थी । वदीजनो की स्तुतियो के
साथ रावण उत्तर द्वार से लका से वाहर निकला और युद्धोन्मत्त विरूपाक्ष को देखकर ऐसा
सिंहनाद किया कि पृथ्वी विदीर्ण-सी हो गई । उस समय सूर्य-विव की दीप्ति भी क्षीण
हो गई, दिशाएँ अधकार से व्याप्त हो गईं, पृथ्वी डोल गई, रथ चूर-चूर हो गये,
अश्व गिर पडे और रक्त की वर्षा होने लगी । ऐसे दु शकुनो को देखकर भी दशकठ
किंचित्-मात्र विचलित नही हुआ ।
लंकेश की विशाल सेना को देखकर ब्रह्माण्ड को विदीर्ण करते हुए वानरो ने सिंहनाद
किया और उद्धत गति से भयकर राक्षसो पर टूट पडे । इससे क्रुद्ध होकर राक्षस-वीरो ने
अपने पराक्रम को प्रकट करते हुए, वानरो के हृदयो को छेदकर पार निकल जानेवाले
पैने बाण चलाये, मूसल, तोमर, शक्ति, मुद्गर, चक्र आदि फेंके, अकुश, कुत तथा
शूल चुभोये, भयकर गदाओ से प्रहार किया और तलवारो को चमकाकर उनसे वानरो के
अगो को खडित किया । तब कपि-वीरो ने भी क्रोधोन्मत्त हो, विशाल पर्वतो तथा वृक्षो
को उन राक्षसो पर फेंका, अपने चरण, हाथ, दाँत, नख तथा पूँछो की सहायता से उनके
सिरो तथा शिराओ को, हाथो तथा मुखो को, वक्षो तथा वाहुओ को, ओठो तथा कठो को
काटते, चीरते तथा कुचलते हुए, उन्हें कई प्रकार से पीडित किया । यह देखकर दनुजेश्वर ने
वत्स्रदत, अश्वकर्ण, नाराच, भल्ल आदि नाना अस्त्रो को वानरो पर चलाकर रक्त की
धाराएँ बहा दीं । वह एक-एक बाण से पाँच-पाँच, सात-सात, नौ-नौ कपियो को एक साथ
जहाँ-के-तहाँ गिरा देता था । इसके पश्चात् उसने पाँच बाणों से गधमादन को, अठारह
बाणो से पनस को, दस बाणो से नील को, पचास बाणो से नल को, छह बाणो से द्विविद को,
सात बाणो से विनत को, सत्तर बाणो से पवनपुत्र को, पच्चीस बाणो से कुमुद को,
पाँच बाणो से गोमुख को, सात बाणो से ऋषभ को, सत्रह बाणो से गज को, सात बाणो
से शरभ को, सात बाणो से गवय को, तीन-तीन बाणो से तार तथा ऋयन को,
अस्सी बाणो से अंगद को तथा कई बाणो से अन्य वानरो को पृथ्वी पर शीघ्र