रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 432, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें४०२ रंगनाथ रामायण
प्रलय-काल के वादलो की पंक्ति के समान परिघ, गदा, चक्र, परशु, तोमर, त्रिशूल, खड्ग,
मुद्गर, करवाल, ढाल, नागमुख, शिलीमुख, धनुष, मूसल आदि समस्त आयुधो से
सज्जित हो वानर-सेना पर भयकर गति से टूट पड़े और उन्हें काटते, पीटते, मारते,
उछालते तथा विविध रीतियो से उनपर प्रहार करते हुए उनका सहार - करने लगे ।
इन क्रूर प्रहारों से भीत होकर वानर अपने हाथ के पर्वतो तथा वृक्षो को नीचे गिराकर
विवश हो सोचने लगे, भला, हमें युद्ध करने की आवश्यकता ही क्या है ? हमें राक्षसों से
शत्रुता ही क्या है ? हमें न सूर्यवंश राम ही चाहिए, न सूर्यपुत्र सुग्रीव । जंगलो में कच्चे
फल और पीले पत्तों को खाते हुए सुख से जीवन-यापन करना छोड़कर, यहाँ इन राक्षसो
के हाथो में व्यर्थ ही हम क्यों मरें ? चलो, हम यहाँ से भाग चलें। यो सोचकर वानर-
वीर धैर्य खोकर सेतु की दिशा में भागने लगे । राक्षस-सेना उनका पीछा करके उन्हें
खदेड़ने लगी ।
११५. वानर-सेना को हनुमान् आदि का प्रोत्साहन देना
हनुमान्, नील तथा अंगद ने वानरो को इस प्रकार भागते हुए देखा, तो वे शीघ्र
सेतु के उस पार गये और वानरो को सेतु के पार जाने से रोककर उन्हें लौटाया । तब
सभी वानर भय से पीड़ित हो राम के पीछे जाकर शरण लेने लगे । राम ने वानरो की
यह दीनता देखी, तो क्रोध से धनुष हाथ में लेकर उसका टंकार करते हुए ऐसा सिंहनाद किया
कि राक्षसो के हृदय भय से काँप उठे । तदनंतर क्रोधोन्मत्त हो अपना हस्त-कौशल दिखाते
हुए, निशाचरों पर तीव्र बाणो की ऐसी वर्षा करने लगे कि उन बाणो की अधिकता के
कारण स्वयं राम भी युद्ध-भूमि में दीखते नही थे । राम के चलाये हुए असंख्य शरो के
प्रहार से राक्षसो की कमरें टूट गईं, जांघें कट गईं, शरीर के खंड-खंड हो गये, वक्ष-
स्थल विदीर्ण हो गये, मुख विकृत हो गये, पैर कट गये, हाथ टूट गये, कंठ कट गये
और सिर फट गये । कवचों को पार करके बाणो के शरीर में चुभ जाने से रक्त की
नदियाँ बहने लगीं । राम के बाणो के प्रहार से कुछ राक्षस मरते थे, कुछ भयभीत होते थे,
कुछ मूर्च्छित हो पृथ्वी पर गिर पड़ते थे, कुछ व्याकुल हो जाते थे तथा कुछ भय से
मुँह बाये खड़े रह जाते थे । गज, अश्व तथा रथ पर आरूढ़ राक्षस संभ्रमित रह जाते थे ।
त्रस्त राक्षस चिल्लाने लगे—'वह देखो, राघव बाण चला रहे है । लो, वे हमारे
निकट पहुँच ही गये ।' ऐसा आर्तनाद करते हुए वे बड़े वेग से युद्ध-क्षेत्र से भागने लगे ।
इतने में राघव ने अत्यधिक रोष से उन पर सम्मोहन-अस्त्र चलाया । उस अस्त्र के
लगने से राक्षस अपने-आपको भूल-से गये और यह न जानकर कि कौन राक्षस है, और
कौन वानर, एक राक्षस दूसरे राक्षस पर ही आक्रमण करने लगा । उस गांधर्व शर का
ऐसा प्रभाव था कि किसी-किसी राक्षस को एक ही राम दीखता था, किसी को एक राम
के स्थान में दस राम दीखते थे, किसी को सौ राम दीखते थे, किसी को सहस्र राम दीखते थे,
किसी को एक लाख राम दीखते थे, किसी को करोड़ राम दीखते थे, किसी को सौ
करोड़ राम दीखते थे; इस प्रकार उनको सारा युद्ध-क्षेत्र ही राममय दीखने लगा । अविराम
बाण चलाते रहने से राम का स्वर्ण-धनुष वृत्ताकार में दीखने लगा । उसे देखकर राक्षस