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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 446, कुल 508 में से

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पृष्ठ 446

४१६ रंगनाथ रामायण
पुत्र, इन्द्र तुम्हारे सिर की, सूर्य तुम्हारे मुख की, चन्द्र तुम्हारे मन की, आदिशक्ति तुम्हारे
नितंब की, पवन तुम्हारी पीठ की, शिव तुम्हारी पूँछ की, अग्नि तुम्हारे चरणो की, ब्रह्मा
तुम्हारी बुद्धि की, वरुण तुम्हारी शक्ति की, सरस्वती तुम्हारी वाणी की, विष्णु तुम्हारे
बाहुद्वय की तथा गणेश तुम्हारे उदर की रक्षा करते रहेंगे । तुम शीघ्र जाकर आओ ।'
उसके पश्चात् क्रमशः सुग्रीव, विभीषण, जाम्बवान् तथा अंगद आदि वानर-वीरो ने उसे
विदा दी । तब हनुमान् आकाश की ओर ऐसे उछला कि जिस पर्वत पर चढकर वह उछला था,
वह धँस गया और पृथ्वी विदीर्ण हो गई, पवन, समुद्र तथा आकाश-गंगा व्याकुल-सी
हो गई और लंका नगर की ऊँची अट्टालिकाएँ गिर गईं । उसके पश्चात् वह विद्युत्-प्रकाश के
समान उज्ज्वल कांति से युक्त अपनी पूँछ को तथा अपने दोनो विशाल हाथो को ऊपर
उठाये, सूर्य-मंडल की भाँति प्रकाशमान होनेवाले अपने मुख से प्रचड दीप्ति
विकीर्ण करते हुए, चरणो तथा कर्णो को कुचित करके उड़ने लगा । देखते-देखते वह अनेक
पर्वतो, कई देशो, कई नद-नदियो, कई वनो, नगरो तथा समुद्रो को देखते हुए हिमाचल के
पार निकल गया । दिशाओ तथा आकाश को कँपाते हुए वह एकाकी शूर आगे बढने लगा।
१२४. कालनेमि का वृत्तांत
गुप्तचरो के द्वारा रावण ने यह समाचार सुना, तो वह हनुमान् के मार्ग में विघ्न
डालने का सकल्प करके स्वयं अर्द्धरात्रि के समय कालनेमि के घर पहुँचा । कालनेमि ने
अत्यंत श्रद्धा से रावण को अर्घ्य, पाद्य आदि देकर उसका सत्कार किया और पूछा-'हे
राजन्, अर्द्धरात्रि के समय आपके यहाँ पधारने का क्या कारण है, कृपया बताइए ।'
तब रावण ने कहा-'आज मेरे शक्ति-बाण से आहत लक्ष्मण को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य
से राम की आज्ञा से हनुमान् संजीवकरणी लाने के लिए जा रहा है । तुम शीघ्र जाकर
उस हनुमान् का वध कर डालो, या उसके मार्ग में कोई ऐसा विघ्न उपस्थित करो कि
वह सूर्योदय के पूर्व यहाँ पहुँच नही सके । द्रोण पर्वत के पास ही देवासुरो से निर्मित एक
सरोवर है । उसमें एक महान् मकरी बडे आनंद से रहती है। वह देवताओ को भी निगल
जाने की क्षमता रखती है, तब इस वानर की गिनती ही क्या है ? तुम कोई ऐसी माया
रचो कि हनुमान् उस सरोवर में पहुँच जाय । तुम शीघ्र जाओ ।'
रावण की बातें सुनकर, मन-ही-मन नीति-मार्ग का विचार करके, उसने कहा-
'हे दनुजेंद्र, माया-मृग का रूप लेकर मारीच गया था और उसकी मृत्यु हुई । आप इस
अनुचित मार्ग को त्याग दीजिए । घोर युद्ध में कुभकर्ण आदि दानव-वीर नष्ट हो चुके है ।
अब तो आप बात मानिए । राम के पास सीता को पहुँचा दीजिए और अपनी लंका
विभीषण को देकर आप शिवजी के निवास कैलास पर्वत पर तपस्वी बनकर जीवन व्यतीत
कीजिए या योद्धा के समान, युद्ध-भूमि में राम से युद्ध कीजिए और उनके हाथो से
प्राण त्यागकर विष्णु-सायुज्य प्राप्त कीजिए ।"
कालनेमि के इस प्रकार कहते ही रावण की आँखें क्रोध से लाल हो गई और वह
अपने चंद्रहास को निकालकर उसका वध कर डालने के लिए उद्यत हुआ । यह देखकर,
कालनेमि ने कहा-'हे देव, आपकी आज्ञा का पालन करने में अभी जाता हूँ ।'