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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 431, कुल 508 में से

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पृष्ठ 431

व्याकुल करने लगे, तब सुग्रीव, अंगद, पवनपुत्र तथा नील आदि वानर-वीर अत्यंत क्रोध
से उनपर पर्वतो तथा वृक्षो की वर्षा करने लगे । इससे असंख्य रथ खंड-खंड होकर गिर
गये; हाथी झुड-के-झुड गिरकर मर गये और अश्व तथा पदचर सेना पृथ्वी पर लोटने
लगी । जब रथारूढ कुछ राक्षस क्रुद्ध हो पृथ्वी को कँपाते हुए, अपने मनोरथो की भाँति,
अपने रथो को बडे वेग'से वानरो पर चलाया, तब वानरो ने उन रथो के जुए पकड़कर
सहज ही उन्हें पृथ्वी पर पटक दिया । जब अश्वारोही राक्षसो ने कपियो पर अपने अश्व
चलाये, तब कपि उनके सम्मुख धैर्य के साथ खडे होकर एक अश्व को उठाकर उससे दूसरे
अश्व पर प्रहार करने लगे । जब गजारोही सैनिक वानरो पर गजो को चलाते, तब वानर
गजो पर आक्रमण करके एक गज से दूसरे गज को टकरा देते । फिर, वे गज-सेना पर
टूट पडते और गजो पर आरूढ राक्षसो को नीचे खींच लेते या उन पर पदाघात करके
गिरा देते या उन्हें नीचे गिराकर अपने पैरो से कुचल देते या उन्हें ऊपर उठाकर पृथ्वी
पर पटक देते और विविध रीतियो से उन्हें छिन्न-भिन्न कर देते थे । इस समय अश्वो के
खुरो से उठी हुई धूलि के आकाश में व्याप्त होने से युद्ध-भूमि में अंधकार-सा छा गया ।
उस अंधकार में करवालो की दीप्ति उन्हें मार्ग दिखाने लगी, तो उस दीप्ति की सहायता
से वानर तथा राक्षस परस्पर घोर युद्ध करने लगे । इस युद्ध के कारण बहनेवाले रक्त
की धारा-रूपी किरणें, धूलि-रूपी अंधकार को दूर करने लगी । घोर युद्ध में हाथी तथा
रथ-रूपी तटो के बीच अश्व-रूपी मगर, ध्वजाओ, पेडो तथा सैनिको-रूपी तटवर्त्ती वृक्षो,
खड्ग-रूपी मछलियो, हाथी की सूँड-रूपी सर्पों, ढाल-रूपी कच्छपो, चूर-चूर वने हुए
असंख्य रत्नाभूषणो के कण-रूपी रेत, केशजाल-रूपी शैवाल तथा चामर-रूपी फेन से
युक्त रक्त की नदियाँ बहने लगी । उन नदियो को शीघ्र पार करते हुए वानर तथा राक्षस
परस्पर भिड जाते । इतने में वानर राक्षसो पर उद्धत गति से टूट पडते, उनकी रीढो
को तोड देते, अपनी मुष्टियो तथा कुहनियो से प्रहार करके, उन्हें नीचे गिरा देते, सिरो
को कुचल देते, उनके पेट चीर देते, और इनसे भी संतुष्ट न होकर उन्हें दाँतो से काटते,
अंगो को तोडते, एँडी पकडकर उन्हें घुमाकर पृथ्वी पर पटक देते, उनके केश पकडकर क्रूर
गति से खींचते, दोनो हाथो से दो राक्षसो को पकडकर उन्हें एक दूसरे से टकराकर चूर-
चूर कर देते, उन्हें गिराकर उनके वक्षो पर ऐसा प्रहार करते कि उनकी छातियाँ फट जाती
उनसे रक्त वह निकलता और अपने नाखूनो तथा दाँतो से उनकी नाक, कान, मुख,
ललाट आदि चीर डालते । कभी एक सौ वानर एक ही दानव पर टूट पडते और कभी
एक ही वानर एक सौ दानवो का नाश कर देता । इस प्रकार, वानरो ने वडी तत्परता से
लडते हुए दानवो को तितर-वितर कर दिया ।
तब राक्षस-सैनिक बड़े रोष के साथ, अपने दहाड, भेरी, मृदंग आदि युद्ध-वाद्यो के
निनाद से पृथ्वी को कँपाते तथा दिशाओ को विदीर्ण करते हुए, वानर-सेना पर टूट पड़े ।
यह देखकर इन्द्र आदि दिक्पाल भयभीत हो उठे । विक्रत सिर विक्रत प्रकोष्ठ, विक्रन ओष्ठ, विक्रत नख,
विक्रत मुख, विक्रत गात्र, विक्रत नेत्र, विक्रत हास, विक्रत नाक, विक्रत वक्ष, विक्रत वर्ण, विक्रत
कर, विक्रत पाद तथा विक्रत नादवाले राक्षस-वीर उमड-घुमडकर अलग-अलग आनेवाले