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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 428, कुल 508 में से

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पृष्ठ 428

३९८ रंगनाथ रामायण
पति के साथ इस पृथ्वी पर जन्म लेकर अगणित संपत्ति के साथ चिर काल तक
सुख-भोग करोगी और उसके पश्चात् तुम दोनो वैकुण्ठ में अपना इच्छित सुख
प्राप्त करोगे ।'
राम के वचन सुनकर वह स्त्री हर्षित हुई और विनयपूर्वक उस दयामय राम की
स्तुति यो करने लगी—'हे दया-समुद्र, हे अमल-गुण-वीर, हे साधुजन-आश्रित, हे सेतु-बन्धक,
आप कृपा करके मेरे पति का शव मँगा दीजिए । मुझे अब शीघ्र नगर को लौट
जाना चाहिए ।' तब सुग्रीव ने उस स्त्री से कहा—'हे कमलनयनी, यदि तुम पतिव्रता हो,
तो बिना विलंब जाकर अपने प्रिय पति से अपना सारा वृत्तान्त कहो ।' यह सुनकर वह
साध्वी शीघ्र युद्ध-क्षेत्र में पहुँच गई । वहाँ उस चंचलाक्षी ने अपने पति के कटे हुए
सिर को देखकर कई प्रकार से रुदन करने लगी । फिर, अपने पति के शरीर के पास
पहुँचते ही उमड़ते हुए दुःख से वह मूच्छित होकर गिर पड़ी । कुछ समय के उपरान्त वह
सचेत हुई और अपने प्राणेश्वर के शरीर पर गिरकर ऊँचे स्वर में हाहाकार करती हुई
विलाप करने लगी । फिर वह धैर्य धारण किये हुए स्थिर हो खड़ी हुई और सत्य की
प्रभा से दीप्त होती हुई यो बोली—'यदि मैंने मन-वचन-कर्म से पति की भक्ति की हो,
यदि मैंने धर्माचरण में पति को ही दैव मानकर पातिव्रत्य धर्म का पालन किया हो, तो
मेरे पति पुनर्जीवित होकर मुझसे संभाषण करें ।'
सुलोचना ने आत्मविश्वास के साथ जब ऐसे वचन कहे, तो दशकंठ के पुत्र ने
आँखें खोलकर कहा—'हे रमणी, मेरा वध करानेवाले तुम्हारे पिता ही तो हैं ? मुझे
जीतने की शक्ति दूसरो में कहाँ है ? तुम को दुखी होने की कोई आवश्यकता नहीं है ।
अपने ऋणानुबंध के अनुसार ही पति अपने पत्नी के साथ रहता है । संयोग तथा वियोग,
दोनों, जीवों के लिए ब्रह्मा के द्वारा विधान किये जाते हैं । समय की गति प्रबल है,
इसलिए मेरी मृत्यु हुई है । अब तुम जाओ ।' इतना कहकर उसने अपनी आँखें बंद कर लीं ।
सुलोचना मन-ही-मन अत्यंत दुखी हो, वहाँ से चलकर राम के पास आई और
उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया और बड़ी प्रसन्नता से उनकी प्रशंसा करने लगी ।
तब रघुराम ने अंगद को बुलाकर कहा—'इस रमणी को उसके पति का शरीर
दिला दो ।'
अंगद ने राम की आज्ञा मानकर सुलोचना को उसके पति का शरीर दिला दिया ।
सुलोचना उस शव को लिये हुए बड़ी भक्ति से राम की आज्ञा प्राप्त कर वहाँ से शीघ्र लंका-
नगर को रवाना हुई । वह सीधे अपने अंतःपुर में नहीं गई, किन्तु अपने पति के शरीर
को एक योग्य स्थान में रखकर, उसकी रक्षा के लिए सैनिकों को नियुक्त करके, उसके पश्चात्
अंतःपुर में गई । वह बहुत समय तक अत्यधिक चिंता में निमग्न रही और उसके पश्चात्
अपने प्रिय पुत्रों को पास बुलाकर आँखों से अश्रुधारा बहाती हुई, उनके सिरों को सूंघा,
गालों का बड़े स्नेह से स्पर्श किया और फिर उन्हें हृदय से लगाकर कहा—'हे पुत्रो,
तुम्हारे मुँह देखते रहने का सौभाग्य मुझे भगवान् ने नहीं दिया है। अब इस पृथ्वी पर
जीना मेरा धर्म नहीं है, इसलिए अवश्य मैं सहगमन करूँगी । अब तुम्हारा यहाँ रहना भी