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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 441, कुल 508 में से

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पृष्ठ 441

युद्धकांड ४११
रावण इससे अत्यत व्याकुल हुआ और राम पर सर्प-त्राण चलाये, तो राम ने उन्हें बीच
में ही काट डाला । तब रावण ने शार्दूलमुख, उष्ट्रमुख, सूकरमुख, सर्पमुख, गजमुख,
गृध्रमुख तथा सिंहमुखवाले कितने ही भयकर वाण राम पर चलाये, पर राम ने उनके
टुकडे कर दिये । उसके पश्चात् राम ने आग्नेयास्त्र चलाया, तो उसमें से उल्कामुख, विद्युन्मु ख,
ग्रहमुख, सूर्यमुख तथा अग्निमुख से युक्त वाण निकलकर रावण पर आघात करने
के लिए पहुँचे । तब रावण ने आश्चर्य्य-चकित रीति से उन सबको काट डाला और मय
से प्राप्त माया-शर का सधान करके उसे राम पर चलाया । उससे असख्य भाले, तोमर,
गदा, परिघ आदि शस्त्र निकल पड़े । यह देखकर राघव ने अपने महान् धनुष पर गाधर्व
शर का सधान करके चलाया, तो उसमें से अनेक सूर्यविब-सदृश चक्र तथा दिव्य वाण
ससार को त्रस्त करते हुए निकले और उन्होने रावण के माया-शर से निकले हुए परिघ
आदि शस्त्रो को चूर-चूर कर दिया । तब दशकठ ने क्रोध करके राम पर अनेक प्रखर
वाण चलाये, तो राम ने भी शीघ्र गति से उस राक्षस पर असख्य प्रतिशर चलाये । राम-
रावण के शर-जाल से सारा आकाश ढक गया । तब लक्ष्मण ने सात वाणो से रावण की
पताका को काट डाला, एक वाण से धनुष को तोड दिया एक और वाण से सारथी का
वध किया और फिर रावण के वक्ष पर पाँच वाणो से प्रहार किया । इसी समय विभीषण ने
इन्द्रनील पर्वत की भाँति दीखनेवाले रावण के अश्वो को मार गिराया । रथ से वचित
होने से रावण पृथ्वी पर कूद पडा और अपने दसो मुखो की भौंहो को तानकर क्रुद्ध दृष्टि
से विभीषण पर भयकर शक्ति-वाण चलाया । किन्तु, रामानुज ने तीन वाणो से उसे बीच
में ही गिरा दिया । उससे स्फुलिंग तथा ज्वालाएँ निकलकर आकाश तक व्याप्त हो गईं ।
तब दशकंठ अत्यत क्रोध करके, मय से प्राप्त शक्ति-वाण को विभीषण पर चलाने का
यत्न कर ही रहा था कि लक्ष्मण ने कहा—'शरणागत की रक्षा करनेवाले धर्मात्मा क्या
कभी शरणागत की मृत्यु सह सकते हैं ? यो कहते हुए उन्होने रावण के अनुज को अपने
पीछे कर लिया और स्वय रावण पर क्रूर वाण चलाने लगे ।
१२०. रावण की शक्ति से लक्ष्मण का मूच्छित होना
तब रावण ने कहा—'हे लक्ष्मण, बडे शूर की भाँति तुमने विभीषण को अपने
पीछे छिपा लिया है । तब तुम स्वय ही इस शक्ति के प्रहार का सहन करो ।' इस प्रकार
कहते हुए उसने प्रलय-काल के आदित्य के परिवेश के सदृश, उस शक्ति को घोर वलय के
रूप में घुमाकर, उसे लक्ष्मण पर चलाया । तब वह शक्ति अपनी किंकिणी तथा घटिकाओ
का निनाद करते हुए, समुद्रो को आलोड़ित करते हुए, कुल-पर्वतो को हिलाते हुए,
दिशाओ को कँपाते हुए, सूर्यविंब को विचलित करते हुए, वज्रो को गिराते हुए, पृथ्वी को
कंपित करते हुए, आकाश को झकझोरते हुए, नक्षत्रो को तितर-बितर करते हुए, अग्नि-कणो
को विकीर्ण करते हुए, ज्वालाओ को व्याप्त करते हुए, आदिशेष की जिह्वा का आकार
धारण किये हुए, लक्ष्मण के द्वारा चलाये जानेवाले वाण-समूह को चूर-चूर करते हुए,
लक्ष्मण के वक्ष पर भयकर गति से गड गई । राम कहने लगे कि इस भयकर अस्त्र से
लक्ष्मण के प्राणो पर कोई विपत्ति नही आये । समस्त देवता यह देखकर आकाश में हाहाकार