रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 433, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंमन-ही-मन सोचने लगे कि यह कदाचित् वही चक्र है, जिसे विष्णु ने भयंकर युद्ध करते
हुए, 'नमुचि' पर चलाया था, अथवा किरण-समूह से घिरा हुआ सूर्यबिम्ब है । यों सोचते
हुए, राम के शर-समूह के प्रहार का सहन न कर सकने के कारण वे प्राण लेकर भागने
लगे । उस समय राक्षस-सेना में क्षण-भर की रक्त-वर्षा में भीगे हुए, चौदह सहस्र अश्व, अठारह
सहस्र हाथी, एक लाख रथ, दो लाख वीर राक्षस नष्ट हुए । शर-रूपी अर, धनुष-रूपी
नेमि (पहिये का घेरा), टकार-रूपी रव, किरण-रूपी स्फुलिंगो से युक्त राम का धनुष-
रूपी चक्र काल-चक्र की भाँति विलसित होते देखकर हतशेष दैत्य अत्यन्त त्रस्त हो उस घोर
युद्ध-भूमि को छोड़कर भागे और लका में जा पहुँचे । यह देखकर वानर उत्साह से सिंह-
नाद करने लगे । प्रलय-काल के यम की भयंकर नाश-लीला की भाँति उस समय का युद्ध-
क्षेत्र दीखने लगा । जब रघुवीर रावण की प्रधान सेना के दस सहस्र हाथी, बीस सहस्र
अश्व, एक सौ रथ तथा एक पद्म सेना का सहार कर देते थे, तब एक धड़ उठकर नाचने
लगता था, ऐसे करोड़ धड़ जब नाचते थे, तब एक कटा हुआ सिर आकाग की ओर
उछलकर एक भयंकर चीत्कार करता था, ऐसे एक करोड़ सिर जब उछलते थे, तब राम
के धनुष की एक घंटी बजती थी । इस भयंकर युद्ध में राम के धनुष में लगी हुई ऐसी
चौदह घंटियाँ अविराम बजती रही । रघुवीर की ऐसी धनुर्विद्या का कल्पनातीत कौशल
लगातार सत्रह घडियो तक चलते देखकर किन्नर, गंधर्व, खेचर, यक्ष, उरग तथा अमर
उनकी स्तुति करने लगे ।
उसके उपरान्त, रामचंद्र ने शूर-पुंगव सुग्रीव को देखकर कहा—'यह सम्मोहनास्त्र
जगद्भयंकर है । इसका प्रयोग करने तथा इसका उपसहार करने की शक्ति या तो मुझ में है,
या ईश्वर में, अन्यो में ऐसी क्षमता नहीं है । कौशिक ने जिस महान् शस्त्र को
मुझे प्रदान किया था, उसकी महिमा से स्वयं कौशिक भी अनभिज्ञ थे ।' तब विभीषण ने
राम को देखकर विनय तथा संभ्रम से कहा—'हे देव, रावण की यह सेना देवेन्द्र आदि
देवताओ के लिए भी अजेय थी । यही रावण की मूल-सेना थी, आज यह भी मिट्टी में
मिल गई । अब रावण का अंत निश्चित है । आप तो स्वयं अपने महत्त्व का ज्ञान नहीं
रखते । सच तो यह है कि कोई भी आपकी समानता नहीं कर सकता ।' विभीषण के
वचन सुनकर रामचंद्र प्रसन्न हुए ।
११६. राक्षस-स्त्रियों का रावण की निन्दा करना
लंका में दानव-स्त्रियो ने झुंडो में एकत्र होकर उमड़ते हुए शोक से पीड़ित
होती हुई कहने लगी—'हाय, कैसा दुर्भाग्य है कि निंदनीय चरित्र, भाग्यहीन मुखडा, पलित
केशो से युक्त सिर, विशाल उदर, विकृत वेश, विकृत यौवन, उग्र केश तथा उग्र दंष्ट्र-
वाली शूर्पणखा सकल गुणोज्ज्वल, सत्त्व-सपन्न, सुकुमार, तेजस्वी, सुमुख तथा कामदेव के समान
सुंदर रामचंद्र पर आसक्त हुई । कहाँ राजा भोज, और कहाँ गंगू तेली । इस लंका के
सभी राक्षसो पर मृत्यु की छाया पड़ी हुई थी, इसी कारण में उम राक्षसी ने दशकंठ तथा
उस सूर्यवशज में शत्रुता उत्पन्न कर दी । उस शूर्पणखा की वातें सुनकर उचित तथा
अनुचित का विचार किये बिना, शत्रुत्व ठानकर, दशकंठ अपना ही नाश कराने के लिए नहीं,