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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 453, कुल 508 में से

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पृष्ठ 453

दुःस्वप्न के कारण व्याकुल होते हुए घर से वाहर निकल आये । वे वार-वार स्वप्न में
देखी हुई राम-लक्ष्मण की दशा की कल्पना करके व्याकुल होते रहे । साथ-ही-साथ, उसी
समय उन्होंने कई और दुःशकुन देखे, तो वे और भी भयभीत हो सोचने लगे, यह कैसा
पाप है ? कैसा अपशकुन है ? न जाने भविष्य में क्या होनेवाला है ? न जाने वन में
राम तथा लक्ष्मण को क्या हो गया है ? न जाने, जानकी की क्या दशा हुई ? चौदह
वर्ष पूरे होने को हैं, किन्तु उनका कोई समाचार नहीं मिल रहा है । सत्यनिष्ठ, उदार,
सदाचारी, कृतार्थ, उन लोगों के लिए मैं अपना सारा पुण्य अर्पण करता हूँ, जिससे
उनपर कोई विपत्ति न आये ।
इस प्रकार सोचकर भरत ने तुरन्त वेदनिष्ठ ब्राह्मणों को बुलाया और वेदविधि से
सब प्रकार के दान-धर्म आदि करके, हवन आदि के द्वारा शान्ति-कर्म कराया ।
उसी समय हनुमान् आकाश-मार्ग से चंचल वाल-सूर्य की भाँति, नदीग्राम के ऊपर
होकर जाते हुए, जटाभार एवं वल्कल धारण किये हुए, राम के समान दिखाई पडनेवाले,
घनश्याम वर्णवाले सूर्यवंशज भरत को देखकर अत्यन्त आश्चर्य-चकित हो सोचने लगे—
'क्या सौमित्र की मृत्यु हो जाने से सीता को भी तजकर रामचन्द्र अकेले यहाँ आ गये हैं?,
क्या मैं इनसे पूछकर जान लूँ ?' फिर, वह कपिकुलोत्तम हनुमान् (भरत से) न पूछने
का निश्चय करके मन-ही-मन सोचने लगा—'रघुराम शरणागतरक्षक, सद्धर्मनिरत तथा
श्रेष्ठ वलशाली हैं । क्या, वे अपने सत्य तथा यश की उपेक्षा करके अपनी धर्मपत्नी तथा
अनुज को त्याग कर सुग्रीव आदि वानर-वीरों को युद्ध-क्षेत्र में ही छोड़ रावण को सजीव
छोड़कर अकेले यहाँ आयेंगे ? ऐसा कभी नहीं हो सकता । एक साधारण मनुष्य की भाँति
सोचकर मैने राम के प्रति अपराध किया है । कदाचित् राम से मिलता-जुलता कोई और
तपस्वी यहाँ रहता होगा ।' इस प्रकार सोचते हुए हनुमान् शीघ्रगति से लका के मार्ग में
जाने लगे ।
उसी समय भरत आकाश-मार्ग से जानेवाले हनुमान् को देखकर सोचने लगे—
'न जाने क्यों यह दुष्ट-ग्रह यहाँ दिखाई पड़ रहा है । इसे अपने भयंकर वाणों से नीचा
गिराना चाहिए ।' ऐसा निश्चय करके शक्तिशाली धनुष-वाण हाथ में लेकर वे वाण चलाने
का उपक्रम करने लगे । उसी समय आकाशवाणी हुई—'हे अनघ, तुम इसके प्रति मित्र-
भाव रखो, यह तुम्हारा हित है, इस पर तुम क्रोध मत करो ।' इस आकाशवाणी को सुन-
कर भरत ने धनुष-वाण नीचे डाल दिया ।
१२९. हनुमान् का माल्यवान् से युद्ध करना
निदान हनुमान् समुद्र के निकट पहुँच गया । इतने में रावण की आज्ञा से माल्यवान् ने
अपने दस करोड़ महाबली तथा पराक्रमी राक्षम-सैनिकों के साथ आकर हनुमान् का
मार्ग रोका । हनुमान् ने द्रोण पर्वत को सावधानी से थामे हुए, उन राक्षसों का सामना
किया । राक्षस-वीर भी वडी भयंकर गति से हनुमान् से भिड गये और परशु, तोमर, चक्र,
शूल, करवाल एवं मुद्गर आदि अस्त्र चलाते हुए हनुमान् को मारने लगे । किन्तु, अनुपम
विक्रमी पवनकुमार ने उनके प्रहारों की परवाह किये बिना, अपनी भयंकर पूँछ में राक्षस-