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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 450, कुल 508 में से

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पृष्ठ 450

४२० रंगनाथ-रामायण

नामक मुनि यहाँ आये और बड़ी आसक्ति से मुझे देखते हुए मन-ही-मन महान्-आनन्द-
का अनुभव करने लगे । फिर भोग की लालसा से प्रेरित तथा काम-पीडा से अभिभूत हो,
इसका भी विचार किये बिना कि कहाँ मेरे जैसा तपोधन तथा पुण्यात्मा मुनि और कहाँ
यह सुन्दरी, मुझ पर अनुरक्त हो गये और निर्लज्ज हो, लोलुप-दृष्टि से मुझे देखने-लगे ।
यह देखकर मैंने उनसे कहा—'हे मुनीन्द्र, कहाँ आप, कहाँ मैं और कहाँ आपकी यह लोलुप
दृष्टि ? आप तपस्वी तथा पुण्यात्मा हैं, आपका यह कार्य आपके तप में विघ्न-डालनेवाला है।'
तब मुनि कामातुर हो, तपस्या का पवित्र संकल्प त्याग कर कहने लगे—'हे सुन्दरी,
यही मेरी तपस्या और पुण्य का फल है, यही मेरे लिए स्वर्ग का सोपान-है,
यही मेरे लिए मोक्ष का साधन है !' तब मैंने उनसे कहा—'हे मुनि, मैं अभी रजस्वला हूँ,
अतः आपको मेरा स्पर्श नहीं करना चाहिए । इन दिनों मैं आपके ही घर में रहूँगी ।
स्नान तथा शुद्धि के पश्चात् आप मुझे प्राप्त कर सकते हैं।' इस प्रकार, मुनि को समझा-
कर मैं उस मुनि के साथ गंधमादन को गई और मुनि के घर में ही निष्ठा से रहने-
लगी । उस दिन रात को रावण सभी दिशाओं पर विजय प्राप्त करके अपनी सेना के
साथ उस पर्वत पर ठहरा । जब मैं पर्वत-शिखर पर गाने लगी, तब मेरा गाना सुनकर
रावण मेरे पास आया और अपना प्रताप, अपना सौन्दर्य, अपनी महत्ता तथा अपना नाम
बताकर मुझे प्रलोभन देने लगा कि 'हे सुन्दरी, तुम अपने रूप-यौवन तथा विलास के साथ
मेरा आलिंगन करो।' मैंने कहा—'मैं विवश हूँ, अतः तुमको मेरा स्पर्श नहीं करना चाहिए।'
तब उस राक्षस ने कहा—'हे सुन्दरी, मेरे लिए रजस्वला स्त्रियाँ तथा परस्त्रियाँ अधिक-
प्रिय हैं, अतः तुम मुझे मत ठुकराओ ।' इस प्रकार मुझे अपने प्रिय वचनों से प्रसन्न करके
उसने मेरे साथ रति-क्रीड़ा की । इससे अतिकाय का जन्म हुआ । मैंने उस पुत्र को दानवेन्द्र-
को सौंप दिया । तीन दिन के पश्चात् शुद्धि-स्नान आदि से निवृत्त होकर मैं मुनीश्वर-
के समक्ष जाकर खडी हो गई । तब उस मुनि ने मुझे देखकर कहा—'मेरे घर में रहती हुई,
तुम मुझे धोखा देकर किसके साथ प्रीति से रति क्रीडा में प्रवृत्त हुई थी ? हे तन्वी,
तुम्हारे यौवन का उपभोग किसने किया ? तुमने-बिना सोचे-समझे ऐसा क्यों किया ?
यदि विवेक के साथ विचार किया जाय, तो तुम्हारी यह करतूत स्त्री-सुलभ ही प्रतीत
होती है । परहित कहाँ और युवतियाँ कहाँ ? शीलाचरण कहाँ और सुंदरियाँ कहाँ ?
कमललोचनियां कहाँ और सत्य कहाँ ? कामिनियाँ कहाँ और करुणा कहाँ ? (काश,—
दोनों बातें एक साथ ही देखी जाती ?) इस प्रकार कहते हुए उस मुनि ने अत्यधिक क्रोध
से निर्दय हो मुझे घोर शाप दिया—'तुम अपने विलास को खोकर इस सरोवर में मकरी
बनकर रहो । जिसने तुम्हारे साथ रति-क्रीड़ा की, वह तुम्हारे इस पाप से अपने पुत्र,
मित्र तथा सेना के साथ भस्म हो जायगा ।'
"मुनि का यह घोर शाप सुनकर मैं विचलित हो उठी और उस पुण्यात्मा के समक्ष
हाथ जोड़कर कहने लगी—'हे मुनिश्रेष्ठ, मैं इस शाप-रूपी समुद्र को किस नौका की सहायता
से पार कर सकूँगी ? इस शाप-रूपी दावानल को मैं किस जल से बुझा सकूँगी ?
हे दयालु, मुझ पर दया दिखाइए।' भयाक्रान्त-हो, इस प्रकार आर्तनाद करनेवाली मुझे देखकर