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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 451, कुल 508 में से

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पृष्ठ 451

ज्ञान-दृष्टि से अनुमान करके, उस कृपानिधान ने कहा—'हे सुन्दरी कुछ समय के पश्चात्
हनुमान् राम के कार्यार्थ यहाँ आनेवाला है । उसके द्वारा तुम्हारे शाप की मुक्ति होगी ।'
इतना कहकर वह मुनि गंगा नदी के तट पर चले गये । आज मैं शाप-मुक्त हो गई हूँ ।
अतः मैं जा रही हूँ ।" यो कहती हुई वह कमलाक्षी हनुमान् को आशीर्वाद देकर वहाँ से
स्वर्ग चली गई ।
१२७. कालनेमि का वध
हनुमान् वहाँ से सीधे कालनेमि के सामने उपस्थित हुआ । उस समय वह पापी,
अचल समाधि में निमग्न रहनेवाले (मुनि) की भाँति कुम्भक-क्रिया के द्वारा अपने वक्ष स्थल
को फुलाकर मुख को किंचित् झुकाकर, ध्यान-मग्न रहनेवाले की भाँति आँखें बंद किये हुए
जप-माला को फेरते हुए जप करनेवाले की भाँति ओठ हिलाते हुए बैठा था । हनुमान्
के आते ही उसने आँखें खोलकर, हनुमान् से कहा—'सरोवर निकट ही तो है ? तुमने
इतना विलंब क्यो किया ? देखो कितनी रात बीत गई है । यदि तुम मंत्रोपदेश ग्रहण
करने की इच्छा रखते हो, तो क्या गुरु-पूजा की व्यवस्था कुछ करोगे ?'
तब पवनपुत्र ने कहा—'लो, अब तुम्हारे लिए यही गुरु-पूजा है ।' यो कहकर
उसने अपनी कठोर मुष्टि से उस राक्षस के बाहुमध्य में प्रहार किया । तुरन्त उस दैत्य ने
अपना वह रूप छोड़कर एक पक्षी का रूप ले लिया और हनुमान् पर आक्रमण किया । उसके
आक्रमण करते ही हनुमान् ने उसे कसकर पकड़ लिया और उसके दोनो पंखो को तोड़कर
फेंक दिया । तुरन्त उस राक्षस ने वह रूप भी त्याग दिया और अपनी माया से एक गंभीर
सिंह का रूप धारण किया और आकाश की ओर भयकर दृष्टि को दिखाते हुए गर्जन करके
हनुमान् को धमकाने लगा । किन्तु, हनुमान् निर्भीक हो अपनी मुष्टि से उस कालनेमि के
सिर पर ऐसा प्रहार किया कि उसका सिर फट गया । तुरन्त वह राक्षस सिंह का रूप
भी छोड़कर सुग्रीव के रूप में आया और कहने लगा—'हे पवनपुत्र, यहाँ क्या कर रहे हो ?
चलो, लक्ष्मण के प्राण लौट आये हैं । अब तुम्हें द्रोणाचल जाने की आवश्यकता
नहीं है । अब हमें ओषधि नही चाहिए ।' पहले हनुमान् को भ्रम हुआ कि वह सुग्रीव
ही है, किन्तु ध्यानपूर्वक देखने के पश्चात् निश्चय कर लिया कि वह सुग्रीव नहीं है ।
तब अत्यन्त क्रोध से उसके वक्ष पर ऐसा प्रहार किया कि वह राक्षस मूर्च्छित होकर गिर
पड़ा, किन्तु शीघ्र ही वह दानव सँभल गया और शतशृंगी होकर धनुष से पैने शर
चलाकर हनुमान् को कष्ट पहुँचाने लगा । तब हनुमान् ने भी अपनी मुष्टियो तथा चरणो
के आघात से उसकी सारी शक्ति शिथिल कर दी और उसे आकाश से पृथ्वी की ओर
खींच लिया । उसके पश्चात् उसने राक्षस का सिर ऐंठकर उसे धड से अलग करके पृथ्वी
पर ऐसा फेंक दिया, जैसे मत्त गज मृणाल को तोड़कर फेंक देता है । उसके बाद विजय-
गर्व से सिंहनाद करते हुए हनुमान् तुरन्त द्रोणाचल पर पहुँच गया ।
द्रोणाचल पर पहुँचकर हनुमान् अनेक दिव्य लताओं की आभा से तथा निर्मल
मणिसमूह की कांतिवाले दीप-वृक्षो की दीप्ति से भासमान उस पर्वत पर घूम-घूमकर दिव्य
ओषधियो का अन्वेषण करने लगा । वह किसी लता को देखकर 'यही वह सुगन्धि है, यही