रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 427, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंकी आवश्यकता ही क्या थी ?' अंगद, सुग्रीव, हनुमान् तथा युद्ध-भूमि में रहनेवाले सभी
वानर-नेता राम-लक्ष्मण के निकट पहुँचकर आश्चर्य प्रकट करने लगे । उस समय परम
पावन, पवन-पुत्र ने आकाश-मार्ग से आनेवाली उस रमणी को देखकर रामचन्द्र से कहा--
'हे देव, यह मानिनी, देवकांता नहीं है और राम की पत्नी भी नहीं है । यह कोई पति-
हीना स्त्री है, उसका प्रत्यक्ष प्रमाण भी है । वहाँ उस रमणी के रथ पर देखिए, भस्म से
आवृत अग्नि दिखाई दे रही है ।'
११२. सुलोचना का राम की स्तुति करना
इतने में वह रमणी शीघ्रगति से उस स्थान पर पहुँचकर रथ से उतर आई ।
क्षीण कटि से विलसित वह रमणी ऐसी दीखती थी, मानो स्वर्ण-प्रतिमा हो या नवजात
मोती हो, अथवा नव-यौवना राजहंसिनी हो । वह अपनी आँखो से अश्रु बहाती हुई,
चकराती हुई, चीत्कार करती हुई, मद-गति से राघव के सम्मुख पहुँच गई और उन्हें साष्टांग
दण्ड-प्रणाम करके, हाथ जोड़कर कहने लगी--'हे रवि-कुलावुधि सोम, हे रामाभिराम, हे
विमल गुणधाम, हे शत्रुविनाशी, हे मेघश्याम, हे कमलनेत्र, हे विमल चरित्रवान्, हे हिमगिरि-
सम धीर, हे ललित-मधुर-वचन-कुशल, हे लावण्य-निधि, हे जन-नायक, आपके चरणो की सेवा
से मेरे सभी पाप दूर हो गये ।'
इस प्रकार, राम के समक्ष स्तुति करती हुई, विनय के साथ वह खड़ी हुई । तब
राम की आज्ञा से सूर्यपुत्र ने कहा--'हे सुंदरी, तुम कौन हो ? तुम्हारे यहाँ आने का क्या
कारण है ? तुम्हारा नाम क्या है ? तुम्हारे पति कौन हैं ? तुम किसकी पुत्री हो ? तुम
अपना वृत्तांत सुनाओ ।' तब वह आँसू बहाती हुई कहने लगी--'हे भानु-पुत्र, मेरे पिता
आदिशेष हैं, मेरा नाम सुलोचना है, मेरे पति वह पुण्यवान्, बहुभोग-भाग्य-सपन्न, बाहुबली,
महा तेजस्वी, युद्ध में भयंकर, इन्द्र-विजयी, महान् शूर, दशकंठ तथा मदोदरी के पुत्र
मेघनाद हैं ।'
इतना कहने के पश्चात् उस रमणी ने राम को देखकर शोकाभिभूत होकर कहा--
'हे राघवेन्द्र, आपने युद्ध-भूमि में ऐसे महान् शूर का वध किया है । कृपालु होते हुए भी
आपने कैसे उनका संहार किया ? हे सूर्यकुलतिलक, ऐसा महान् विक्रमी अब आगे कहीं
जन्म लेगा ? आप जानते ही हैं कि पति की वियोगाग्नि से सती स्त्री अत्यधिक परितप्त
होती है । मैं अपने पति को खोकर वैधव्य-दुख का कैसे सहन कर सकूँगी ? हे शरणार्थी-
त्राण, हे दयामय, हे परिपूर्णहृदय, हे शुभ-गुण-संपन्न, मैं आपकी शरण में आई हूँ ।
शरणागत की रक्षा करने की आपकी टेक है । मेरे पति को प्राण-दान देकर आप अपने
प्रण की रक्षा कीजिए । पति-भिक्षा देकर मुझे जीवन प्रदान कीजिए ।'
सुलोचना की कातर प्रार्थना सुनकर, दया-मूर्ति राम का हृदय पिघल गया और
वे उस रमणी के पति को पुनर्जीवित करने की वात सोचने लगे । यह समझकर हनुमान् ने
राम से निवेदन किया-'हे राघव, आप तो सर्वज्ञ हैं । उस ब्रह्मा का वचन टाल देना
आपको उचित नहीं है । हे राजन्, आपको ब्रह्मा की मर्यादा रखनी चाहिए।' तब राघव ने
पवन-पुत्र की बातो पर विचार करके कहा--'हे कमलाक्षी, तुम अगले जन्म में अपने