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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 438, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 438

४०५ | रंगनाथ रामायण

उस पर अपनी मुष्टि से प्रहार किया, तो विरूपाक्ष ने अपने करवाल लेकर उससे सुग्रीव
पर प्रहार किया । मुष्टि के प्रहार से विरूपाक्ष तथा करवाल के प्रहार से सुग्रीव दोनों
मूर्च्छित हो गये । किन्तु, शीघ्र ही वे दोनों सँभलकर एक दूसरे से भिड़ गये । सुग्रीव ने
अपनी हथेली से विरूपाक्ष पर प्रहार किया, तो उसने उसे बचाकर अपने करवाल से सुग्रीव
पर वार किया । करवाल का वार बचाने के लिए सुग्रीव दौड़ा और तुरंत उस राक्षस पर
ऐसा आघात किया कि विरूपाक्ष के हाथ का आयुध गिर पड़ा । फिर, दोनों वीर, दो सूर्यों
की भाँति प्रकागमान होते हुए, प्रलय-काल की अग्नियों के समान प्रज्वलित होते हुए, इन्द्रो
की भाँति अपने भुजवल के गर्व से फूलते हुए, विजय की आकांक्षा से मल्ल-युद्ध करने लगे ।
तब विरूपाक्ष ने आश्चर्यजनक शक्ति से सुग्रीव पर अपनी हथेली से ऐसा क्रूर प्रहार किया
कि सुग्रीव मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। तुरन्त वह तलवार हाथ में लिये हुए वानरों पर टूट
पड़ा । इतने में सुग्रीव की चेतना लौट आई और उसने कुलिश के समान कठोर अपनी
हथेली से विरूपाक्ष के वक्ष पर ऐसा प्रहार किया कि वह भयंकर राक्षस रक्त उगलते
हुए पृथ्वी पर लोट गया। यह देखकर वानर हर्ष से फूल गये और दानव अत्यंत दीन हो
भागने लगे ।

तब रावण ने विरूपाक्ष की मृत्यु से किंचित् भी विचलित हुए बिना उसके अनुज युद्धोन्मत्त ,
को देखकर कहा--'देखा तुमने सुग्रीव का पराक्रम ? युद्ध-क्षेत्र में अपने भाई विरूपाक्ष की
दशा देखी ? इस युद्ध में अनेक राक्षस-सैनिक मारे गये, कितने ही हाथी नष्ट हुए, अश्व
दब गये, रथ टूट गये और सेना छिन्न-भिन्न हो गई । वह देखो, वानर हर्षोन्मत्त होकर
आगे बढ़ रहे हैं । तुम्हारे लिए युद्ध करने का यही उचित अवसर है । अब तुम युद्ध-
भूमि में शत्रुओं का संहार करो ।' तब विरूपाक्ष का अनुज श्रीराम को व्याकुल करने का
संकल्प करके वानर-सेना के निकट पहुँचा और बाण, गदा, खड्ग आदि सभी आयुधों से
कपियों पर प्रहार करते हुए उन्हें दुःख देने लगा । यह देखकर सुग्रीव ने एक विशाल
पर्वत को उठाकर उस पर फेंका, किंतु उस राक्षस ने उसे बीच में ही काट डाला ।
तब सूर्यपुत्र ने और एक पहाड़ उठाकर फेंका, तो उस राक्षस ने तीन बाण चलाकर उसके
तीन खंड कर दिये । उसके पश्चात् भी उस राक्षस को शर-वृष्टि करते हुए देखकर सुग्रीव
उसके रथ पर कूद पड़ा और उसके परिघ से ही उसके धनुष तथा केतु को तोड़ डाला,
सारथी को मार गिराया और रथ के अश्वों को पृथ्वी पर गिरा दिया । तब वह राक्षस
बड़े वेग से पृथ्वी पर कूदकर एक विशाल गदा लिये हुए सुग्रीव पर टूट पड़ा । तब दोनों
परिघ एवं गदा से युक्त अपनी बाहुओं को चमकाते हुए सिंहों के समान गरजते हुए एक
दूसरे के कंठ, मुख, हाथ, स्कंध, चरण, नख, जानु, जंघा, छाती, पीठ, उँगलियाँ, नितंब, कमर,
शिर, कान, नाक तथा ओठों पर क्रमशः प्रहार करते हुए आश्चर्यजनक रीति से अत्यंत
साहस के साथ युद्ध करने लगे । कभी वे दोनों परिघ एवं गदाओं से आहत होकर गिर
पड़ते, फिर इतने में एक दूसरे से पहले सचेत होकर पृथ्वी को कँपाते हुए गर्जन करते ।
इस प्रकार, युद्ध करते समय उस राक्षस ने अपनी गदा को दोनों पक्षों की सेनाओं को
आश्चर्यचकित करते हुए घुमाकर सूर्यपुत्र पर ऐसा फेंका कि सुग्रीव पृथ्वी पर गिर पड़ा,