रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 434, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें४०४ रंगनाथ रामायण
अपितु राक्षस-वंश का भी सर्वनाश करने के लिए उस राम की पत्नी को ले आया ।
इतना करने पर भी क्या, सीता उसे मिल गई ? ऐसा दुस्साहस उसने किया ही क्यो ?
राम ने तो एक ही बाण से मारीच का वध कर डाला तथा दण्डक-वन में विराध पर क्रुद्ध
होकर उसका संहार किया । इन बातो को जानकर भी मदान्ध हो रावण ने उनको नहीं
पहचाना । जनस्थान में राम ने अपने अनल के समान शरों से चौदह सहस्र राक्षसो का संहार
किया और अपने भयंकर बाणो से, त्रिशिर, दूषण तथा खर को सहज ही मार डाला ।
दशकंठ ने उसका भी विचार नही किया । क्रौंचवन में दाशरथियो ने अपने अनुपम शौर्य से
रुधिराशन को, क्रूर विक्रम को तथा योजनबाहु कबंध को मार डाला । ऐसे विक्रमी राक्षसो
के (वध का) वृत्तांत जानकर भी रावण ने राम पर विजय प्राप्त करने की ठानी । क्या,
यह उसके लिए संभव है ? क्या हमारे रावण में इतना साहस है, कि वह जगदीश्वर
राम से युद्ध कर सके ? राम ने तो एक ही बाण से सहज ही वालि का वध करके सूर्य-
पुत्र को किष्किन्धा का राजा बना दिया । सहस्रो हाथी, लाखो अश्व, करोडो रथ और
असंख्य पदचर सेना को राम ने एक क्षण-मात्र में ही युद्ध में मार डाला । उन्होंने अकेले
महान् पराक्रमी कुंभकर्ण का संहार किया । ऐसी वीरता देखकर भी रावण राम की शक्ति
पहचान नहीं सका । महाशूर अतिकाय तथा इन्द्रजीत को अकेले लक्ष्मण ने युद्ध में समाप्त
कर दिया । इतना सब होने के उपरान्त भी रावण राम की शरण में नही जाना चाहता ।
आज लंका के घर-घर में विलाप सुनाई पड़ रहा है । सभी लोग 'युद्ध में हमारे बंधु
मरे, हमारे पुत्र मरे, हमारे पति मरे, हमारे सहोदर मरे', इस प्रकार का आर्तनाद करते
हुए शोक-समुद्र में डूब रहे है । जिस दिन से दुर्मति तथा नीति-बाह्य हो रावण अपनी
माया से सीता को इस नगर में ले आया, उसी दिन से दुःशकुन दिखाई पड़ रहे हैं ।
अब शीघ्र ही दशरथ के पुत्र के हाथो में दशकंठ का अंत होना निश्चित ही है । हाय,
नीतिज्ञ विभीषण ने विविध रीतियो से इसको धर्म-मार्ग समझाया था । यदि यह उनके
हित वचनो का आदर करता, तो क्या लंका की ऐसी दुर्दशा होती ? या तो कुल-पर्वतो
के पंखो को अपने वज्राघात से काटनेवाले पुरंदर ने या मधु-कैटभ आदि राक्षसो का
संहार करनेवाले विष्णु ने या क्रूर यम ने या प्रलय-काल के रुद्र ने इस पृथ्वी पर राम के
रूप में जन्म लिया है और राक्षसो का वध करने लगा हैं । जिस समय दशरथ-पुत्र राम,
अपने शौर्य का प्रदर्शन करते हुए, युद्ध में दशकंठ का वध करने लगेंगे, उस समय, क्या,
महान् देवता या गंधर्व या मुनि या रावण को वर प्रदान करनेवाले ब्रह्मा या शिव
या राक्षस उन्हें राम के हाथों से बचा सकेंगे ? वर देते समय ब्रह्मा ने यह वर नहीं
दिया था कि यह नर के हाथो से नही मरेगा । इसलिए यह स्पष्ट हो रहा है कि दशकंधर
अपने बंधुओ के साथ राम के हाथो से मरेगा । यह सत्य है; क्योकि जब इस रावण ने
इन्द्र आदि देवताओ को बड़ी क्रूरता से दुःख पहुँचाया, तब समस्त देवताओ ने ब्रह्मा से
अभय-दान की प्रार्थना की । तब चतुर्मुख ने उन्हें देखकर कहा था—'भविष्य में तुम्हें किसी
प्रकार का दुःख नहीं होगा । अब तुम निश्चिंत रहो ।' इसके पश्चात् ब्रह्मा देवताओ को
साथ लेकर महादेव के पास गये और उनसे प्रार्थना की । तब प्रसन्न होकर शिव ने ब्रह्मा को