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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 435, कुल 508 में से

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पृष्ठ 435

युद्धकांड ४०५
करुणापूर्ण दृष्टि से देखकर कहा---'देवो की रक्षा करने तथा समस्त राक्षसो का वध
करने के लिए पृथ्वी पर इदिरा का जन्म होगा । उस सती के पति बनकर विपत्तियो से
प्रजा की सतत रक्षा करने तथा दुर्जन राक्षसो का सहार करने के लिए विष्णु स्वय पृथ्वी
पर अवतार लेंगे । राम ही वह विष्णु हैं और भूमि-सुता ही वह इदिरा है ।' शिव का
वचन कभी नही टलेगा । अत, समझ लो कि हमें अब अघट दुख प्राप्त होनेवाला है ।
अब हमारा रक्षक कौन है ? हमारा रावण अब बचेगा नही। अब हमारे सतप्त होने से कोई
प्रयोजन नही है । हमारे एकमात्र त्राता विभीषण भी रामचन्द्र की शरण में गये
हुए है ।''
११७ रावण का द्वितीय युद्ध
इस प्रकार, विविध रीतियो से असुर-स्त्रियो के दीन विलाप सुनकर रावण थोडी
देर तक चिंता की अग्नि में परितप्त होते हुए मौन हो रहा । फिर, प्रचण्ड काल-नाग के
फुफकार की भाँति दीर्घ निःश्वास छोडकर ओठ चबाते तथा आँखो से अग्नि-कणो की वर्षा
करते हुए अत्यत क्रोध से युद्धोन्मत्त तथा विरूपाक्ष नामक राक्षसो को देखकर बोला--
'तुम शीघ्र तुरहियो की भयंकर ध्वनि करते हुए सिंह-गर्जनो के साथ युद्ध के लिए निकल
पडो ।' उसकी बातें सुनकर भी भयाक्रान्त निशाचरो को मौन देखकर, उसने
फिर कहा—'शीघ्र ही युद्ध की तैयारी करो । इस प्रकार हतोत्साह हो क्यो बैठे हो ?'
तब उन्होने जाकर पुण्याह कर्म आदि करने के पश्चात् युद्ध की तैयारी की और राक्षसेन्द्र
के समक्ष आकर उस बात की सूचना दी । तब रावण ने उनको देखकर कहा—'दिन-दिन
मेरी सेना घटती जा रही है।' मेरे सभी अनुचर मारे जा चुके । अमरेन्द्र के समान
पराक्रमी खर, अमित बलशाली इन्द्रजीत, कुभकर्ण, प्रहस्त, कुभ-निकुंभ, भयंकर पराक्रमी अति-
काय, महाकाय, महोदर, असुरांतक, नरातक, यशस्वी अकपन, कपन आदि महान् योद्धा,
जो युद्ध में इंद्र का भी सामना कर सकते थे, मेरे निमित्त प्राण खो बैठे । मेरा दर्प चूर-
चूर हो गया । इसलिए, मे अपने सभी शत्रुओ का नाश करूँगा और अपने पराक्रम का
प्रदर्शन करके उनसे प्रतिशोध लूँगा । मेरे शर समस्त आकाश तथा समुद्र को ढक लेंगे ।
में आज सभी वानरो का सहार करूँगा । मेरे चलाये बाण मृणालयुक्त कमलो की भाँति
वानरो के कठ-नाल-युक्त मुख-कमलो को काटेंगे और मैं उनसे युद्ध-भूमि का अलकार करूँगा ।
आज लका नगर की स्त्रियाँ यह सोचकर कि हमारे पति, पुत्र और सहोदर युद्ध में कटकर
मरे पडे हैं, अब हमारी रक्षा कौन करेगा । वे शोक-सागर में डूबी हुई है । मै शत्रुओ का वध
करके उनका शोक दूर करूँगा । मै शत्रु-पक्ष की सेनाओ को अपने पैने बाणो से काटकर
उनके रक्त-मास से, सियारो, गीधो उकाबों, पिशाचो, प्रेतो एव भूतो को तृप्त करूँगा ।'
इसके पश्चात् उसने युद्धोन्मत्त, मदमत्त एव अक्षीण बलवान् विरूपाक्ष को देखकर
कहा—'तुरत तुम सभी राक्षसो को युद्ध-भूमि में ले आओ । मेरे लिए रथ सजाकर भेजो।
आज मेरे तीक्ष्ण बाण, प्रतापी राम-लक्ष्मण के प्राण लेकर उनके रक्त का पान करना चाहते है।
में वानर-सेना पर बाण ऐसे चलाऊँगा कि एक-एक बाण मे सैकड़ो वानर मारे
जायेंगे । तुम बलवान् राक्षसो को चुन-चुनकर सेना का सगठन करके शीघ्र लाओ ।'