रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
की आवश्यकता ही क्या थी ?' अंगद, सुग्रीव, हनुमान् तथा युद्ध-भूमि में रहनेवाले सभी
वानर-नेता राम-लक्ष्मण के निकट पहुँचकर आश्चर्य प्रकट करने लगे । उस समय परम
पावन, पवन-पुत्र ने आकाश-मार्ग से आनेवाली उस रमणी को देखकर रामचन्द्र से कहा--
'हे देव, यह मानिनी, देवकांता नहीं है और राम की पत्नी भी नहीं है । यह कोई पति-
हीना स्त्री है, उसका प्रत्यक्ष प्रमाण भी है । वहाँ उस रमणी के रथ पर देखिए, भस्म से
आवृत अग्नि दिखाई दे रही है ।'
११२. सुलोचना का राम की स्तुति करना
इतने में वह रमणी शीघ्रगति से उस स्थान पर पहुँचकर रथ से उतर आई ।
क्षीण कटि से विलसित वह रमणी ऐसी दीखती थी, मानो स्वर्ण-प्रतिमा हो या नवजात
मोती हो, अथवा नव-यौवना राजहंसिनी हो । वह अपनी आँखो से अश्रु बहाती हुई,
चकराती हुई, चीत्कार करती हुई, मद-गति से राघव के सम्मुख पहुँच गई और उन्हें साष्टांग
दण्ड-प्रणाम करके, हाथ जोड़कर कहने लगी--'हे रवि-कुलावुधि सोम, हे रामाभिराम, हे
विमल गुणधाम, हे शत्रुविनाशी, हे मेघश्याम, हे कमलनेत्र, हे विमल चरित्रवान्, हे हिमगिरि-
सम धीर, हे ललित-मधुर-वचन-कुशल, हे लावण्य-निधि, हे जन-नायक, आपके चरणो की सेवा
से मेरे सभी पाप दूर हो गये ।'
इस प्रकार, राम के समक्ष स्तुति करती हुई, विनय के साथ वह खड़ी हुई । तब
राम की आज्ञा से सूर्यपुत्र ने कहा--'हे सुंदरी, तुम कौन हो ? तुम्हारे यहाँ आने का क्या
कारण है ? तुम्हारा नाम क्या है ? तुम्हारे पति कौन हैं ? तुम किसकी पुत्री हो ? तुम
अपना वृत्तांत सुनाओ ।' तब वह आँसू बहाती हुई कहने लगी--'हे भानु-पुत्र, मेरे पिता
आदिशेष हैं, मेरा नाम सुलोचना है, मेरे पति वह पुण्यवान्, बहुभोग-भाग्य-सपन्न, बाहुबली,
महा तेजस्वी, युद्ध में भयंकर, इन्द्र-विजयी, महान् शूर, दशकंठ तथा मदोदरी के पुत्र
मेघनाद हैं ।'
इतना कहने के पश्चात् उस रमणी ने राम को देखकर शोकाभिभूत होकर कहा--
'हे राघवेन्द्र, आपने युद्ध-भूमि में ऐसे महान् शूर का वध किया है । कृपालु होते हुए भी
आपने कैसे उनका संहार किया ? हे सूर्यकुलतिलक, ऐसा महान् विक्रमी अब आगे कहीं
जन्म लेगा ? आप जानते ही हैं कि पति की वियोगाग्नि से सती स्त्री अत्यधिक परितप्त
होती है । मैं अपने पति को खोकर वैधव्य-दुख का कैसे सहन कर सकूँगी ? हे शरणार्थी-
त्राण, हे दयामय, हे परिपूर्णहृदय, हे शुभ-गुण-संपन्न, मैं आपकी शरण में आई हूँ ।
शरणागत की रक्षा करने की आपकी टेक है । मेरे पति को प्राण-दान देकर आप अपने
प्रण की रक्षा कीजिए । पति-भिक्षा देकर मुझे जीवन प्रदान कीजिए ।'
सुलोचना की कातर प्रार्थना सुनकर, दया-मूर्ति राम का हृदय पिघल गया और
वे उस रमणी के पति को पुनर्जीवित करने की वात सोचने लगे । यह समझकर हनुमान् ने
राम से निवेदन किया-'हे राघव, आप तो सर्वज्ञ हैं । उस ब्रह्मा का वचन टाल देना
आपको उचित नहीं है । हे राजन्, आपको ब्रह्मा की मर्यादा रखनी चाहिए।' तब राघव ने
पवन-पुत्र की बातो पर विचार करके कहा--'हे कमलाक्षी, तुम अगले जन्म में अपने
३९८ रंगनाथ रामायण
पति के साथ इस पृथ्वी पर जन्म लेकर अगणित संपत्ति के साथ चिर काल तक
सुख-भोग करोगी और उसके पश्चात् तुम दोनो वैकुण्ठ में अपना इच्छित सुख
प्राप्त करोगे ।'
राम के वचन सुनकर वह स्त्री हर्षित हुई और विनयपूर्वक उस दयामय राम की
स्तुति यो करने लगी—'हे दया-समुद्र, हे अमल-गुण-वीर, हे साधुजन-आश्रित, हे सेतु-बन्धक,
आप कृपा करके मेरे पति का शव मँगा दीजिए । मुझे अब शीघ्र नगर को लौट
जाना चाहिए ।' तब सुग्रीव ने उस स्त्री से कहा—'हे कमलनयनी, यदि तुम पतिव्रता हो,
तो बिना विलंब जाकर अपने प्रिय पति से अपना सारा वृत्तान्त कहो ।' यह सुनकर वह
साध्वी शीघ्र युद्ध-क्षेत्र में पहुँच गई । वहाँ उस चंचलाक्षी ने अपने पति के कटे हुए
सिर को देखकर कई प्रकार से रुदन करने लगी । फिर, अपने पति के शरीर के पास
पहुँचते ही उमड़ते हुए दुःख से वह मूच्छित होकर गिर पड़ी । कुछ समय के उपरान्त वह
सचेत हुई और अपने प्राणेश्वर के शरीर पर गिरकर ऊँचे स्वर में हाहाकार करती हुई
विलाप करने लगी । फिर वह धैर्य धारण किये हुए स्थिर हो खड़ी हुई और सत्य की
प्रभा से दीप्त होती हुई यो बोली—'यदि मैंने मन-वचन-कर्म से पति की भक्ति की हो,
यदि मैंने धर्माचरण में पति को ही दैव मानकर पातिव्रत्य धर्म का पालन किया हो, तो
मेरे पति पुनर्जीवित होकर मुझसे संभाषण करें ।'
सुलोचना ने आत्मविश्वास के साथ जब ऐसे वचन कहे, तो दशकंठ के पुत्र ने
आँखें खोलकर कहा—'हे रमणी, मेरा वध करानेवाले तुम्हारे पिता ही तो हैं ? मुझे
जीतने की शक्ति दूसरो में कहाँ है ? तुम को दुखी होने की कोई आवश्यकता नहीं है ।
अपने ऋणानुबंध के अनुसार ही पति अपने पत्नी के साथ रहता है । संयोग तथा वियोग,
दोनों, जीवों के लिए ब्रह्मा के द्वारा विधान किये जाते हैं । समय की गति प्रबल है,
इसलिए मेरी मृत्यु हुई है । अब तुम जाओ ।' इतना कहकर उसने अपनी आँखें बंद कर लीं ।
सुलोचना मन-ही-मन अत्यंत दुखी हो, वहाँ से चलकर राम के पास आई और
उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया और बड़ी प्रसन्नता से उनकी प्रशंसा करने लगी ।
तब रघुराम ने अंगद को बुलाकर कहा—'इस रमणी को उसके पति का शरीर
दिला दो ।'
अंगद ने राम की आज्ञा मानकर सुलोचना को उसके पति का शरीर दिला दिया ।
सुलोचना उस शव को लिये हुए बड़ी भक्ति से राम की आज्ञा प्राप्त कर वहाँ से शीघ्र लंका-
नगर को रवाना हुई । वह सीधे अपने अंतःपुर में नहीं गई, किन्तु अपने पति के शरीर
को एक योग्य स्थान में रखकर, उसकी रक्षा के लिए सैनिकों को नियुक्त करके, उसके पश्चात्
अंतःपुर में गई । वह बहुत समय तक अत्यधिक चिंता में निमग्न रही और उसके पश्चात्
अपने प्रिय पुत्रों को पास बुलाकर आँखों से अश्रुधारा बहाती हुई, उनके सिरों को सूंघा,
गालों का बड़े स्नेह से स्पर्श किया और फिर उन्हें हृदय से लगाकर कहा—'हे पुत्रो,
तुम्हारे मुँह देखते रहने का सौभाग्य मुझे भगवान् ने नहीं दिया है। अब इस पृथ्वी पर
जीना मेरा धर्म नहीं है, इसलिए अवश्य मैं सहगमन करूँगी । अब तुम्हारा यहाँ रहना भी
", "शख", "सुदर", "अलकरण", "स्वय", "प्रशसा", "देव-मडली"?
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दशकंठ -> दशकठ
कंठ -> कठ
वृत्तांत -> वृत्तात
अंत -> अत
कांतिहीन -> कातिहीन
संबंध -> सबंध
असंभव -> असभव
चंचलाक्षी -> चचलाक्षी
अंतःपुर -> अत पुर
पीतांबर -> पीताबर
चंदन -> चदन
सुंदरी -> सुदरी
मृदंग -> मृदग
शंख -> शख
सुंदर -> सुदर
अलंकरण -> अलकरण
स्वयं -> स्वय
प्रशंसा -> प्रशसा
देव-मंडली -> देव-मडली
संग -> सग
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४०० रंगनाथ रामायण
११४. रावण का अपनी प्रधान सेना को युद्ध के लिए भेजनी
रावण अत्यधिक क्रोध तथा शोक से जलते हुए, बार-बार उमडनेवाले पुत्र-शोक
में घुलते हुए अपने सभा-मडप में पहुँचा। क्रोधोद्दीप्त सिंह की भाँति उष्ण नि श्वासो को
छोडते हुए, बल, साहस तथा युद्ध-कुशलता से सपन्न अपने सैनिको को देखकर उसने आदेश
दिया कि तुम शीघ्र जाकर वानरो तथा राम-लक्ष्मण को जीतकर आओ ।
रावण का आदेश शिरोधार्य करके राक्षस-सैनिको ने बडे उत्साह के साथ, रथ, गज,
तुरग, पदाति आदि चतुरगिणी सेना के साथ युद्ध के लिए आवश्यक शस्त्रास्त्रो का सगठन
किया । फिर, वे वज्र-कवच तथा वज्र-सम आयुधो से सज्जित हो भीषण गति से चल पडे ।
उस समय उनके गज-समूह के चिघाडो तथा घटिकाओ एव अश्वो की हिनहिनाहटो का भीषण
रव, दुदुभि, शख, पटह, डमरू, पणव आदि वाद्यो का तुमुल नाद, सेना का कलकल,
ध्वजाओ की फडफडाहट, रथ के पहियो की गडगडाहट तथा धनुष का टकार आदि विविध
ध्वनियो से मथित समुद्र की भाँति दिशाएँ गूँजने लगी । सेना के चलने से अत्यधिक धूलि
ऐसे उडने लगी, मानो वह समुद्र से युद्ध करने जा रही हो। सभी राक्षस ऐसे गर्जन करने
लगे कि उनके गर्जनो की ध्वनि आकाश का स्पर्श करने लगी और सारी पृथ्वी काँपने लगी । वे अपनी
गर्वोक्तियो, धमकियो, हुकारो तथा चिल्लाहटो की ध्वनियो के साथ, अपने मणिमय कुडलो,
हारो, ककणो तथा किरीटो की दीप्ति को विकीर्ण करते हुए लका से बाहर निकले, मानो
महान् शक्ति-सपन्न कपि-समुद्र को देखकर, बडे उत्साह से लका-समुद्र से निकलनेवाला
वडवाग्नि का समूह हो ।
तब कपि-वीरो ने बडे उत्साह से गर्जन करते हुए, अपने पदाघातो से दिग्गजो को
बैठ जाने के लिए विवश करते हुए, आकाश की ओर उछलते हुए तथा ताल ठोककर
ब्रह्माण्ड को भी विदीर्ण करते हुए, काजल के पर्वतो के समान दीखनेवाले राक्षसो को
देखकर करोडो वृक्षो, पर्वतो तथा वडी-बडी शिलाओ को लिये हुए, उन पर आक्रमण
किया । इतने में उदयाद्रि पर सूर्य भगवान् चढ आये, मानो वे रघुराम की धनुर्विद्या की
निपुणता देखने की उत्कट अभिलाषा लिये हुए आये हो । राक्षस तथा वानर-सेनाएँ ऐसी
भयकर रीति से परस्पर भिड गई, मानो एक समुद्र दूसरे समुद्र से भिड गया हो । कपियो
की विशाल सेना को देखकर राक्षस अपने रथ, गज तथा अश्वो को उनकी ओर बढाते
हुए वानरो पर टूट पडे और उन्हें अनेक रीतियो से दुख पहुँचाने लगे । किन्तु, वानरो ने
अत्यत साहस के साथ पर्वतो को उठाकर उन पर फेंका । उनके प्रहार से कई राक्षस-
सैनिक गिर पडे । राक्षस, करवालो से वानरो की पूँछो को काट डालते थे, तो वानर
अपने बाहु-दण्डो से राक्षसो के गदा-दण्डो को तोड देते थे । राक्षस, वानरो पर परशुओ,
परिघो तथा खड्गो को फेंकते थे, तो वानर पर्वतो, वृक्षो तथा पर्वत-शृगो को फेंककर उन्हें
नष्ट कर देते थे । युद्ध-भूमि में रक्त की धाराएँ बहने लगी । वानर अपनी पूँछो से
पर्वतो को उठाकर फेंकते थे, तो राक्षस उनके नीचे चूर-चूर हो जाते थे और फिर चक्रो
तथा गदाओ से वानरो पर प्रहार करते थे । इस प्रकार, वे समान पराक्रम दिखाते हुए
परस्पर युद्ध करते थे । राक्षस जब गजो, अश्वो तथा रथो को कपियो पर चलाकर उन्हें
व्याकुल करने लगे, तब सुग्रीव, अंगद, पवनपुत्र तथा नील आदि वानर-वीर अत्यंत क्रोध
से उनपर पर्वतो तथा वृक्षो की वर्षा करने लगे । इससे असंख्य रथ खंड-खंड होकर गिर
गये; हाथी झुड-के-झुड गिरकर मर गये और अश्व तथा पदचर सेना पृथ्वी पर लोटने
लगी । जब रथारूढ कुछ राक्षस क्रुद्ध हो पृथ्वी को कँपाते हुए, अपने मनोरथो की भाँति,
अपने रथो को बडे वेग'से वानरो पर चलाया, तब वानरो ने उन रथो के जुए पकड़कर
सहज ही उन्हें पृथ्वी पर पटक दिया । जब अश्वारोही राक्षसो ने कपियो पर अपने अश्व
चलाये, तब कपि उनके सम्मुख धैर्य के साथ खडे होकर एक अश्व को उठाकर उससे दूसरे
अश्व पर प्रहार करने लगे । जब गजारोही सैनिक वानरो पर गजो को चलाते, तब वानर
गजो पर आक्रमण करके एक गज से दूसरे गज को टकरा देते । फिर, वे गज-सेना पर
टूट पडते और गजो पर आरूढ राक्षसो को नीचे खींच लेते या उन पर पदाघात करके
गिरा देते या उन्हें नीचे गिराकर अपने पैरो से कुचल देते या उन्हें ऊपर उठाकर पृथ्वी
पर पटक देते और विविध रीतियो से उन्हें छिन्न-भिन्न कर देते थे । इस समय अश्वो के
खुरो से उठी हुई धूलि के आकाश में व्याप्त होने से युद्ध-भूमि में अंधकार-सा छा गया ।
उस अंधकार में करवालो की दीप्ति उन्हें मार्ग दिखाने लगी, तो उस दीप्ति की सहायता
से वानर तथा राक्षस परस्पर घोर युद्ध करने लगे । इस युद्ध के कारण बहनेवाले रक्त
की धारा-रूपी किरणें, धूलि-रूपी अंधकार को दूर करने लगी । घोर युद्ध में हाथी तथा
रथ-रूपी तटो के बीच अश्व-रूपी मगर, ध्वजाओ, पेडो तथा सैनिको-रूपी तटवर्त्ती वृक्षो,
खड्ग-रूपी मछलियो, हाथी की सूँड-रूपी सर्पों, ढाल-रूपी कच्छपो, चूर-चूर वने हुए
असंख्य रत्नाभूषणो के कण-रूपी रेत, केशजाल-रूपी शैवाल तथा चामर-रूपी फेन से
युक्त रक्त की नदियाँ बहने लगी । उन नदियो को शीघ्र पार करते हुए वानर तथा राक्षस
परस्पर भिड जाते । इतने में वानर राक्षसो पर उद्धत गति से टूट पडते, उनकी रीढो
को तोड देते, अपनी मुष्टियो तथा कुहनियो से प्रहार करके, उन्हें नीचे गिरा देते, सिरो
को कुचल देते, उनके पेट चीर देते, और इनसे भी संतुष्ट न होकर उन्हें दाँतो से काटते,
अंगो को तोडते, एँडी पकडकर उन्हें घुमाकर पृथ्वी पर पटक देते, उनके केश पकडकर क्रूर
गति से खींचते, दोनो हाथो से दो राक्षसो को पकडकर उन्हें एक दूसरे से टकराकर चूर-
चूर कर देते, उन्हें गिराकर उनके वक्षो पर ऐसा प्रहार करते कि उनकी छातियाँ फट जाती
उनसे रक्त वह निकलता और अपने नाखूनो तथा दाँतो से उनकी नाक, कान, मुख,
ललाट आदि चीर डालते । कभी एक सौ वानर एक ही दानव पर टूट पडते और कभी
एक ही वानर एक सौ दानवो का नाश कर देता । इस प्रकार, वानरो ने वडी तत्परता से
लडते हुए दानवो को तितर-वितर कर दिया ।
तब राक्षस-सैनिक बड़े रोष के साथ, अपने दहाड, भेरी, मृदंग आदि युद्ध-वाद्यो के
निनाद से पृथ्वी को कँपाते तथा दिशाओ को विदीर्ण करते हुए, वानर-सेना पर टूट पड़े ।
यह देखकर इन्द्र आदि दिक्पाल भयभीत हो उठे । विक्रत सिर विक्रत प्रकोष्ठ, विक्रन ओष्ठ, विक्रत नख,
विक्रत मुख, विक्रत गात्र, विक्रत नेत्र, विक्रत हास, विक्रत नाक, विक्रत वक्ष, विक्रत वर्ण, विक्रत
कर, विक्रत पाद तथा विक्रत नादवाले राक्षस-वीर उमड-घुमडकर अलग-अलग आनेवाले
४०२ रंगनाथ रामायण
प्रलय-काल के वादलो की पंक्ति के समान परिघ, गदा, चक्र, परशु, तोमर, त्रिशूल, खड्ग,
मुद्गर, करवाल, ढाल, नागमुख, शिलीमुख, धनुष, मूसल आदि समस्त आयुधो से
सज्जित हो वानर-सेना पर भयकर गति से टूट पड़े और उन्हें काटते, पीटते, मारते,
उछालते तथा विविध रीतियो से उनपर प्रहार करते हुए उनका सहार - करने लगे ।
इन क्रूर प्रहारों से भीत होकर वानर अपने हाथ के पर्वतो तथा वृक्षो को नीचे गिराकर
विवश हो सोचने लगे, भला, हमें युद्ध करने की आवश्यकता ही क्या है ? हमें राक्षसों से
शत्रुता ही क्या है ? हमें न सूर्यवंश राम ही चाहिए, न सूर्यपुत्र सुग्रीव । जंगलो में कच्चे
फल और पीले पत्तों को खाते हुए सुख से जीवन-यापन करना छोड़कर, यहाँ इन राक्षसो
के हाथो में व्यर्थ ही हम क्यों मरें ? चलो, हम यहाँ से भाग चलें। यो सोचकर वानर-
वीर धैर्य खोकर सेतु की दिशा में भागने लगे । राक्षस-सेना उनका पीछा करके उन्हें
खदेड़ने लगी ।
११५. वानर-सेना को हनुमान् आदि का प्रोत्साहन देना
हनुमान्, नील तथा अंगद ने वानरो को इस प्रकार भागते हुए देखा, तो वे शीघ्र
सेतु के उस पार गये और वानरो को सेतु के पार जाने से रोककर उन्हें लौटाया । तब
सभी वानर भय से पीड़ित हो राम के पीछे जाकर शरण लेने लगे । राम ने वानरो की
यह दीनता देखी, तो क्रोध से धनुष हाथ में लेकर उसका टंकार करते हुए ऐसा सिंहनाद किया
कि राक्षसो के हृदय भय से काँप उठे । तदनंतर क्रोधोन्मत्त हो अपना हस्त-कौशल दिखाते
हुए, निशाचरों पर तीव्र बाणो की ऐसी वर्षा करने लगे कि उन बाणो की अधिकता के
कारण स्वयं राम भी युद्ध-भूमि में दीखते नही थे । राम के चलाये हुए असंख्य शरो के
प्रहार से राक्षसो की कमरें टूट गईं, जांघें कट गईं, शरीर के खंड-खंड हो गये, वक्ष-
स्थल विदीर्ण हो गये, मुख विकृत हो गये, पैर कट गये, हाथ टूट गये, कंठ कट गये
और सिर फट गये । कवचों को पार करके बाणो के शरीर में चुभ जाने से रक्त की
नदियाँ बहने लगीं । राम के बाणो के प्रहार से कुछ राक्षस मरते थे, कुछ भयभीत होते थे,
कुछ मूर्च्छित हो पृथ्वी पर गिर पड़ते थे, कुछ व्याकुल हो जाते थे तथा कुछ भय से
मुँह बाये खड़े रह जाते थे । गज, अश्व तथा रथ पर आरूढ़ राक्षस संभ्रमित रह जाते थे ।
त्रस्त राक्षस चिल्लाने लगे—'वह देखो, राघव बाण चला रहे है । लो, वे हमारे
निकट पहुँच ही गये ।' ऐसा आर्तनाद करते हुए वे बड़े वेग से युद्ध-क्षेत्र से भागने लगे ।
इतने में राघव ने अत्यधिक रोष से उन पर सम्मोहन-अस्त्र चलाया । उस अस्त्र के
लगने से राक्षस अपने-आपको भूल-से गये और यह न जानकर कि कौन राक्षस है, और
कौन वानर, एक राक्षस दूसरे राक्षस पर ही आक्रमण करने लगा । उस गांधर्व शर का
ऐसा प्रभाव था कि किसी-किसी राक्षस को एक ही राम दीखता था, किसी को एक राम
के स्थान में दस राम दीखते थे, किसी को सौ राम दीखते थे, किसी को सहस्र राम दीखते थे,
किसी को एक लाख राम दीखते थे, किसी को करोड़ राम दीखते थे, किसी को सौ
करोड़ राम दीखते थे; इस प्रकार उनको सारा युद्ध-क्षेत्र ही राममय दीखने लगा । अविराम
बाण चलाते रहने से राम का स्वर्ण-धनुष वृत्ताकार में दीखने लगा । उसे देखकर राक्षस
मन-ही-मन सोचने लगे कि यह कदाचित् वही चक्र है, जिसे विष्णु ने भयंकर युद्ध करते
हुए, 'नमुचि' पर चलाया था, अथवा किरण-समूह से घिरा हुआ सूर्यबिम्ब है । यों सोचते
हुए, राम के शर-समूह के प्रहार का सहन न कर सकने के कारण वे प्राण लेकर भागने
लगे । उस समय राक्षस-सेना में क्षण-भर की रक्त-वर्षा में भीगे हुए, चौदह सहस्र अश्व, अठारह
सहस्र हाथी, एक लाख रथ, दो लाख वीर राक्षस नष्ट हुए । शर-रूपी अर, धनुष-रूपी
नेमि (पहिये का घेरा), टकार-रूपी रव, किरण-रूपी स्फुलिंगो से युक्त राम का धनुष-
रूपी चक्र काल-चक्र की भाँति विलसित होते देखकर हतशेष दैत्य अत्यन्त त्रस्त हो उस घोर
युद्ध-भूमि को छोड़कर भागे और लका में जा पहुँचे । यह देखकर वानर उत्साह से सिंह-
नाद करने लगे । प्रलय-काल के यम की भयंकर नाश-लीला की भाँति उस समय का युद्ध-
क्षेत्र दीखने लगा । जब रघुवीर रावण की प्रधान सेना के दस सहस्र हाथी, बीस सहस्र
अश्व, एक सौ रथ तथा एक पद्म सेना का सहार कर देते थे, तब एक धड़ उठकर नाचने
लगता था, ऐसे करोड़ धड़ जब नाचते थे, तब एक कटा हुआ सिर आकाग की ओर
उछलकर एक भयंकर चीत्कार करता था, ऐसे एक करोड़ सिर जब उछलते थे, तब राम
के धनुष की एक घंटी बजती थी । इस भयंकर युद्ध में राम के धनुष में लगी हुई ऐसी
चौदह घंटियाँ अविराम बजती रही । रघुवीर की ऐसी धनुर्विद्या का कल्पनातीत कौशल
लगातार सत्रह घडियो तक चलते देखकर किन्नर, गंधर्व, खेचर, यक्ष, उरग तथा अमर
उनकी स्तुति करने लगे ।
उसके उपरान्त, रामचंद्र ने शूर-पुंगव सुग्रीव को देखकर कहा—'यह सम्मोहनास्त्र
जगद्भयंकर है । इसका प्रयोग करने तथा इसका उपसहार करने की शक्ति या तो मुझ में है,
या ईश्वर में, अन्यो में ऐसी क्षमता नहीं है । कौशिक ने जिस महान् शस्त्र को
मुझे प्रदान किया था, उसकी महिमा से स्वयं कौशिक भी अनभिज्ञ थे ।' तब विभीषण ने
राम को देखकर विनय तथा संभ्रम से कहा—'हे देव, रावण की यह सेना देवेन्द्र आदि
देवताओ के लिए भी अजेय थी । यही रावण की मूल-सेना थी, आज यह भी मिट्टी में
मिल गई । अब रावण का अंत निश्चित है । आप तो स्वयं अपने महत्त्व का ज्ञान नहीं
रखते । सच तो यह है कि कोई भी आपकी समानता नहीं कर सकता ।' विभीषण के
वचन सुनकर रामचंद्र प्रसन्न हुए ।
११६. राक्षस-स्त्रियों का रावण की निन्दा करना
लंका में दानव-स्त्रियो ने झुंडो में एकत्र होकर उमड़ते हुए शोक से पीड़ित
होती हुई कहने लगी—'हाय, कैसा दुर्भाग्य है कि निंदनीय चरित्र, भाग्यहीन मुखडा, पलित
केशो से युक्त सिर, विशाल उदर, विकृत वेश, विकृत यौवन, उग्र केश तथा उग्र दंष्ट्र-
वाली शूर्पणखा सकल गुणोज्ज्वल, सत्त्व-सपन्न, सुकुमार, तेजस्वी, सुमुख तथा कामदेव के समान
सुंदर रामचंद्र पर आसक्त हुई । कहाँ राजा भोज, और कहाँ गंगू तेली । इस लंका के
सभी राक्षसो पर मृत्यु की छाया पड़ी हुई थी, इसी कारण में उम राक्षसी ने दशकंठ तथा
उस सूर्यवशज में शत्रुता उत्पन्न कर दी । उस शूर्पणखा की वातें सुनकर उचित तथा
अनुचित का विचार किये बिना, शत्रुत्व ठानकर, दशकंठ अपना ही नाश कराने के लिए नहीं,
४०४ रंगनाथ रामायण
अपितु राक्षस-वंश का भी सर्वनाश करने के लिए उस राम की पत्नी को ले आया ।
इतना करने पर भी क्या, सीता उसे मिल गई ? ऐसा दुस्साहस उसने किया ही क्यो ?
राम ने तो एक ही बाण से मारीच का वध कर डाला तथा दण्डक-वन में विराध पर क्रुद्ध
होकर उसका संहार किया । इन बातो को जानकर भी मदान्ध हो रावण ने उनको नहीं
पहचाना । जनस्थान में राम ने अपने अनल के समान शरों से चौदह सहस्र राक्षसो का संहार
किया और अपने भयंकर बाणो से, त्रिशिर, दूषण तथा खर को सहज ही मार डाला ।
दशकंठ ने उसका भी विचार नही किया । क्रौंचवन में दाशरथियो ने अपने अनुपम शौर्य से
रुधिराशन को, क्रूर विक्रम को तथा योजनबाहु कबंध को मार डाला । ऐसे विक्रमी राक्षसो
के (वध का) वृत्तांत जानकर भी रावण ने राम पर विजय प्राप्त करने की ठानी । क्या,
यह उसके लिए संभव है ? क्या हमारे रावण में इतना साहस है, कि वह जगदीश्वर
राम से युद्ध कर सके ? राम ने तो एक ही बाण से सहज ही वालि का वध करके सूर्य-
पुत्र को किष्किन्धा का राजा बना दिया । सहस्रो हाथी, लाखो अश्व, करोडो रथ और
असंख्य पदचर सेना को राम ने एक क्षण-मात्र में ही युद्ध में मार डाला । उन्होंने अकेले
महान् पराक्रमी कुंभकर्ण का संहार किया । ऐसी वीरता देखकर भी रावण राम की शक्ति
पहचान नहीं सका । महाशूर अतिकाय तथा इन्द्रजीत को अकेले लक्ष्मण ने युद्ध में समाप्त
कर दिया । इतना सब होने के उपरान्त भी रावण राम की शरण में नही जाना चाहता ।
आज लंका के घर-घर में विलाप सुनाई पड़ रहा है । सभी लोग 'युद्ध में हमारे बंधु
मरे, हमारे पुत्र मरे, हमारे पति मरे, हमारे सहोदर मरे', इस प्रकार का आर्तनाद करते
हुए शोक-समुद्र में डूब रहे है । जिस दिन से दुर्मति तथा नीति-बाह्य हो रावण अपनी
माया से सीता को इस नगर में ले आया, उसी दिन से दुःशकुन दिखाई पड़ रहे हैं ।
अब शीघ्र ही दशरथ के पुत्र के हाथो में दशकंठ का अंत होना निश्चित ही है । हाय,
नीतिज्ञ विभीषण ने विविध रीतियो से इसको धर्म-मार्ग समझाया था । यदि यह उनके
हित वचनो का आदर करता, तो क्या लंका की ऐसी दुर्दशा होती ? या तो कुल-पर्वतो
के पंखो को अपने वज्राघात से काटनेवाले पुरंदर ने या मधु-कैटभ आदि राक्षसो का
संहार करनेवाले विष्णु ने या क्रूर यम ने या प्रलय-काल के रुद्र ने इस पृथ्वी पर राम के
रूप में जन्म लिया है और राक्षसो का वध करने लगा हैं । जिस समय दशरथ-पुत्र राम,
अपने शौर्य का प्रदर्शन करते हुए, युद्ध में दशकंठ का वध करने लगेंगे, उस समय, क्या,
महान् देवता या गंधर्व या मुनि या रावण को वर प्रदान करनेवाले ब्रह्मा या शिव
या राक्षस उन्हें राम के हाथों से बचा सकेंगे ? वर देते समय ब्रह्मा ने यह वर नहीं
दिया था कि यह नर के हाथो से नही मरेगा । इसलिए यह स्पष्ट हो रहा है कि दशकंधर
अपने बंधुओ के साथ राम के हाथो से मरेगा । यह सत्य है; क्योकि जब इस रावण ने
इन्द्र आदि देवताओ को बड़ी क्रूरता से दुःख पहुँचाया, तब समस्त देवताओ ने ब्रह्मा से
अभय-दान की प्रार्थना की । तब चतुर्मुख ने उन्हें देखकर कहा था—'भविष्य में तुम्हें किसी
प्रकार का दुःख नहीं होगा । अब तुम निश्चिंत रहो ।' इसके पश्चात् ब्रह्मा देवताओ को
साथ लेकर महादेव के पास गये और उनसे प्रार्थना की । तब प्रसन्न होकर शिव ने ब्रह्मा को
युद्धकांड ४०५
करुणापूर्ण दृष्टि से देखकर कहा---'देवो की रक्षा करने तथा समस्त राक्षसो का वध
करने के लिए पृथ्वी पर इदिरा का जन्म होगा । उस सती के पति बनकर विपत्तियो से
प्रजा की सतत रक्षा करने तथा दुर्जन राक्षसो का सहार करने के लिए विष्णु स्वय पृथ्वी
पर अवतार लेंगे । राम ही वह विष्णु हैं और भूमि-सुता ही वह इदिरा है ।' शिव का
वचन कभी नही टलेगा । अत, समझ लो कि हमें अब अघट दुख प्राप्त होनेवाला है ।
अब हमारा रक्षक कौन है ? हमारा रावण अब बचेगा नही। अब हमारे सतप्त होने से कोई
प्रयोजन नही है । हमारे एकमात्र त्राता विभीषण भी रामचन्द्र की शरण में गये
हुए है ।''
११७ रावण का द्वितीय युद्ध
इस प्रकार, विविध रीतियो से असुर-स्त्रियो के दीन विलाप सुनकर रावण थोडी
देर तक चिंता की अग्नि में परितप्त होते हुए मौन हो रहा । फिर, प्रचण्ड काल-नाग के
फुफकार की भाँति दीर्घ निःश्वास छोडकर ओठ चबाते तथा आँखो से अग्नि-कणो की वर्षा
करते हुए अत्यत क्रोध से युद्धोन्मत्त तथा विरूपाक्ष नामक राक्षसो को देखकर बोला--
'तुम शीघ्र तुरहियो की भयंकर ध्वनि करते हुए सिंह-गर्जनो के साथ युद्ध के लिए निकल
पडो ।' उसकी बातें सुनकर भी भयाक्रान्त निशाचरो को मौन देखकर, उसने
फिर कहा—'शीघ्र ही युद्ध की तैयारी करो । इस प्रकार हतोत्साह हो क्यो बैठे हो ?'
तब उन्होने जाकर पुण्याह कर्म आदि करने के पश्चात् युद्ध की तैयारी की और राक्षसेन्द्र
के समक्ष आकर उस बात की सूचना दी । तब रावण ने उनको देखकर कहा—'दिन-दिन
मेरी सेना घटती जा रही है।' मेरे सभी अनुचर मारे जा चुके । अमरेन्द्र के समान
पराक्रमी खर, अमित बलशाली इन्द्रजीत, कुभकर्ण, प्रहस्त, कुभ-निकुंभ, भयंकर पराक्रमी अति-
काय, महाकाय, महोदर, असुरांतक, नरातक, यशस्वी अकपन, कपन आदि महान् योद्धा,
जो युद्ध में इंद्र का भी सामना कर सकते थे, मेरे निमित्त प्राण खो बैठे । मेरा दर्प चूर-
चूर हो गया । इसलिए, मे अपने सभी शत्रुओ का नाश करूँगा और अपने पराक्रम का
प्रदर्शन करके उनसे प्रतिशोध लूँगा । मेरे शर समस्त आकाश तथा समुद्र को ढक लेंगे ।
में आज सभी वानरो का सहार करूँगा । मेरे चलाये बाण मृणालयुक्त कमलो की भाँति
वानरो के कठ-नाल-युक्त मुख-कमलो को काटेंगे और मैं उनसे युद्ध-भूमि का अलकार करूँगा ।
आज लका नगर की स्त्रियाँ यह सोचकर कि हमारे पति, पुत्र और सहोदर युद्ध में कटकर
मरे पडे हैं, अब हमारी रक्षा कौन करेगा । वे शोक-सागर में डूबी हुई है । मै शत्रुओ का वध
करके उनका शोक दूर करूँगा । मै शत्रु-पक्ष की सेनाओ को अपने पैने बाणो से काटकर
उनके रक्त-मास से, सियारो, गीधो उकाबों, पिशाचो, प्रेतो एव भूतो को तृप्त करूँगा ।'
इसके पश्चात् उसने युद्धोन्मत्त, मदमत्त एव अक्षीण बलवान् विरूपाक्ष को देखकर
कहा—'तुरत तुम सभी राक्षसो को युद्ध-भूमि में ले आओ । मेरे लिए रथ सजाकर भेजो।
आज मेरे तीक्ष्ण बाण, प्रतापी राम-लक्ष्मण के प्राण लेकर उनके रक्त का पान करना चाहते है।
में वानर-सेना पर बाण ऐसे चलाऊँगा कि एक-एक बाण मे सैकड़ो वानर मारे
जायेंगे । तुम बलवान् राक्षसो को चुन-चुनकर सेना का सगठन करके शीघ्र लाओ ।'
तव विरूपाक्ष आदि राक्षसो ने सेनां को एकत्र होने की घोषणा की । तुरत सभी
राक्षस अपने गर्जनो से आकाश को कँपाते हुए, करवाल, चक्र, खड्ग, परशु, शूल, गदा,
मूसल, मुद्गर, शक्ति आदि विविध एव विचित्र आयुधो से युक्त हो अत्यधिक उत्साह से
आ गये । राक्षस रावण के लिए विविध अस्त्रो से सज्जित, सूर्य-प्रभा से विलसित रथ ले
आये । तव रमणीय रत्नो की कांति से प्रकाशमान कर्ण-भूषण धारण किये हुए; दसो कठो
में रत्न-पदक पहने हुए, दसो मुखो से नाना प्रण करते हुए, केयूर, मणिकंकण आदि भूषणो
से वाहुओ को अलकृत किये हुए; धनुप, शर, खड्ग, चक्र, करवाल, परशु आदि विविध
आयुधो को धारण किये हुए दशकठ रथ पर आरूढ हुआ । उसके दसो मुकुट ऐसे प्रतीत
होते थे, मानो बारह आदित्यो में एक को तो रावण ने बंदी बनाया, दूसरा आकाश में
दीख रहा है, अत बचे हुए दसो आदित्य यहाँ विराज रहे हैं । रावण के रथ के पीछे
रथ, गज, तुरग, पदाति चतुरगिणी सेना भी चलने लगी । उस समय सेना के निसान,
तुरही आदि की ध्वनि तथा सैनिको के सिंहनाद आदि से गूँजनेवाली लका प्रलय के
समय भयकर गर्जन करनेवाले समुद्र के समान दीख रही थी । वदीजनो की स्तुतियो के
साथ रावण उत्तर द्वार से लका से वाहर निकला और युद्धोन्मत्त विरूपाक्ष को देखकर ऐसा
सिंहनाद किया कि पृथ्वी विदीर्ण-सी हो गई । उस समय सूर्य-विव की दीप्ति भी क्षीण
हो गई, दिशाएँ अधकार से व्याप्त हो गईं, पृथ्वी डोल गई, रथ चूर-चूर हो गये,
अश्व गिर पडे और रक्त की वर्षा होने लगी । ऐसे दु शकुनो को देखकर भी दशकठ
किंचित्-मात्र विचलित नही हुआ ।
लंकेश की विशाल सेना को देखकर ब्रह्माण्ड को विदीर्ण करते हुए वानरो ने सिंहनाद
किया और उद्धत गति से भयकर राक्षसो पर टूट पडे । इससे क्रुद्ध होकर राक्षस-वीरो ने
अपने पराक्रम को प्रकट करते हुए, वानरो के हृदयो को छेदकर पार निकल जानेवाले
पैने बाण चलाये, मूसल, तोमर, शक्ति, मुद्गर, चक्र आदि फेंके, अकुश, कुत तथा
शूल चुभोये, भयकर गदाओ से प्रहार किया और तलवारो को चमकाकर उनसे वानरो के
अगो को खडित किया । तब कपि-वीरो ने भी क्रोधोन्मत्त हो, विशाल पर्वतो तथा वृक्षो
को उन राक्षसो पर फेंका, अपने चरण, हाथ, दाँत, नख तथा पूँछो की सहायता से उनके
सिरो तथा शिराओ को, हाथो तथा मुखो को, वक्षो तथा वाहुओ को, ओठो तथा कठो को
काटते, चीरते तथा कुचलते हुए, उन्हें कई प्रकार से पीडित किया । यह देखकर दनुजेश्वर ने
वत्स्रदत, अश्वकर्ण, नाराच, भल्ल आदि नाना अस्त्रो को वानरो पर चलाकर रक्त की
धाराएँ बहा दीं । वह एक-एक बाण से पाँच-पाँच, सात-सात, नौ-नौ कपियो को एक साथ
जहाँ-के-तहाँ गिरा देता था । इसके पश्चात् उसने पाँच बाणों से गधमादन को, अठारह
बाणो से पनस को, दस बाणो से नील को, पचास बाणो से नल को, छह बाणो से द्विविद को,
सात बाणो से विनत को, सत्तर बाणो से पवनपुत्र को, पच्चीस बाणो से कुमुद को,
पाँच बाणो से गोमुख को, सात बाणो से ऋषभ को, सत्रह बाणो से गज को, सात बाणो
से शरभ को, सात बाणो से गवय को, तीन-तीन बाणो से तार तथा ऋयन को,
अस्सी बाणो से अंगद को तथा कई बाणो से अन्य वानरो को पृथ्वी पर शीघ्र
गिराकर गर्व से इतराने लगा । असुरेश्वर के बाणो से आहत कुछ कपि कमर के
टूटने से गिर पडते थे, कुछ चकराकर लुढक जाते थे, कुछ लोगो के वक्ष स्थलो के विदीर्ण
होने से गिर पड़ते थे, चरणो के कट जाने के कुछ वानर गिर जाते थे, कुछ लोगो के
हाथ कट जाते थे, कुछ वानरो के सिर फट जाने से वे भूमि पर लोट जाते थे, कुछ
कपियो के कठ कट गये और कुछ की जाँघें कट गईं, इसलिए वे कराहते हुए पृथ्वी पर
लोट गये । युद्ध-भूमि में कई ऐसे भी कपि थे, जिनके अग ऐसे कुचल गये थे कि उनके
अगो को पहचानना कठिन हो गया था । बाणो के लगते ही कुछ वानर भागने लगते,
किन्तु बीच में ही प्राणो के निकल जाने से वही पृथ्वी पर गिर जाते थे । इस प्रकार,
दनुजेन्द्र के बाणों के आघात को सह नही सकने के कारण वे सभी वानर प्राण लेकर
भागने लगे । रावण ने उनका पीछा किया । तब सुग्रीव वानर-सेना को देखकर कहने
लगा—'भागते क्यो हो, रुक जाओ, ठहर जाओ ।' फिर भी, वानर-सेना भागती ही रही।
तब उनको रोकने के लिए सुषेण को भेजकर, सुग्रीव ने स्वय एक वृक्ष को लिये हुए राक्षस-
सेना का सामना किया । उसके पीछे-पीछे पर्वतो को लिये हुए वानर-वीर भी चलने लगे ।
तब सिंहनाद करके वह प्रलय-काल के रुद्र की भाँति वृक्ष से प्रहार करते हुए शीघ्र गति से
राक्षसो का सहार करने लगा । अन्य वानर-वीर भी उसीके साथ राक्षस-सेना पर वृक्षो
तथा पर्वतो की घोर वृष्टि करने लगे । इससे राक्षसो के सिर फूट गये और कई राक्षस
कुलिश से आहत भग्न-शिखर कुल-पर्वतो की भाँति गिर पडे ।
११९. सुग्रीव के द्वारा विरूपाक्ष आदि राक्षसों का वध
तब रविपुत्र क्रोध से अपने नेत्र लाल किये हुए एक पर्वत को हाथ में लिये हुए
आगे वढा । तब विरूपाक्ष ने अत्यधिक रोष से रथ को आगे बढाते हुए धनुप का टकार
करके सुग्रीव पर वज्र-सम पैने बाण चलाये । किन्तु, रविपुत्र उनकी उपेक्षा करके उसके
रथ पर कूद पडा और रथ, सारथी तथा घोडो को एक पर्वत के प्रबल प्रहार से पृथ्वी
पर गिरा दिया । रथ से वचित किये जाने पर भी वह राक्षस-वीर पृथ्वी पर उतरकर
सुग्रीव पर विविध शरों को चलाने लगा । इतने में राक्षसेन्द्र की आज्ञा से, सभी आयुधो
से सज्जित करके, महावत एक मत्त गज को ले आया, तो विरूपाक्ष तुरत उस पर चढ
गया और कपियो पर भयकर प्रहार करके उनका सहार करने लगा और साथ-ही-साथ
सूर्य-पुत्र पर भी भयकर बाण चलाये । इससे सतुष्ट न होकर विरूपाक्ष कई शस्त्र और
[
४०५ | रंगनाथ रामायण
उस पर अपनी मुष्टि से प्रहार किया, तो विरूपाक्ष ने अपने करवाल लेकर उससे सुग्रीव
पर प्रहार किया । मुष्टि के प्रहार से विरूपाक्ष तथा करवाल के प्रहार से सुग्रीव दोनों
मूर्च्छित हो गये । किन्तु, शीघ्र ही वे दोनों सँभलकर एक दूसरे से भिड़ गये । सुग्रीव ने
अपनी हथेली से विरूपाक्ष पर प्रहार किया, तो उसने उसे बचाकर अपने करवाल से सुग्रीव
पर वार किया । करवाल का वार बचाने के लिए सुग्रीव दौड़ा और तुरंत उस राक्षस पर
ऐसा आघात किया कि विरूपाक्ष के हाथ का आयुध गिर पड़ा । फिर, दोनों वीर, दो सूर्यों
की भाँति प्रकागमान होते हुए, प्रलय-काल की अग्नियों के समान प्रज्वलित होते हुए, इन्द्रो
की भाँति अपने भुजवल के गर्व से फूलते हुए, विजय की आकांक्षा से मल्ल-युद्ध करने लगे ।
तब विरूपाक्ष ने आश्चर्यजनक शक्ति से सुग्रीव पर अपनी हथेली से ऐसा क्रूर प्रहार किया
कि सुग्रीव मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। तुरन्त वह तलवार हाथ में लिये हुए वानरों पर टूट
पड़ा । इतने में सुग्रीव की चेतना लौट आई और उसने कुलिश के समान कठोर अपनी
हथेली से विरूपाक्ष के वक्ष पर ऐसा प्रहार किया कि वह भयंकर राक्षस रक्त उगलते
हुए पृथ्वी पर लोट गया। यह देखकर वानर हर्ष से फूल गये और दानव अत्यंत दीन हो
भागने लगे ।
तब रावण ने विरूपाक्ष की मृत्यु से किंचित् भी विचलित हुए बिना उसके अनुज युद्धोन्मत्त ,
को देखकर कहा--'देखा तुमने सुग्रीव का पराक्रम ? युद्ध-क्षेत्र में अपने भाई विरूपाक्ष की
दशा देखी ? इस युद्ध में अनेक राक्षस-सैनिक मारे गये, कितने ही हाथी नष्ट हुए, अश्व
दब गये, रथ टूट गये और सेना छिन्न-भिन्न हो गई । वह देखो, वानर हर्षोन्मत्त होकर
आगे बढ़ रहे हैं । तुम्हारे लिए युद्ध करने का यही उचित अवसर है । अब तुम युद्ध-
भूमि में शत्रुओं का संहार करो ।' तब विरूपाक्ष का अनुज श्रीराम को व्याकुल करने का
संकल्प करके वानर-सेना के निकट पहुँचा और बाण, गदा, खड्ग आदि सभी आयुधों से
कपियों पर प्रहार करते हुए उन्हें दुःख देने लगा । यह देखकर सुग्रीव ने एक विशाल
पर्वत को उठाकर उस पर फेंका, किंतु उस राक्षस ने उसे बीच में ही काट डाला ।
तब सूर्यपुत्र ने और एक पहाड़ उठाकर फेंका, तो उस राक्षस ने तीन बाण चलाकर उसके
तीन खंड कर दिये । उसके पश्चात् भी उस राक्षस को शर-वृष्टि करते हुए देखकर सुग्रीव
उसके रथ पर कूद पड़ा और उसके परिघ से ही उसके धनुष तथा केतु को तोड़ डाला,
सारथी को मार गिराया और रथ के अश्वों को पृथ्वी पर गिरा दिया । तब वह राक्षस
बड़े वेग से पृथ्वी पर कूदकर एक विशाल गदा लिये हुए सुग्रीव पर टूट पड़ा । तब दोनों
परिघ एवं गदा से युक्त अपनी बाहुओं को चमकाते हुए सिंहों के समान गरजते हुए एक
दूसरे के कंठ, मुख, हाथ, स्कंध, चरण, नख, जानु, जंघा, छाती, पीठ, उँगलियाँ, नितंब, कमर,
शिर, कान, नाक तथा ओठों पर क्रमशः प्रहार करते हुए आश्चर्यजनक रीति से अत्यंत
साहस के साथ युद्ध करने लगे । कभी वे दोनों परिघ एवं गदाओं से आहत होकर गिर
पड़ते, फिर इतने में एक दूसरे से पहले सचेत होकर पृथ्वी को कँपाते हुए गर्जन करते ।
इस प्रकार, युद्ध करते समय उस राक्षस ने अपनी गदा को दोनों पक्षों की सेनाओं को
आश्चर्यचकित करते हुए घुमाकर सूर्यपुत्र पर ऐसा फेंका कि सुग्रीव पृथ्वी पर गिर पड़ा,
युद्धकांड [Page 409]
किंतु शीघ्र ही उठकर सुग्रीव ने अपना परिघ घुमाकर उस राक्षस पर ऐसा फेंका कि वह
उसके अंगो से लगकर चूर-चूर हो गया । तब क्रोध से जलते हुए उस राक्षस ने अपने करवाल
को सुग्रीव पर फेंका, तो सुग्रीव ने उस कृपाण को लेकर उसे चमकाते हुए उस राक्षस के
मकर-कुण्डलो से दीप्त मस्तक पर ऐसा प्रहार किया कि वह पृथ्वी पर लोट गया । यह
देखकर राक्षस लका की ओर भागने लगे ।
तब सुपार्श्व ने अपने बल के गर्व से फूलते हुए अंगद की सेना पर आक्रमण किया
और तीक्ष्ण शरो के प्रहार से कुछ वानरो के सिर काट डाले, कुछ लोगो के हाथ काटे
और कुछ लोगो का सहार किया । तब वानर भयभीत होकर भागने लगे । यह देख अगद
उस राक्षस के रथ पर कूदा और उसी का परिघ छीनकर उससे उस राक्षस पर ऐसा
प्रहार किया कि वह व्याकुल होकर पृथ्वी पर लुढ़क गया । इतने में जाम्बवान् ने एक विशाल
चट्टान उठाकर उस पर ऐसा फेंका कि उसका रथ टूट गया और अश्व तथा सारथी मर
गये । इतने में सुपार्श्व सचेत हुआ और क्रोध से जलते हुए, अगद के कंधे पर दस बाण
चलाये, जाम्बवान् पर तीन बाण चलाये और गवाक्ष पर पाँच बाण चलाये । अंगद बडे
रोष से परिघ घुमाकर उस राक्षस पर फेंका, तो वह पृथ्वी पर मूर्च्छित होकर गिर पड़ा ।
इसी समय अंगद उस राक्षस का धनुष तोडने लगा, तो वह राक्षस संभलकर उठ बैठा और
परशु उठाकर उससे अगद पर ऐसा आघात किया कि अगद मूर्च्छित होकर गिर पड़ा । फिर,
शीघ्र ही सँभलकर अंगद ने अपनी वज्र-सम मुष्टि से उस राक्षस को ऐसा मारा कि वह
कुलिश के आघात से गिरनेवाले कुलपर्वत की भाँति युद्ध-भूमि में गिर पडा । यह देखकर
देवता हर्ष से निनाद करने लगे और राक्षस-सेना के पैर उखड गये । तब दशानन कहने
लगा—'महा पराक्रमी सुपार्श्व नष्ट हुआ, बाहुबली युद्धोन्मत्त की मृत्यु हो गई, विरूपाक्ष
का वध हुआ और श्रेष्ठ राक्षस-वीर युद्ध में काम आये । अब बल-समन्वित इन राज-
कुमारो को मैं स्वयं जीतूँगा और अपने वधुओ की मृत्यु की शोकाग्नि से जलनेवाली लंका
के रहनेवालो के दुख को दूर करूँगा । अविरल क्षात्र धर्म-रूपी जड़, नव-विजय से उन्नत
लक्ष्मण-रूपी प्रकाड (तना), सूर्यपुत्र तथा अन्य वानर-वीर-रूप शाखाएँ, राम की अखड
कीर्त्ति-रूपी मंजरी, सीता-रूपी फल से युक्त हो, देवताओ के लिए आश्रय-रूपी छाया प्रदान
करनेवाले राम-रूपी वृक्ष को मैं उखाड दूँगा और उसे अपने मन के दुःख को दूर करने-
वाली ओषधि बनाकर, इस संसार में जीवन-यापन करूँगा ।'
११९. रावण का राघवौं पर आक्रमण करना
इस प्रकार कहते हुए असुरेश्वर ने क्रोधोद्दीप्त मन से अपने सारथी से कहा—
'तुम अपनी चतुरता का प्रदर्शन करते हुए रथ को राघवो पर चलाओ, मै आज उनका
सहार करूँगा । यदि वे युद्ध में मरेंगे, तो सभी वानर तितर-बितर होकर भाग जायेंगे ।'
रावण के आदेशानुसार सारथी ने रथ की नेमियो का भयावह रव करते हुए उसे राघवो
के निकट चलाया । बंदी, मागध तथा सूत रावण की विपुल कीर्ति का गान करने लगे,
राक्षस-सेना भीषण गर्जन करने लगी और निसान घोर रव करते हुए बजने लगे । तब
दशकंठ धनुष का भयकर टकार करते हुए वानर-सेना पर दारुण अस्त्र चलाने लगा । ब्रह्मा से
५२
४१० रंगनाथ रामायण
निर्मित उन वाणो के लगते ही समस्त वानर, अपना भुजबल खोकर पृथ्वी पर गिरने लगे।
इतने में रघुराम ने अपने अनुज के साथ क्रोध से धनुष धारण किये हुए रावण का सामना
किया । राम के धनुष का निनाद सुनते ही आकाश विदीर्ण-सा हो गया, समुद्र आलोडित
हो गये, दिग्गजो के कान के परदे फट गये और राक्षसो के चित्त डोल उठे । -क्रुद्ध दशकठ
के धनुष से निकलनेवाले भयंकर वाणो की ध्वनि सुनकर ही कितने वानर भयाक्रान्त
हो पृथ्वी पर गिरने लगे । तब राम-लक्ष्मण सूर्य-चन्द्र की भाँति भासमान होते हुए युद्ध
के लिए आगे बढे, तो देवताओ का शत्रु रावण राहु की भाँति शोभायमान होते हुए उनसे
जूझ गया । जब लक्ष्मण ने दशकठ पर अत्यत तीव्र शर चलाये, तब दशकठ ने उन्हें कठोर
वाणो से बीच में ही काट डाला और उनपर उग्र वाण चलाये । लक्ष्मण ने भी उसके
एक-एक वाण को खंडित करके उस पर तीन वाण एक साथ चलाये । तब रावण ने
अपने तीन वाणो से उनके वाण खंडित कर दिये । इसी प्रकार, जब लक्ष्मण दस वाण
एक साथ चलाते, तब वह उन्हें अपने दस वाणो से छिन्न-भिन्न कर देता, सौ वाण चलाते
तो वह अपने सौ वाणो से उन्हें चूर-चूर कर देता । इस प्रकार, सौमित्र को युद्ध-भूमि में
तंग करके उसके उपरात दनुजेश्वर राम से युद्ध करने चला । उसे देखकर सभी वानर इस
प्रकार भागने लगे, मानो वे यम को देखकर भाग रहे हो । तब राम ने क्रोध से आँखें
लाल किये हुए धनुष सँभालकर रावण का सामना किया । तब सभी देवता राम की
प्रशंसा करने लगे और पृथ्वी हिल उठी । तब रावण भी क्रोध से तेवर बदलकर राम से
भिड़ गया । राम तथा रावण भयंकर अट्टहास करते हुए धनु
युद्धकांड ४११
रावण इससे अत्यत व्याकुल हुआ और राम पर सर्प-त्राण चलाये, तो राम ने उन्हें बीच
में ही काट डाला । तब रावण ने शार्दूलमुख, उष्ट्रमुख, सूकरमुख, सर्पमुख, गजमुख,
गृध्रमुख तथा सिंहमुखवाले कितने ही भयकर वाण राम पर चलाये, पर राम ने उनके
टुकडे कर दिये । उसके पश्चात् राम ने आग्नेयास्त्र चलाया, तो उसमें से उल्कामुख, विद्युन्मु ख,
ग्रहमुख, सूर्यमुख तथा अग्निमुख से युक्त वाण निकलकर रावण पर आघात करने
के लिए पहुँचे । तब रावण ने आश्चर्य्य-चकित रीति से उन सबको काट डाला और मय
से प्राप्त माया-शर का सधान करके उसे राम पर चलाया । उससे असख्य भाले, तोमर,
गदा, परिघ आदि शस्त्र निकल पड़े । यह देखकर राघव ने अपने महान् धनुष पर गाधर्व
शर का सधान करके चलाया, तो उसमें से अनेक सूर्यविब-सदृश चक्र तथा दिव्य वाण
ससार को त्रस्त करते हुए निकले और उन्होने रावण के माया-शर से निकले हुए परिघ
आदि शस्त्रो को चूर-चूर कर दिया । तब दशकठ ने क्रोध करके राम पर अनेक प्रखर
वाण चलाये, तो राम ने भी शीघ्र गति से उस राक्षस पर असख्य प्रतिशर चलाये । राम-
रावण के शर-जाल से सारा आकाश ढक गया । तब लक्ष्मण ने सात वाणो से रावण की
पताका को काट डाला, एक वाण से धनुष को तोड दिया एक और वाण से सारथी का
वध किया और फिर रावण के वक्ष पर पाँच वाणो से प्रहार किया । इसी समय विभीषण ने
इन्द्रनील पर्वत की भाँति दीखनेवाले रावण के अश्वो को मार गिराया । रथ से वचित
होने से रावण पृथ्वी पर कूद पडा और अपने दसो मुखो की भौंहो को तानकर क्रुद्ध दृष्टि
से विभीषण पर भयकर शक्ति-वाण चलाया । किन्तु, रामानुज ने तीन वाणो से उसे बीच
में ही गिरा दिया । उससे स्फुलिंग तथा ज्वालाएँ निकलकर आकाश तक व्याप्त हो गईं ।
तब दशकंठ अत्यत क्रोध करके, मय से प्राप्त शक्ति-वाण को विभीषण पर चलाने का
यत्न कर ही रहा था कि लक्ष्मण ने कहा—'शरणागत की रक्षा करनेवाले धर्मात्मा क्या
कभी शरणागत की मृत्यु सह सकते हैं ? यो कहते हुए उन्होने रावण के अनुज को अपने
पीछे कर लिया और स्वय रावण पर क्रूर वाण चलाने लगे ।
१२०. रावण की शक्ति से लक्ष्मण का मूच्छित होना
तब रावण ने कहा—'हे लक्ष्मण, बडे शूर की भाँति तुमने विभीषण को अपने
पीछे छिपा लिया है । तब तुम स्वय ही इस शक्ति के प्रहार का सहन करो ।' इस प्रकार
कहते हुए उसने प्रलय-काल के आदित्य के परिवेश के सदृश, उस शक्ति को घोर वलय के
रूप में घुमाकर, उसे लक्ष्मण पर चलाया । तब वह शक्ति अपनी किंकिणी तथा घटिकाओ
का निनाद करते हुए, समुद्रो को आलोड़ित करते हुए, कुल-पर्वतो को हिलाते हुए,
दिशाओ को कँपाते हुए, सूर्यविंब को विचलित करते हुए, वज्रो को गिराते हुए, पृथ्वी को
कंपित करते हुए, आकाश को झकझोरते हुए, नक्षत्रो को तितर-बितर करते हुए, अग्नि-कणो
को विकीर्ण करते हुए, ज्वालाओ को व्याप्त करते हुए, आदिशेष की जिह्वा का आकार
धारण किये हुए, लक्ष्मण के द्वारा चलाये जानेवाले वाण-समूह को चूर-चूर करते हुए,
लक्ष्मण के वक्ष पर भयकर गति से गड गई । राम कहने लगे कि इस भयकर अस्त्र से
लक्ष्मण के प्राणो पर कोई विपत्ति नही आये । समस्त देवता यह देखकर आकाश में हाहाकार
४९२ रंगनाथ रामायण
करने लगे । शक्ति-वाण के लगते ही लक्ष्मण चकराकर पृथ्वी पर ऐसे गिर पड़े,
जैसे प्रलय-काल में महामेरु पर्वत ढह जाता है ।
धरती पर पड़े हुए अपने अनुज को देखकर, राम का हृदय शोकाग्नि से जलने
लगा और आँखों से अश्रुपात होने लगा । लक्ष्मण के विशाल वक्ष में अच्छी तरह गड़े हुए
उस शक्ति-वाण को निकालने के लिए सभी वानर-वीर यत्न करने लगे, किन्तु उनसे वह
निकल नहीं सका । तब राम ने रावण के द्वारा चलाये जानेवाले वाण-समूह की उपेक्षा
करते हुए, उस शक्ति वाण को लक्ष्मण के वक्ष से निकालकर फेंक दिया । उसके पश्चात्
उन्होंने सभी वानर-वीरों को देखकर कहा—"हे वीरो, अपना शौर्य प्रदर्शित करने का यही
समय है, शोक में पड़कर युद्ध से विमुख होने का समय नहीं है । अब तुम लोग लक्ष्मण
की रक्षा करते रहो और मेरी यह प्रतिज्ञा सुन लो । मैं आज इस दुष्कर्मी दशकंठ का
संहार करके, उन सभी दुःखों को दूर करूँगा, जिन्हें मैंने, राज्य छोड़ने, बन्धुजनों से अलग
होने, वनों में भटकने, धनुष-वाण लिये हुए भी, अपनी प्राण-प्रिय धर्म-पत्नी को खोने तथा
मायावी राक्षसों से युद्ध करने से प्राप्त किया था । समर-भूमि में इसका वध करने के लिए
मैंने असमान विक्रमी वालि का संहार किया और कपिराज के रूप में सुग्रीव का अभिषेक
किया । प्रचंड ग्राह-संकुल तथा आकाश का स्पर्श करनेवाली तरंगों से युक्त अनंत सागर
पर सेतु बाँधकर मैं कपि-सेना के साथ समुद्र को पार करके आया और लंका को घेर
लिया । यहाँ अब मैं अपने सौमित्र को खो बैठा हूँ । यदि युद्ध में रावण मेरे दृष्टि-पथ में
आये, तो अपनी दृष्टि के विष से ही उसका अंत कर दूँगा, जैसे क्रूर सर्प दुष्ट जंतुओं को मार
डालता है । अब मैं दशकंठ को जीवित लौटने नहीं दूँगा, उसे मैं अपने वाण-समूह का
लक्ष्य बना दूँगा । आज सभी वानर पर्वतों पर चढ़कर हमारे युद्ध का कौशल देखते रहें ।
आज सभी दिक्पाल तथा समस्त लोक मेरे धनुर्विद्या-कौशल को भली भाँति देख लें और
युद्ध में मेरे पराक्रम को देखकर, मुझ रघुराम के विक्रम को जान लें । आज रावण भले
ही देवलोक में छिप जाय, समुद्र के गर्भ में डूब जाय, पृथ्वी में समा जाय, और रसातल
में प्रवेश कर जाय, तब भी मैं उसका संहार किये बिना नहीं छोड़ूँगा । यदि निश्चय ही
मैंने रवि-कुल में जन्म लिया है, यदि मैं रवि-समान तेजस्वी दशरथ का पुत्र हूँ, यदि मैं
राम हूँ, यदि रावण युद्ध-क्षेत्र में डटा रहा, तो मैं किसी भी प्रकार उसका वध करूँगा ।
इस युद्ध-क्षेत्र में या तो रावण रहेगा या राम रहेगा । राम तथा रावण दोनों का यहाँ
रहना अब असंभव है ।"
ऐसी प्रतिज्ञा करके राम ने दशकंठ पर भीषण वाण चलाने लगे । दशकंठ ने भी
उनके वाणों के प्रतिवाण चलाये, तो उन वाणों के परस्पर टकराने से निकलनेवाली अग्नि-
ज्वालाएँ आकाश तक व्याप्त हो गईं और घोर ध्वनि होने लगी । इस ध्वनि के साथ
धनुषों के टंकारों की ध्वनि मिलकर समस्त लोकों को भयभीत करने लगी ।
१२१. रावण का चिंतित होना
राम के वाणों के प्रहार से रावण जर्जर हो गया और उनके वाणों के वेग का
सहन न कर सकने के कारण राक्षसेन्द्र, सिंह को देखकर भागनेवाले गजराज की भाँति,
युद्धकांड ४१३
युद्ध-भूमि को छोड़कर भागने लगा । तब उसके केश खुल गये, सुदर रत्न-खचित आभूषण
बिखरने लगे, समस्त भूत तालियाँ बजाकर अट्टहास करने लगे, और वानर हर्ष के निनाद
प्रकट करने लगे । भागते समय उसके चरण-घात से पृथ्वी भी काँपने लगी ।
इस प्रकार, लका में प्रविष्ट होकर वह अपने सभा-मडप में आसीन हुआ । फिर,
वह विभीषण के हितवचनों, राम के प्रहारो का तथा कुंभकर्ण, अतिकाय, महान् इंद्रजीत
आदि वीरो की मृत्यु का स्मरण करके मन-ही-मन शोक-सतप्त हो निश्चेष्ट बैठा रहा ।
कुछ समय के उपरान्त वह सँभलकर अत पुर में पहुँचा और उद्विग्न हो, अपनी पत्नी को
बुलाकर सिर झुकाये हुए कहने लगा—'हे प्रिये, राम के अद्वितीय विक्रम का वृत्तात सुनो।
मैं कैसे कहूँ ? वह देखो, मेरे समक्ष सहस्रो राम दीख रहे हैं । मैं इस लका में जहाँ भी
देखता हूँ, वहाँ राम-ही-राम मुझे दिखाई पडता है । अब विजय की कोई आशा नही है ।
अब शकर के चरण ही मेरे लिए शरण हैं । जिस देव के दिव्य तथा भयकर बाण के
आघात से त्रिपुर भस्मीभूत हुए, जिनके मुकुट पर चन्द्रकला रमणीय गति से सुशोभित
हो रही है, जिनके हाथो में पिनाक, खड्ग, त्रिशूल आदि विलसित हैं, जो अखिल
लोक के ईश हैं, जिन्होंने दक्ष-यज्ञ का विध्वंस किया था, क्रुद्ध होकर जिन्होंने अधकासुर का सहार
किया था, वेद जिस देव की स्तुति करते हैं, तथा जो देवाधिदेव हैं, उस शिवजी की अब
मैं उपासना करूँगा ।'
इस प्रकार निश्चय करके वह स्नान आदि से निवृत्त हुआ, ब्राह्मणो को विविध
दान देकर उन्हें तृप्त किया तथा मद, दर्प आदि ( राजस भावो का ), त्याग कर
सात्त्विक भाव ग्रहण किया । उसके पश्चात् उसने, रक्ताबर, रक्त माल्य, रक्त उपवीत,
रक्त चदन तथा रक्तवर्ण की जपमाला आदि धारण की और फिर बडी भक्ति के साथ
मत्र का जप करते हुए, शिव के मदिर में पहुँचा । वहाँ एकनिष्ठ हो उसने एक वेदी
बनाई, दर्भांकुर आदि एकत्र किये । फिर सभी, दिशाओ में यज्ञ के रक्षणार्थ भयकर राक्षसो
को नियुक्त किया और यज्ञ करने के लिए उद्यत हुआ । इसकी सूचना मिलते ही मदोदरी
वहाँ आ पहुँची और दशकठ को देखकर कहने लगी—'हे दानवेन्द्र, क्या, आपको उचित है
कि इस प्रकार दीन होकर अपना शौर्य खो बैठें । आपके क्रोध करने से सभी समुद्र गर्जन
करने से डरते हैं, पवन चलने से डरता है, अग्निदेव तीव्र ज्वालाओ के साथ जलने से डरता है
और आकाश में सूर्य प्रचंड तेज से दीप्त होने से डरता है । आपके नाम से सारे जग
विचलित होते हैं । ऐसे आप, अपना साहस खोकर ऐसी दशा को क्यो प्राप्त हुए ? यदि
आपमें इतना साहस नहीं था, तो उस दिन राम की पत्नी को क्यो ले आये ? उस दिन
मारीच ने जो हित-वचन आपसे कहे थे, उन्हें आपने बुरा मान लिया और नीति-विरुद्ध
वचन कहे थे । नीति का विचार करके तथा आपके अहित की सभावना देखकर धर्मात्मा
विभीषण ने बार-बार आपसे कहा था कि हे राक्षसेन्द्र, आप अनुचित मार्ग पर क्यो जा
रहे हैं ? सीता को छोड़ देने में ही आपका हित है । किंतु आपने उनके वचनो पर ध्यान
नहीं दिया । मातामह माल्यवान् ने आपको नीति सुझाई, तो क्या आपने उसको स्वीकार
किया ? आपकी माता ने स्वयं उचित कर्त्तव्य का आदेश दिया, तो क्या आपने उन पर
ध्यान दिया ? कुभकर्ण ने जव कहा था कि राम से आप क्यो विरोध ठानते हैं, तो क्या
आप क्रुद्ध नहीं हुए ? इस कार्य से विमुख होने का उपदेश जिन लोगों ने दिया था, उनके
ही वचन आज सिद्ध हुए हैं न ? अपने भुजवल तथा पराक्रम को छोड़कर आज आपने
मुनि-वृत्ति क्यों स्वीकार की है ? इन्द्र से युद्ध करके भी आप परास्त नहीं हुए, अव आप रामचंद्र
को परास्त नहीं करेंगे, तो क्या लोग आपका उपहास नहीं करेंगे ? हे असुरेश्वर, आप युद्ध
करके शत्रु पर विजय पाइए । दीन होकर आप यह सव क्या कर रहे हैं ?"
इस प्रकार जब मंदोदरी ने रावण को उत्तेजित किया, तब रावण ने लज्जा से एक
दीर्घ निःश्वास छोड़ा और कहा—'हे सुंदरी, तुम्हारी वातें सत्य हैं । अव मैं रामचन्द्र से
नहीं डरूँगा । अव तुम जाओ ।' तब प्राणेश्वर को प्रणाम करके आँखों से अश्रु-वर्षा करती
हुई वह चली गई । उसके कहे हुए दुःखपूर्ण वचनों का स्मरण करके रावण ने हवन करना
छोड़ दिया और युद्ध की तैयारी करने के लिए चला गया ।
१२२. लक्ष्मण की मूर्च्छा पर राम का शोक
युद्ध-भूमि में रक्त में भीगे, निश्चेष्ट पड़े हुए शेषनाग के सदृश दीखनेवाले अपने
प्रिय अनुज को देखकर रामचंद्र अधीर होकर शोक करने लगे । वे कहने लगे—"सौमित्र
को इस प्रकार पृथ्वी पर गिरे हुए देखकर मैं किस प्रकार अपने प्राणों को रोक सकता हूँ ?
युद्ध करने की शक्ति मुझमें कैसे आयगी ? अपनी मुष्टि में धनुष कैसे धारण कर सकूँगा ?
आँखों में आंसू उमड़-उमड़कर आते समय, बढ-बढ़कर आनेवाले शत्रुओं को मैं कैसे देख
सकूँगा ? मेरी आँखों के सामने मेरा सहोदर, मेरा प्रिय बंधु, मेरा प्रिय सखा मेरे लिए
प्राणों की वलि देकर मुझे छोड़कर चला गया है । धिक्कार है, मेरे शौर्य को । मुझे
अव इस युद्ध की आवश्यकता ही क्या है ? मुझे विजय ही किसलिए चाहिए ? मुझे अव
राज्य की क्या आवश्यकता है ? मुझे अव सीता ही क्यों चाहिए ? मेरा यह शौर्य किस
काम का ? मैं अव जीवित ही क्यों रहूँ ? हे लक्ष्मण, तुम्हारे साथ मैं भी स्वर्ग चलूँगा ।
हे बंधु, विजयी होकर तुमने पहले शरभ-शार्दूलों से भरे हुए भयंकर वनों में मेरी रक्षा
करते रहे, अव यहाँ तुच्छ दैत्यों के वन के बीच मुझे पराया समझकर छोड़ दिया है ।
हे तात, अपनी उन्नत शक्ति से मेरी रक्षा करने के निमित्त वन में तुम एक क्षण भी
नहीं सोये ? आज इस प्रकार दीर्घ निद्रा में सो जाना क्या तुम्हें उचित है ? मैं वार-
वार दुःख के आवेग से ऊँचे स्वर में तुम्हें पुकारता हूँ, फिर भी तुम बोलते क्यों नहीं हो ?
अव मेरे लिए कौन है ? मैं कहाँ जाऊँ । मैं अंत में शोकाग्नि के हाथों में पड़ गया हूँ ।
शुभलक्षण-सपन्न, सुन्दराकार, अद्वितीय वलवान्, परम भक्त तथा प्रिय सहोदर, गम्भीरचेता,
युद्धविजयी मेरा प्राण-सखा लक्ष्मण मेरे साथ वनवास के लिए आया । अव मैं इसी के साथ
स्वर्ग जाऊँगा । कितने ही बंधु हैं और कितनी ही पत्नियाँ हैं, किन्तु ऐसा सहोदर
पृथ्वी में कहाँ मिलेगा ? यत्न करूँ, तो सीता की समता करनेवाली पत्नी को मैं कहीं-न-
कहीं प्राप्त कर सकता हूँ; पर ऐसे सद्गुणशील, दयालु तथा महावली अनुज को मैं
कहाँ पाऊँगा । क्या, यह केवल मेरा अनुज था ? यह महाबली सतत मेरी सेवा करने-
वाला भक्त भी था । यही मेरा पौरुष था, यही मेरी शांति था, यही मेरी कीर्त्ति था,
युद्धकांड ४१५
यही मेरी प्रेरणा था, यही मेरा शौर्य था, यही मेरा धैर्य तथा विनय था और यही मेरी
विजय था । इतना ही क्यो, मेरे लिए भाग्य-देवता तथा मेरा पावन राज्य-पद भी यही था ।”
इस प्रकार, जब राम शोक से अभिभूत हो प्रलाप कर रहे थे, तब सुषेण ने राम
को देखकर कहा—'हे देव, आप इस प्रकार शोक क्यो करते है ? आप धैर्य धरकर इनकी
ओर देखिए । यदि इनके शरीर में प्राण नही रहते, तो क्या, उनके मुख पर ऐसी आभा
दिखाई देती ? या उनकी आँखें कमलो की सुदरता लिये रहती ? या उनकी सुंदर हथेलियाँ
लाल कमल की भाँति सुशोभित रहती ?'
इस प्रकार राम को आश्वासन देकर उसने उन्हें शात किया और हनुमान् को
देखकर कहा—'इसके पहले जाबवान् के कहने से तुम ओषधियो का पता जानते ही हो ।
महाद्रोण पर्वत के, दक्षिण शिखर पर विशल्यकरणी, सौवर्णकरणी, सधानकरणी तथा
सजीवकरणी ओषधियाँ अपनी काति से प्रकाशित रहती है । तुम शीघ्र इन चारो ओषधियो
को ले आओ । उनकी सहायता से लक्ष्मण के प्राण लौट आयेंगे । पूर्वकाल में देवासुरो ने
क्षीर-सागर का मथन करके जो अमृत प्राप्त किया था, उसे वही छिपा रखा है । उसी
अमृत से इन ओषधी-लताओ ने जन्म लिया है । लवण-समुद्र को पार करके जाने के बाद
कुशद्वीप मिलेगा, उसे पार करके आगे बढो, तो क्षीर-सागर मिलेगा । उसे भी पार कर
जाओ, तो चद्र तथा द्रोण पर्वतो को देखोगे । वहाँ देवेन्द्र की आज्ञा से मदराचल की भाँति
विशालकाय गधर्व उन ओषधियो की रक्षा करते रहते हैं । गधर्वों से तुम्हारा युद्ध होगा ।
वही राक्षस भी घूमते रहते हैं । वे बडे मायावी हैं, उनसे सावधान रहना । द्रोणाद्रि से
उन ओषधियो को लाकर, लक्ष्मण के प्राणों को लौटाओ, जिससे रघुपति प्रसन्न हों । यहाँ
से वह पर्वत तेईस लाख, बीस हजार दो सौ दस योजन दूर है । तुम वायु-वेग से जाकर
सूर्योदय के पहले ही यहाँ लौट आओ । सूर्योदय हुआ, तो वे ओषधियाँ अपनी काति खोकर
शक्तिहीन हो जायेंगी । उसके पश्चात् लक्ष्मण को मूर्च्छा से जगाना असभव होगा । इसलिए
हे वानरोत्तम, तुम शीघ्र जाकर वापस आओ । उन ओषधियो के लक्षण भी तुम्हें जान
लेना चाहिए । उनके फल हरे होगे, फूल लाल होगे और पत्ते सफेद होगे । तुम शीघ्र
विभीषण, जाबवान्, सुग्रीव तथा अगद की अनुमति लेकर जाओ ।'
सुषेण के इन वचनो को सुनकर हनुमान् ने कहा—'ऐसा ही हो ।' तब पवनपुत्र
को देखकर राम ने कहा—'मूर्च्छित पडे हुए लक्ष्मण को प्राण-दान करके तुम त्रिभुवनो में
अचल कीर्ति प्राप्त करो । मेरे तीन भाई हैं । हे अनिलकुमार, आज से तुम्हारे साथ मेरे
चार भाई होगे ।'
१२३ सजीवनी लाने के लिए हनुमान् का द्रोणाद्रि को जाना
राम की बातें सुनकर हनुमान् ने कहा—'हे सूर्यकुलतिलक, सेवक हनुमान्
के रहते हुए आप चिंता क्यो करते है ? हे राजन्, आपकी आज्ञा शिरोधार्य करके शीघ्र
ही सप्त द्वीपो के उस पार रहने पर भी ओषधियो के उस पर्वत को सूर्य के उदयाचल
पर आने के पहले ही ले आऊँगा ।' इस प्रकार कहते हुए उसने राम के चरणो पर गिर-
कर प्रणाम किया । तब राम ने उसे उठाकर हृदय से लगा लिया और कहा—'हे अजनि-
४१६ रंगनाथ रामायण
पुत्र, इन्द्र तुम्हारे सिर की, सूर्य तुम्हारे मुख की, चन्द्र तुम्हारे मन की, आदिशक्ति तुम्हारे
नितंब की, पवन तुम्हारी पीठ की, शिव तुम्हारी पूँछ की, अग्नि तुम्हारे चरणो की, ब्रह्मा
तुम्हारी बुद्धि की, वरुण तुम्हारी शक्ति की, सरस्वती तुम्हारी वाणी की, विष्णु तुम्हारे
बाहुद्वय की तथा गणेश तुम्हारे उदर की रक्षा करते रहेंगे । तुम शीघ्र जाकर आओ ।'
उसके पश्चात् क्रमशः सुग्रीव, विभीषण, जाम्बवान् तथा अंगद आदि वानर-वीरो ने उसे
विदा दी । तब हनुमान् आकाश की ओर ऐसे उछला कि जिस पर्वत पर चढकर वह उछला था,
वह धँस गया और पृथ्वी विदीर्ण हो गई, पवन, समुद्र तथा आकाश-गंगा व्याकुल-सी
हो गई और लंका नगर की ऊँची अट्टालिकाएँ गिर गईं । उसके पश्चात् वह विद्युत्-प्रकाश के
समान उज्ज्वल कांति से युक्त अपनी पूँछ को तथा अपने दोनो विशाल हाथो को ऊपर
उठाये, सूर्य-मंडल की भाँति प्रकाशमान होनेवाले अपने मुख से प्रचड दीप्ति
विकीर्ण करते हुए, चरणो तथा कर्णो को कुचित करके उड़ने लगा । देखते-देखते वह अनेक
पर्वतो, कई देशो, कई नद-नदियो, कई वनो, नगरो तथा समुद्रो को देखते हुए हिमाचल के
पार निकल गया । दिशाओ तथा आकाश को कँपाते हुए वह एकाकी शूर आगे बढने लगा।
१२४. कालनेमि का वृत्तांत
गुप्तचरो के द्वारा रावण ने यह समाचार सुना, तो वह हनुमान् के मार्ग में विघ्न
डालने का सकल्प करके स्वयं अर्द्धरात्रि के समय कालनेमि के घर पहुँचा । कालनेमि ने
अत्यंत श्रद्धा से रावण को अर्घ्य, पाद्य आदि देकर उसका सत्कार किया और पूछा-'हे
राजन्, अर्द्धरात्रि के समय आपके यहाँ पधारने का क्या कारण है, कृपया बताइए ।'
तब रावण ने कहा-'आज मेरे शक्ति-बाण से आहत लक्ष्मण को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य
से राम की आज्ञा से हनुमान् संजीवकरणी लाने के लिए जा रहा है । तुम शीघ्र जाकर
उस हनुमान् का वध कर डालो, या उसके मार्ग में कोई ऐसा विघ्न उपस्थित करो कि
वह सूर्योदय के पूर्व यहाँ पहुँच नही सके । द्रोण पर्वत के पास ही देवासुरो से निर्मित एक
सरोवर है । उसमें एक महान् मकरी बडे आनंद से रहती है। वह देवताओ को भी निगल
जाने की क्षमता रखती है, तब इस वानर की गिनती ही क्या है ? तुम कोई ऐसी माया
रचो कि हनुमान् उस सरोवर में पहुँच जाय । तुम शीघ्र जाओ ।'
रावण की बातें सुनकर, मन-ही-मन नीति-मार्ग का विचार करके, उसने कहा-
'हे दनुजेंद्र, माया-मृग का रूप लेकर मारीच गया था और उसकी मृत्यु हुई । आप इस
अनुचित मार्ग को त्याग दीजिए । घोर युद्ध में कुभकर्ण आदि दानव-वीर नष्ट हो चुके है ।
अब तो आप बात मानिए । राम के पास सीता को पहुँचा दीजिए और अपनी लंका
विभीषण को देकर आप शिवजी के निवास कैलास पर्वत पर तपस्वी बनकर जीवन व्यतीत
कीजिए या योद्धा के समान, युद्ध-भूमि में राम से युद्ध कीजिए और उनके हाथो से
प्राण त्यागकर विष्णु-सायुज्य प्राप्त कीजिए ।"
कालनेमि के इस प्रकार कहते ही रावण की आँखें क्रोध से लाल हो गई और वह
अपने चंद्रहास को निकालकर उसका वध कर डालने के लिए उद्यत हुआ । यह देखकर,
कालनेमि ने कहा-'हे देव, आपकी आज्ञा का पालन करने में अभी जाता हूँ ।'