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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 430, कुल 508 में से

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पृष्ठ 430

४०० रंगनाथ रामायण
११४. रावण का अपनी प्रधान सेना को युद्ध के लिए भेजनी
रावण अत्यधिक क्रोध तथा शोक से जलते हुए, बार-बार उमडनेवाले पुत्र-शोक
में घुलते हुए अपने सभा-मडप में पहुँचा। क्रोधोद्दीप्त सिंह की भाँति उष्ण नि श्वासो को
छोडते हुए, बल, साहस तथा युद्ध-कुशलता से सपन्न अपने सैनिको को देखकर उसने आदेश
दिया कि तुम शीघ्र जाकर वानरो तथा राम-लक्ष्मण को जीतकर आओ ।
रावण का आदेश शिरोधार्य करके राक्षस-सैनिको ने बडे उत्साह के साथ, रथ, गज,
तुरग, पदाति आदि चतुरगिणी सेना के साथ युद्ध के लिए आवश्यक शस्त्रास्त्रो का सगठन
किया । फिर, वे वज्र-कवच तथा वज्र-सम आयुधो से सज्जित हो भीषण गति से चल पडे ।
उस समय उनके गज-समूह के चिघाडो तथा घटिकाओ एव अश्वो की हिनहिनाहटो का भीषण
रव, दुदुभि, शख, पटह, डमरू, पणव आदि वाद्यो का तुमुल नाद, सेना का कलकल,
ध्वजाओ की फडफडाहट, रथ के पहियो की गडगडाहट तथा धनुष का टकार आदि विविध
ध्वनियो से मथित समुद्र की भाँति दिशाएँ गूँजने लगी । सेना के चलने से अत्यधिक धूलि
ऐसे उडने लगी, मानो वह समुद्र से युद्ध करने जा रही हो। सभी राक्षस ऐसे गर्जन करने
लगे कि उनके गर्जनो की ध्वनि आकाश का स्पर्श करने लगी और सारी पृथ्वी काँपने लगी । वे अपनी
गर्वोक्तियो, धमकियो, हुकारो तथा चिल्लाहटो की ध्वनियो के साथ, अपने मणिमय कुडलो,
हारो, ककणो तथा किरीटो की दीप्ति को विकीर्ण करते हुए लका से बाहर निकले, मानो
महान् शक्ति-सपन्न कपि-समुद्र को देखकर, बडे उत्साह से लका-समुद्र से निकलनेवाला
वडवाग्नि का समूह हो ।
तब कपि-वीरो ने बडे उत्साह से गर्जन करते हुए, अपने पदाघातो से दिग्गजो को
बैठ जाने के लिए विवश करते हुए, आकाश की ओर उछलते हुए तथा ताल ठोककर
ब्रह्माण्ड को भी विदीर्ण करते हुए, काजल के पर्वतो के समान दीखनेवाले राक्षसो को
देखकर करोडो वृक्षो, पर्वतो तथा वडी-बडी शिलाओ को लिये हुए, उन पर आक्रमण
किया । इतने में उदयाद्रि पर सूर्य भगवान् चढ आये, मानो वे रघुराम की धनुर्विद्या की
निपुणता देखने की उत्कट अभिलाषा लिये हुए आये हो । राक्षस तथा वानर-सेनाएँ ऐसी
भयकर रीति से परस्पर भिड गई, मानो एक समुद्र दूसरे समुद्र से भिड गया हो । कपियो
की विशाल सेना को देखकर राक्षस अपने रथ, गज तथा अश्वो को उनकी ओर बढाते
हुए वानरो पर टूट पडे और उन्हें अनेक रीतियो से दुख पहुँचाने लगे । किन्तु, वानरो ने
अत्यत साहस के साथ पर्वतो को उठाकर उन पर फेंका । उनके प्रहार से कई राक्षस-
सैनिक गिर पडे । राक्षस, करवालो से वानरो की पूँछो को काट डालते थे, तो वानर
अपने बाहु-दण्डो से राक्षसो के गदा-दण्डो को तोड देते थे । राक्षस, वानरो पर परशुओ,
परिघो तथा खड्गो को फेंकते थे, तो वानर पर्वतो, वृक्षो तथा पर्वत-शृगो को फेंककर उन्हें
नष्ट कर देते थे । युद्ध-भूमि में रक्त की धाराएँ बहने लगी । वानर अपनी पूँछो से
पर्वतो को उठाकर फेंकते थे, तो राक्षस उनके नीचे चूर-चूर हो जाते थे और फिर चक्रो
तथा गदाओ से वानरो पर प्रहार करते थे । इस प्रकार, वे समान पराक्रम दिखाते हुए
परस्पर युद्ध करते थे । राक्षस जब गजो, अश्वो तथा रथो को कपियो पर चलाकर उन्हें