रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
३७२ रंगनाथ रामायण
सभी वानर-सैनिक राम के पास भागे और उन्हें सारा वृत्तांत कह सुनाया । राम ने
जांबवान् आदि श्रेष्ठ वानर-वीरों को कुंभ के साथ युद्ध करने के लिए भेजा । वे वृक्षों
तथा शिलाओं को फेंकते हुए राक्षस-सेना को भगाने लगे । तब कुंभ ने अनेक पैने शरों
को चलाकर वानर-वीरों के आक्रमण को रोका और अपनी सेना को आश्वस्त किया ।
कपि-वीरों तथा अंगद को युद्ध-भूमि में मूर्च्छित गिरे देखकर सुग्रीव क्रोधोन्मत्त होकर असंख्य
विशाल पर्वत तथा अश्व-कर्ण वृक्षों को उखाड़कर उनसे दानवों पर प्रहार करने लगा ।
किन्तु, देखते-ही-देखते कुंभ ने उन सब को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया और रवि-पुत्र पर कई
बाण चलाकर उसे अत्यधिक पीड़ा पहुँचाई । फिर भी, विचलित न होकर सुग्रीव ने उस
राक्षस के धनुष को छीनकर उसे खंड-खंड कर दिया । दाँत तोड़ने से जैसे हाथी क्रोध से
अपने शत्रु पर झपटता है, वैसे ही कुंभ क्रोधावेश से सुग्रीव को मार डालने का निश्चय
करके, उसकी ओर लपककर उससे जूझ गया । उस समय वे दोनों ऐसे लगते थे, मानो
दो हाथी आपस में भिड़कर लड़ रहे हों । इस प्रकार, दोनों उद्धत हो, अपनी श्रेष्ठ भुज-
शक्ति को प्रदर्शित करते हुए, अपने चरण-ताड़नों से पृथ्वी को कँपाते हुए धुएँ के समान
लंबी साँस छोड़ते हुए, परस्पर ऐसे टकराते थे कि उनके आघातों से सारा आकाश विदीर्ण
हो जाता था ।
९४. सुग्रीव के द्वारा कुंभ का वध
निदान, सुग्रीव ने उस कुंभ को उठाकर चारों ओर वेग से घुमाया और उसे समुद्र
में फेंक दिया, तो सभी देवता हर्ष की ध्वनि करने लगे । वह राक्षस समुद्र में ऐसे जा गिरा,
मानो मंदराचल ही समुद्र-तल में गिर गया हो । किन्तु, वह राक्षस फिर अत्यधिक वेग से
सूर्य-पुत्र के समक्ष पहुँच गया और अत्यंत क्रोध से सुग्रीव के वक्षस्थल पर अपनी-
मुष्टि से ऐसा प्रहार किया कि उसका प्रभाव सुग्रीव की हड्डियों पर भी पड़ा और अग्नि-
कण ऐसे छितरा गये, जैसे वज्रपात होने से कनकाद्रि से अग्नि-कण निकलते हों । इससे
क्रोधाग्नि से जलते हुए सूर्य-पुत्र ने उस नीच राक्षस के वक्षःस्थल को लक्ष्य करके अपनी
मुष्टि से ऐसा तुला हुआ प्रहार किया कि राक्षस अपनी शक्ति खोकर पृथ्वी पर लुढ़ककर
मर गया । शांत अग्नि के समान, प्रताप से हीन हो जब वह गिर गया, तब सभी राक्षस
भयभीत हो, ऐसे भागने लगे कि सारी पृथ्वी हिल उठी और सभी समुद्र आलोड़ित
हो उठे ।
अपने अग्रज को इस प्रकार गिरते हुए देखकर निकुंभ की आँखों से अग्नि-कण निकलने
लगे । वह क्रोधावेश से सिंहनाद करके, कनक-रत्न-प्रभा से युक्त तथा सतत पुष्प-चंदन से अर्चित
अपने परिघ को ऐसे घुमाने लगा कि समस्त ब्रह्माण्ड टूटता हुआ-सा दीखने लगा, सभी
दिशाएँ चटकती-सी दिखाई पड़ने लगीं और वायु-पाश टूटते-से दीखने लगे । तब हनुमान्
सुग्रीव की सहायता के लिए आ पहुँचा और गर्जन करते हुए स्वयं उस राक्षस का सामना
किया । तब राक्षस ने क्रोधोन्मत्त हो अपना परिघ मारुति के वक्ष स्थल पर चलाया । उस
प्रहार से चारों ओर अग्नि-कण छिटक पड़े और परिघ आश्चर्यजनक ढंग से चूर-चूर
होकर हनुमान् के वक्ष की कठोरता को प्रकट करने लगा । उस आघात के कारण
हनुमान् स्वयं ऐसा हिल गया, जैसे प्रचंड वायु के कारण कोई विशाल वृक्ष डोलने लगता है ।
फिर भी, अत्यंत धैर्य के साथ हनुमान् ने निकुंभ के वक्ष पर अपनी मुष्टि का ऐसा
प्रबल प्रहार किया कि उसका वक्ष विदीर्ण हो गया और रक्त की धारा फूट निकली ।
निकुंभ भी प्रचण्ड वायु-वेग से आहत वृक्ष की भाँति काँप गया और शीघ्र ही सँभलकर
उद्धत गति से हनुमान् को ऊपर उठा लिया । यह देखकर सभी दानव हर्ष की ऐसी ध्वनि
करने लगे कि सारा आकाश काँप उठा । किन्तु, कपि-पुंगव हनुमान् ने अपने-आपको शीघ्र ही
उसके हाथों से छुड़ा लिया और युद्ध-भूमि पर कूद गया । उसने अपनी मुष्टि से
निकुंभ पर प्रबल प्रहार किया और उसे उठाकर पृथ्वी पर ऐसे पटका कि उसकी हड्डियाँ
चूर-चूर हो गईं । फिर, उसने उस राक्षस की छाती पर चढ़कर उसका सिर काट डाला
और ऐसा भयंकर गर्जन किया कि सभी दिशाएँ हिल उठीं और पृथ्वी, आकाश, समुद्र एवं
सारा दिङ्मण्डल उस ध्वनि से गूँजने लगा ।
हतशेष राक्षस शीघ्र लंका में रावण के निकट पहुँच गये और कुंभ-निकुंभ आदि छह
शक्तिशाली वीरों की मृत्यु का समाचार कह सुनाया । तब रावण ने अत्यंत क्रुद्ध होकर
खर के योग्य पुत्र मकराक्ष को बुलाकर कहा--'तुम अपनी विशाल सेना को साथ लेकर
अपने शौर्य का प्रदर्शन करते हुए राम-लक्ष्मण तथा उन वानरों का संहार करके आओ ।'
९५ मकराक्ष का युद्ध
रावण का आदेश पाकर मकराक्ष अत्यधिक उत्साह से भर गया कि मुझे अपने
पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने का अवसर मिल गया । हर्ष से उसकी छाती फूल गई ।
उसने रावण को प्रणाम किया और उसकी आज्ञा लेकर रथ पर आरूढ़ होकर चल पड़ा ।
उसने रणोत्साह से फूलते हुए अपने निकट उपस्थित वीरों को देखकर कहा--'तुम उग्र
रूप से कपियों से युद्ध करो । मैं अपने भीषण शरों की अग्नि से राम-लक्ष्मण को तथा
वानरों को छिन्न-भिन्न करके उनका नाश करूँगा ।'
उसके आदेश को स्वीकार करके सभी दानव उसके पीछे-पीछे चलने लगे । चलते
समय उन्हें कई दुःशकुन दिखाई पड़े । किन्तु, उन सबकी उपेक्षा करके तुरही-नाद तथा
सिंहनाद करते हुए राक्षस-सेना कपि-सेना पर ऐसे टूट पड़ी कि पृथ्वी तथा आकाश
विचलित हो गये । वानरों ने दैत्यों पर पर्वतों तथा वृक्षों की वर्षा की, तो दानवों ने गदा,
दंड, कोदंड, खड्ग आदि महान् शस्त्रों की सहायता से उन सबको शीघ्र ही खंडित कर
दिया और अपने शस्त्रों के प्रहार से वानरों को व्याकुल करके सिंह-गर्जन किया । उस
समय मकराक्ष ने सभी वानरों पर अपना रथ वेग से चलाते हुए उन पर कभी तीस,
कभी सौ, कभी साठ, कभी पैंसठ, कभी बीस, कभी छब्बीस, कभी छह, कभी बारह, कभी
दो, कभी दस, कभी पन्द्रह, कभी अठारह, कभी तेरह, कभी चार, कभी चौदह, कभी तीन,
कभी पाँच, कभी सात और कभी नौ बाण चलाकर उन्हें पीड़ित कर दिया ।
उन अस्त्रों को सह न सकने के कारण सभी वानर इस वेग से भागने लगे कि
पृथ्वी भी काँप उठी । तब राम ने धनुष उठाकर वानरों को आश्वासन देते हुए कहा--
'भयभीत होकर भागो मत, मैं अभी आता हूँ', यों कहते हुए राम राक्षसों की चतुरंगिणी
३७८ रंगनाथ रामायण
सेना का सहार करने लगे । यह देखकर मकराक्ष क्रोध से दहाड़ते हुए अपना रथ राम के
पास ले गया और उनसे कहने लगा—'हे राघव, मै खर का पुत्र हूँ। तुमने पहले मेरे
पिता का वध किया है । इसी कारण मेरा हृदय इतने दिनों से जल रहा है । मैं सतत
तुम्हारे साथ युद्ध करने के अवसर की प्रतीक्षा में था । आज वह अवसर मुझे मिल गया ।
तुम यहाँ से हटो मत । अपने पिता के वध का प्रतिशोध लेने के लिए आज मैंने तुम्हें
प्राप्त किया है । तुम गदा, धनुष या खड्ग इन तीनों में से किसी को लेकर मेरे साथ
युद्ध कर सकते हो ।'
तब राघव ने क्रुद्ध होकर उससे कहा—'हे नीच दानव, व्यर्थ का गर्व क्यो करते हो ?
मै अपने भुज-बल का प्रदर्शन करके युद्ध में तुम्हारा वध करूँगा । इन बातो को
सुनकर मकराक्ष ने राम पर कई पैने बाण चलाये । किंतु, बीच में ही राम ने उन्हें काट
डाला । उन दोनो के कठोर धनुष के टकारो से समस्त ब्रह्माण्ड तथा दिशाएँ कपायमान
होने लगीं । मकराक्ष, राम के चलाये सभी अस्त्रो को शीघ्र ही काट डालने और उन पर
अनुपम बाणो का प्रहार करने लगा । किंतु, राघव ने उसके बाणो को काटकर विविध
भीषण शरो से उसे आहत करने की चेष्टा की । लेकिन, उस राक्षस ने शीघ्र ही सब
अस्त्रो को खड-खड करके भयकर सिंहनाद किया । तब काकुत्स्थ-वंशज ने एक बाण से
उस राक्षस का धनुष काट डाला । आठ शरो से उसके सारथी का सहार किया और
उतने ही बाणो से उसके रथ को छिन्न-भिन्न कर दिया ।
रथ से रहित होकर मकराक्ष ने एक शूल राम पर चलाया । किंतु, राम ने तीन
बाणो से उसको चूर-चूर कर दिया । यह देखकर देवता राम की प्रशसा करने
लगे । वह राक्षस क्रोधोन्मत्त दाशरथि पर मुष्टि से प्रहार करने के लिए वेग से उनकी
ओर आने लगा । किंतु, राम ने इसी बीच उसके वक्ष पर अनलास्त्र का प्रहार किया, तो
मकराक्ष तुरंत पृथ्वी पर गिर पड़ा । उसी समय पश्चिम पर्वत पर कमल-बान्धव (सूर्य) अपनी
अरुण प्रभा से भाममान होने लगा । हतशेष राक्षस लका में भाग गये और रावण से
मकराक्ष की मृत्यु का समाचार कह सुनाया । तब क्रोध एव चिता से अभिभूत होकर रावण ने
इन्द्रजीत से कहा—'हे तात, युद्ध में कपियो तथा राम-लक्ष्मण को क्षणमात्र में मार
डालने की क्षमता रखनेवाला तुम्हारे सिवाय और कौन शूर रह गया है ? तुम शीघ्र
अपनी सेना के साथ जाओ और उन दोनो का सहार करके लौट आओ, जैसे तुम देवताओ
का सहार करके लौट आये थे ।'
९६. इन्द्रजीत का तृतीय युद्ध
तब इन्द्रजीत ने विनय से रावण को प्रणाम किया और उसकी आज्ञा लेकर युद्ध
के लिए चल पड़ा । वायुवेग से जानेवाले अश्वो से जुते हुए विशाल रथ पर आरूढ़
होकर शरत्काल के बादलो से आच्छादित शैल की भाँति वह श्वेत छत्रो की छाया में बैठे
हुए जाने लगा । उसके दोनो पाश्र्वो में सुन्दरीयाँ अपने रमणीय ककणो की मधुर ध्वनि
करती हुई चामर डुला रही थी । अपने मुख पर रणोत्साह की दीप्ति को लिये हुए उसने
अपनी माता को प्रणाम किया और माता से आशीर्वाद प्राप्त करके पत्नी तथा पुत्रो से
युद्धकाण्ड ३७५
विदा लेकर अपने भाइयो की मृत्यु का स्मरण करके, अत्यत क्रुद्ध हो, बडे दर्प के साथ
वह आगे बढा । उसके पीछे असख्य दानव-सेना तथा काम-रूप मत्री उसकी सेवा करते
हुए चले । उसी समय साठ करोड, चार दाँतवाले विशालकाय गज तथा भेरुण्ड पक्षी
के समान बृहदाकार, तोते के रगवाले चार करोड घोडे उत्तर द्वार मे निकले । ऐसी
घोर युद्ध-सज्जा से युक्त हो इद्रजीत निसानो की भयावह ध्वनि के वीच लकापुर से निकला
और वानर-वीरो के दुर्वार गर्जनो की ध्वनि से गुजायमान होनेवाली युद्ध-भूमि में जा पहुँचा ।
९७. इन्द्रजीत का होम करना तथा कृत्ति नामक शक्ति प्राप्त करना
युद्ध-भूमि में पहुँचकर इन्द्रजीत रथ से उतरा और चारो ओर दैत्यो को खडा
किया । एक त्रिकोणाकार वेदी बनाई और दक्षिण दिशा से श्मशान की सिद्ध-अग्नि ले
आकर उसे वेदी पर प्रतिष्ठित किया । उसके पश्चात् उसने बडी भक्ति से रक्त वर्ण के
वस्त्र, माला तथा चदन धारण किये, दण्ड, उपवीत तथा मौर्जी (मूंज की करधनी) धारण
की और सपूर्ण मन से खट्वाग का ध्वज स्थापित किया, महान् निष्ठा से कपाल पर आसीन
होकर ककाल की परिधि बनाई और दक्षिण दिशा में लोहे के स्रुक् तथा स्रुवा सजाये ।
फिर, उसने कृष्ण वर्ण के यज्ञ-पशुओ के रक्त तथा मास अग्नि-कुड में डालकर मौन
धारण किया । तत्पश्चात् अथर्ववेद की विधि के अनुसार अविराम मत्रोच्चारण करते हुए
स्रुक्-स्रुवाओ को अपने हाथ में लेकर उस प्रज्वलित अग्नि में विधिवत् ताड की
समिधाओ, तिल तथा सरसो का हवन किया और उस होम के धूम से समस्त ब्रह्माण्ड
को भर दिया । उस समय उस अग्नि-कुड से एक विशाल रथ निकला । फिर, भयकर
केश, भयावह रूप तथा कपाल, चमकनेवाली डाढें, अस्थि की मालाएँ तथा अग्नि-ज्वालाओ
को उगलनेवाली आँखो से युक्त हो, निरतर अट्टहास करती हुई दहाडनेवाली एक (कृत्ति) देवी
निकली । उस देवी ने कहा--'हे देव-वैरी, जो भी कार्य हो, मुझे सौपो। मै उसे सपन्न
करूँगी । उस देवी को पहचानकर, इन्द्रजीत अस्त्रो को तथा उसको लिये हुए, रथ पर
बैठे, आकाश में चला गया और वानरो पर आक्रमण करने के लिए छिपा रहा । उसकी
सारी सेना लका को लौट गई ।
इन्द्रजीत कपि-सेना पर घोर शर-वृष्टि करके उन्हें विवश कर दिया । शिलाओ
की वर्षा के कारण चारो ओर उडनेवाले पक्षियो की भाँति कुछ वानर तितर-वितर होकर
भाग गये । कुछ वानर अपना प्रताप खोये हुए रहे । कुछ घायल होकर लाल रग की
नदियो से युक्त पर्वतो के ढहने की भाँति रक्त-धाराएँ बहाते हुए पृथ्वी पर गिरने लगे ।
उस राक्षस-कुमार के वाणो के कारण चारो ओर अधकार व्याप्त हो गया । वानर-वीर
अतरिक्ष में छिपे हुए इद्रजीत को देख नही सकते थे । इसलिए, वे उन वाणो को रोकने
का कोई उपाय भी नहीं कर सकते थे । किन्तु, इन्द्रजीत अविराम गति से भूमि तथा
आकाश को अपने वाणो से भरने लगा । उन पैने वाणो से कुछ वानरों की कमरें कट
गई, कुछ चूर-चूर हो गये, कुछ खण्ड-खण्ड होकर मिट्टी में मिल गये । कुछ इद्रजीत के
वाण लगते ही, युद्ध करने के लिए लाये हुए वृक्षो को, पृथ्वी पर छोड़कर भूमि पर
लोट गये ।
३७६ रंगनाथ रामायण
कुछ लोगों के सिर पर बाण ऐसे लगने कि वे पृथ्वी से सट जाने और खड़े-ही-
खड़े मर जाते थे, कुछ समस्त अंगों में बाणों के लगने से, भूमि पर लोट जाते । कुछ
गजों के शवों की आड़ में छिप जाते और कुछ अपने हाथों में पर्वत उठाये हुए राक्षस के
बाणों को रोकते । कुछ वानर इन्द्रजीत के दृष्टिगोचर न होने से पुनः-पुनः आकाश की
ओर देखते हुए दाँत पीसते थे । अविरल अस्त्र के प्रवाह के ऊपर से गिरते रहने से कुछ
वानर उसमें अपने मुखों की रक्षा करने के लिए अपनी हथेलियों को सेतु के समान बनाकर
उसे रोकते थे । कुछ वानर अशनि-पिंडों की भाँति गिरनेवाले उन बाणों को शीघ्र ही
अपने हाथों से तोड़ डालते थे और कुछ पूँछों से उन पर प्रहार करके उन्हें तोड़ डालते थे,
कुछ वानर बाणों के आघात से रक्त में सन गये थे और कुछ बाणों के प्रहार के
बावजूद अचल खड़े रहते थे । कुछ वानर आँतों के बाहर निकलने से पृथ्वी पर लोटते हुए
और जँभाइयाँ लेते हुए अपनी आँखें बंद कर लेते थे, कुछ कहते थे कि अंत में हम
श्रीराम के लिए युद्ध में अपने प्राण दे पाये और कुछ ब्रह्मा को कोसते हुए कहते थे कि
यह दुर्जय है, आज इसको जीतना असंभव है । कुछ वानर कहते थे कि यह ब्रह्मा की दी
हुई शक्ति है, इसलिए यह ब्रह्माण्ड में कहीं भी दीख नहीं रहा है, किन्तु राम के आगे
ब्रह्मा का वर ही क्या है और स्वयं ब्रह्मा की ही क्या हस्ती है ? पता नहीं कि रामचन्द्रजी
अबतक क्रुद्ध क्यों नहीं हो रहे हैं ?
इस प्रकार, सभी वानर जितने मुँह उतनी बातें कर रहे थे । इन्द्रजीत अपने अनुपम
पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए एक स्थान पर धनुष का टंकार करता, तो दूसरे स्थान पर
शर-वृष्टि करता । एक स्थान पर अपना नाम कहता, तो दूसरे स्थान पर गर्जन करता,
एक स्थान पर डाँट बताता, तो दूसरे स्थान पर हँसता और कहीं हुंकार भरता । इस
प्रकार, जब वह भयंकर गति से विचरण करने लगा, तब श्रेष्ठ बलवान् हनुमान्, अंगद,
शरभ, ऋषभ, जाम्बवान्, गज, गवाक्ष, गवमादन, विजय, नील, सुषेण, पनस आदि योद्धा
शीघ्र ही पर्वतों तथा वृक्षों को उठा-उठाकर समस्त आकाश में फेंकने लगे, किन्तु वे इन्द्र-
जीत के चलाये हुए बाणों से टकराकर खण्ड-खण्ड हो गये और वायु-वेग से तथा भयंकर
ध्वनि के साथ, जहाँ-तहाँ पृथ्वी पर गिर गये और उनकी चोट से कई वानर मृत्यु को
प्राप्त हो गये । फिर, मेघनाद अत्यंत क्रूरता से बाणों की अविराम वर्षा करने लगा, तो
कुछ वानर खंडित होकर गिर पड़े और कुछ भयभीत होकर चारों दिशाओं में जाकर छिप गये ।
इस प्रकार, इन्द्रजीत ने बाणों के प्रहार से दस करोड़ वानर-वीरों को मिट्टी में
मिला दिया । उसके पश्चात् भी उसका सामना करनेवाले कितने ही वानरों को अपने
प्रचण्ड बाणों के प्रहार से खंड-खंड कर दिया । महान् पराक्रमी हनुमान्, अंगद, शतबली
गवाक्ष, नील, नल, पनस, कुमुद, गवमादन तथा ऋक्ष एवं असंख्य वानरनायकों को अपने उग्र बाणों
से निश्चेष्ट कर दिया और ऐसा सिंहनाद किया कि देवताओं के हृदय भी दहल उठे ।
९८. राम का आग्नेय अस्त्र से इन्द्रजीत की माया को दूर करना
इन्द्रजीत के दुर्वार विक्रम से मन-ही-मन भयभीत हो, गर्व त्यागकर कपि-सैनिक
लक्ष्मण के पीछे आ आकर शरण लेने लगे । तब सौमित्र ने रामचंद्र को देखकर कहा-
युद्धकांड ३७७
'हे देव, अपनी माया के कारण गर्वांध होकर यह इस प्रकार कपि-सेना का सहार करने
पर तुला हुआ है। हमें अब शीघ्र इसका वध कर डालना चाहिए।' तब राम ने अनुज को
देखकर कहा--'हे लक्ष्मण, ब्रह्मा के वर के प्रभाव से यह आकाश में दूसरो की दृष्टि में
आये विना गर्व से बहुत फूल रहा है। हम कितना भी क्रुद्ध होकर युद्ध करें, यह हमारे
वश में नही आ सकेगा। आज यह हमारे लिए असाध्य है। इसके ऊपर कोई भी अस्त्र
सफल सिद्ध नही होगा, केवल हमारे अस्त्र व्यर्थ जायेंगे।' उसी समय अग्निदेव ने आकर
मृदु वचनो में कहा--'हे नर-नाथ, इसकी माया को देखकर आप भयभीत मत होइए।
यदि आप आग्नेय मत्र को जपकर बाण चलावें, तो उस देवी की शक्ति नष्ट हो जायगी
और वह उस राक्षस को छोडकर चली जायगी।'
इतना कहकर जब अग्निदेव चले गये, तब राम ने विधिवत् अग्नि-मन्त्र का
जप करके बाण चलाया। तुरत वह माया-मूर्त्ति अद्भुत रीति से इन्द्रजीत को छोडकर कही
चली गई। तब इन्द्रजीत पृथ्वी पर उतर आया और धनुष का भीषण टकार करने लगा।
इतने में सभी वानरनायक मूर्च्छा से मुक्त हो शीघ्र एकत्र हुए और इन्द्रजीत से भिड गये ।
हनुमान् ने शैल-शृग से, अगद तथा मैन्द ने विशाल पर्वतो से, गज ने बडे पर्वत से, नील ने
एक विशाल वृक्ष से, नल ने अश्वकर्ण नामक वृक्ष से, सूर्य-पुत्र ने एक विशाल वृक्ष से,
पनस ने असख्य शाखाओवाले वृक्ष से, विभीषण ने भयकर गदा से, सपाति ने ताल-वृक्ष मे,
अन्य वानर तथा जाबवान् आदि वीरो ने असख्य वृक्षो तथा महाशैलो से इन्द्रजीत पर
प्रहार किया । लक्ष्मण ने तीन बाण चलाये और राघव ने एक सौ तीर चलाये । किन्तु,
उस राक्षस ने उन सब को अपने विविध शरो से चूर-चूर कर दिया और अपने घोर बाणो
की वृष्टि से वानरो को विफल कर दिया। उसने अठारह परुष तथा उग्र बाणो से गध-
मादन को, पाँच शरो से मैन्द को, सात तीरो से द्विविद को, सात बाणो से हनुमान् को,
सात ही बाणो से कुमुद को, नौ बाणो से अगद को, उतने ही शरो से नल को, पाँच
तीरो से नील को, सात बाणो से गवाक्ष को, पैसठ बाणो से सुग्रीव को, बीस बाणो से
पनस को, सात बाणो से दधिमुख को, सौ बाणो से राघव को, पचहत्तर बाणो से लक्ष्मण
को, तीन ही बाणो से शतवली को, तथा सौ बाणो से विभीषण को व्याकुल कर दिया
और अन्य वानर तथा ऋक्ष-वीरो को अपने शराघात से मरणासन्न कर दिया । तब हनु-
मान् ने पर्वत-शृग को, अगद ने बृहदाकार शिलाओ को, पनस तथा विभीषण ने विशाल
गदाओ को, सपाति ने उत्ताल ताल को, नल ने साल तथा अश्वकर्ण नामक वृक्षो को,
सूर्य-पुत्र ने पर्वत-पक्तियो को, शक्ति-विक्रम-सपन्न नील ने शक्ति को, अनल ने सप्तपर्ण को,
अन्य वानरो ने खदिर-वृक्षो को तथा शतवली ने वेर-वृक्ष को उस इन्द्रजीत पर फेंका ।
लक्ष्मण ने तीन उग्र बाण चलाये और राम ने एक सौ श्रेष्ठ शरो को चलाया । शरभ,
ऋषभ, जाबवान्, गवय, सुषेण, गवाक्ष, गज, द्विविद, मैन्द तथा अन्य अनुपम शूर वानरो ने
विशाल पर्वतो तथा वृक्षो को उस राक्षस-राजकुमार पर फेंका। किन्तु, इन्द्रजीत ने आश्चर्य-
जनक ढग से उन सबको अपने बाणो से चूर-चूर कर दिया और नूर्य-पुत्र के वक्ष पर
एक शूल ऐमा चलाया कि वह प्रचण्ड वायु के आघात से कपित होनेवाले वृक्ष की भाँति
४८
३७८ | रंगनाथ रामायण
काँप गया । तुरंत उसने ऋषभ, गवाक्ष, सुषेण, अंगद, जांबवान्, कुमुद, हनुमान्, गंधमादन,
नल आदि वीर वानरों को अपने अनुपम युद्ध-कौशल से विवश कर दिया । फिर,
उसने राघव पर विविध बाण चलाये और लक्ष्मण के धनुष को खंडित कर दिया और
विभीषण को बाणों के प्रहार से झकझोर दिया । तब उसने प्रलय-काल के बादल की भाँति
बार-बार गर्जन करते हुए राम से कहा—'हे रघुराम, देखा तुमने, मेरे क्रोध में आते ही
सुग्रीव आदि वानर-वीर कैसे गिर गये ? हे राजकुमार, तुम पर विश्वास करनेवाले इन
वानरों की धज्जियाँ उड़ गईं ।' इस प्रकार कहने के पश्चात् भी उस राक्षस ने अनेक
बाण उस कपि-सेना पर चलाये और तदनंतर 'मैं विजयी हुआ', यों चिल्लाते हुए लंका
को लौट गया और अपने पिता से अपने युद्ध-कौशल का वृत्तांत कह सुनाया ।
अपने पुत्र के पराक्रम का वृत्तांत सुनकर रावण अत्यंत हर्षित हुआ और उसे निकट
बुलाकर हृदय से लगा लिया और कहा—'हे वत्स, तुम्हारे जैसे पुत्र के रहने से ही तो मैं
शत्रुओं के द्वारा मारे गये अपने बंधु-बांधवों की मृत्यु का प्रतिशोध ले सका । आज मेरा
दुःख दूर हुआ । महान् वीर कुंभकर्ण मारा गया, महाबली प्रहस्त मृत्यु को प्राप्त हुआ,
अनुपम वीर त्रिशिर का अंत हुआ, अतिकाय युद्ध में आहत हुआ, महापार्श्व तथा महोदर
युद्ध में गिरे, नरांतक तथा देवांतक कट मरे, कुंभकर्ण के पुत्र, घोर पराक्रमी कुंभ तथा
निकुंभ नष्ट हुए; साथ-ही-साथ मकराक्ष भी युद्ध में काम आया और समस्त राक्षस-सेना
का नाश हो गया । कपियों ने अपने प्रताप का प्रदर्शन करके लंका को जला दिया ।
हे पुत्र, तुम इन बातों का स्मरण करके शीघ्र ही जाओ और अपने भयंकर बाणों के
प्रयोग से राम-लक्ष्मण का वध कर डालो । तुम रण-विद्या में दक्ष हो । पहले तुमने
सहज ही देवेन्द्र को युद्ध में जीत लिया था । यदि तुम क्रुद्ध होकर युद्ध के लिए प्रस्थान
करोगे, तो निखिल लोक उसी समय भस्म हो जायेंगे । तुम्हारे समक्ष इन नर तथा वानरों
की शक्ति ही कितनी है ?'
९९. इन्द्रजीत का यज्ञ करके रथ प्राप्त करना
इस प्रकार के उत्साहवर्द्धक वचन कहकर रावण ने अपने पुत्र को विदा किया ।
तब वह अपने पुरोहित को भी साथ लेकर युद्ध-भूमि में पहुँचा और वहीं यज्ञ करने का
उपक्रम करने लगा । परिचारक लोग शीघ्र ही अस्थि, कपाल, आवश्यक पात्र, लोहे के
स्रुक्-स्रुवा, शस्त्र, ताल, समिधाएँ, रक्त-वस्त्र, रक्त-चंदन आदि ले आये । तब
उसने रक्त-वस्त्र, रक्त-माला तथा रक्त-चंदन धारण किया, मारण-तंत्र-विधि से तोमर,
प्रास तथा खड्गों को हवन-कुंड की परिधि के रूप में सजाया और सजीव कृष्ण-हरिण
का कंठ काटकर उसका सिर ले लिया और भक्ति के साथ विधिवत् होम किया ।
अग्निदेव ने अपने धूम तथा शिखाओं को चारों ओर व्याप्त करते हुए प्रज्वलित होकर
हव्यो को ग्रहण किया । उस जयशील निशाचर वीर ने विजय के कई शकुन देखने के
कारण अत्यंत हर्ष से नियमपूर्वक होम समाप्त किया । उसके पश्चात् उसने चार अश्व
जुते हुए, भयंकर तथा श्रेष्ठ बाणों से दीप्तिमान् होनेवाले, सुंदर ढंग से अलंकृत सिंह
तथा अर्द्ध-चन्द्र के चिह्नों से अंकित, मणियों की उज्ज्वल कांति से भास्वर पताका से युक्त,
ब्रह्मास्त्र-से रक्षित, तथा युद्ध-भूमि में अदृश्य रूप से विचरण करनेवाले एक रथ को
प्राप्त किया । उस रथ पर आरूढ होकर वह युद्ध के लिए रवाना हुआ । जाते समय
उसने राक्षस-सैनिको से कहा—'अब मैं तुम्हारे समक्ष ही उन दाशरथियो को युद्ध-क्षेत्र
में गिराकर उनसे प्रतिशोध लूँगा और अपने पिता दशकंधर के दुख को दूर करके उन्हें
विजयी बना दूँगा । मैं एक निमिष मात्र में सूर्य-पुत्र तथा अन्य वानर-पुगवों का
सहार कर डालूँगा और देखते-देखते ही युद्ध-क्षेत्र में, मैं अन्य वानर-वीरो का भी
नाश कर दूँगा ।'
इस प्रकार कहने के पश्चात् वह अदृश्य हो गया । राक्षसो से युद्ध करनेवाले
राघवो को देखते ही उसकी भौहें तन गईं । तुरंत धनुष का संधान करके उसने दुर्वार
गति से उन पर ऐसी शर-वृष्टि की, जैसे प्रलय-काल में बादल जल-वृष्टि करते है । यह
देखकर राघवो ने क्रोध से समस्त आकाश को उग्र वाणो से भर दिया । इद्रजीत ने तब
उन सबको खंडित करके ऐसी शर-वृष्टि कर दी कि सभी दिशाओ में अधकार-सा छा गया ।
केवल उसके विशाल एव प्रचंड कोदंड की भयकर ध्वनि, रथ की नेमियो की ध्वनि,
रथ के अश्वो की टापो की ध्वनि तथा प्रत्यचा का टकार-मात्र सुनाई पडता था, किन्तु
उस राक्षस का रूप कही दिखाई नही पडता था । इससे दोनो राजकुमार आश्चर्य से
आकाश की ओर देखने लगे । किन्तु, वह राक्षस शीघ्र उनके शरीरो के सभी अगो में
पैने बाणो से प्रहार करने लगा । तब राघवेंद्र ने क्रुद्ध होकर उसी दिशा में अपने बाण
चलाकर उसके वाणो को जहाँ-के-तहाँ काट दिया । तब भुजवली इन्द्रजीत अपने रथ को
भिन्न-भिन्न दिशाओ में चलाते हुए असंख्य शर चलाने लगा । तब उसके बाणो से क्षत-
विक्षत अंगो से राम-लक्ष्मण पुष्पित किंशुक-वृक्षो के सदृश दीखने लगे । प्रलय-काल के
बादल के सदृश अपने विशाल शरीर को छिपाये हुए दक्षिण-दिशा से इन्द्रजीत ने राघवो
को देखकर कहा—'अब तुम कहाँ जाओगे और कहाँ छिपोगे ? तुम मेरे हाथो में फँस
गये हो । अब तुम्हारी रक्षा करनेवाला कौन है ? देवता तो अब इस ओर अपना मुँह
भी नही दिखा सकेंगे । दुबले-पतले बदरो पर भरोसा करके बड़े साहस के साथ तुम युद्ध
में आकर धोखा खा गये । मेरे तीक्ष्ण वाणो की अग्नि-शिखाओ से बचकर तुम अब कहाँ
जाओगे ? उस विभीषण के वचनो पर अधिक विश्वास करके मेरी शक्ति को तुम पहचान
नही सके । मैं अभी तुम्हारा वध करता हूँ और आज ही जाकर अयोध्या में रहनेवाले
उन भरत-शत्रुघ्न का भी अत करता हूँ ।
यह सुनकर सभी वानर तथा देवता सभ्रमित-से हो गये । इन्द्रजीत क्रुद्ध होकर
कभी पश्चिम दिशा से गर्व का प्रलाप करता, तो कभी उत्तर दिशा मे धनुष का टकार
करता । फिर, पूर्व दिशा से घोर शर-वृष्टि करता और तुरंत दक्षिण दिशा मे ऐसा घोर
गर्जन करता कि पृथ्वी हिल उठती । इस प्रकार, वह भिन्न-भिन्न दिशाओ में संचार करते हुए
वानरो पर बाण चलाने लगा । तब राम-लक्ष्मण धनुष पर बाण चढ़ाये हुए शीघ्र ही,
उस राक्षस के चलाये हुए बाणो को बीच में ही तोड देते । उसके इस युद्ध-कौशल को
देखकर देवता तथा सूर्य-पुत्र आदि वानर-वीर आश्चर्य-चकित हो गये ।
३८० रंगनाथ रामायण
इन्द्रजीत के वाणो से सैकडो कपियो को मरकर ढेर होते देखकर, सौमित्र ने क्रोध
से अपने भाई से कहा—'हे देव, इस राक्षस के हाथो से वानरो का सर्वनाश हो गया है।
तब भी आप ऐसे चुप साधे क्यो है ? वहाँ देखिए, भालुओ के नेता सभी दिशाओ में गिर-
कर लोट रहे हैं और अनेक वानरनायक नष्ट हो गये है । हे प्रभु, सभी वानर आपका
भरोसा करके बडी भक्ति के साथ युद्ध में आये और इन्द्रजीत के दारुण अस्त्रो से आहत
होकर गिरते हुए आपका ही नाम ले रहे हैं । शत्रु ने आपकी सारी सेना को समाप्त कर
दिया है । अब आप यदि इसे नही रोकें, तो अनर्थ हो जायगा । हे सूर्यवंशतिलक, शत्रुओ
का सर्वनाश करने की क्षमता रखनेवाले आपके बाण चारो दिशाओ में व्याप्त होकर अपने
दिव्य शरीर धारण किये हुए रहते हैं । आप उन्हें ग्रहण करके शत्रु का वध कर डालिए ।
इन शत्रुओ की शक्ति ही क्या है कि आपका सामना करके युद्ध कर सकें ? ऐसे शांत
रहना क्षत्रिय के लिए उचित नही है । आप ऐसी चिंता में क्यो पडे हैं ? हे सूर्य-सम
तेजस्वी प्रभु, आप अपने भुज-बल तथा पराक्रम का विचार ही नही करते । हे नाथ,
आपकी भक्ति करनेवाले मेरे जैसे सेवक के रहते हुए आप चिंता क्यो करते हैं ? आपकी
कृपा से मै स्वय इस नीच दानव का वध करने में समर्थ हूँ । मै अभी ब्रह्मास्त्र का प्रयोग
करके इस कुटिल राक्षस-वंश का नाश करता हूँ ।'
तब राघव ने अपने अनुज से कहा—'हे लक्ष्मण, केवल इस एक के कारण अनेक
का सहार करना क्या उचित है ? जो लोग युद्ध में भाग नही लेते हैं, क्या, उनका भी
सहार करना ठीक है ? उसे ब्रह्मा का यह वर प्राप्त है कि यह देव-दनुज तथा रुद्रादि
देवो के द्वारा नही मरेगा , उस वर के गौरव की रक्षा करने के लिए ही मै अबतक
इसके औद्धत्य का सहन कर रहा हूँ । अब भी यदि यह युद्ध-भूमि में रहा, तो मै स्वय
इसका सहार करने की क्षमता रखनेवाले वीर-वानरो को भेजूँगा । वे ही बुरी तरह इसे
पीडित कर सकेंगे । यदि ऐसा नही हो सका, तो भले ही यह मेघनाद, इन्द्रलोक में
आश्रय ले, ब्रह्मलोक में शरण ले, रुद्र-लोक में छिप जाय, पृथ्वी में प्रवेश कर रसातल में पहुँच जाय,
समुद्र में डूब जाय या चाहे यम ही इसकी रक्षा करे, अथवा इसका दादा पुलस्त्य स्वयं इसे
अपनी आड में छिपा ले, फिर भी मै इसका वध अवश्य करूँगा, मै इसे छोडूंगा नही ।'
राम के इस प्रकार कहते ही उनके क्रोध की कल्पना करके इन्द्रजीत युद्ध करने की
इच्छा छोडकर अपनी भयकर सेना को साथ लिये हुए लका को लौट गया और अपने
पिता से कहने लगा—'हे दानवेन्द्र, मैने युद्ध में वानर-सेना का सर्वनाश और राम-लक्ष्मण
का मान-हरण किया है ।' उसकी बातें सुनकर रावण ने क्रुद्ध होकर कहा—'युद्ध के लिए
तुम्हारा इस प्रकार जाना और फिर लौट आना किस प्रयोजन का है ? तुम ने कौन बडा
कार्य किया है कि मेरे सामने डीग हाँक रहे हो ? राम-लक्ष्मण का वध किये बिना तुम
लौट आये और कहते हो कि सब मर गये । यदि तुम अपने शौर्य का प्रदर्शन करते हुए
युद्ध करते, तो समस्त लोक भस्म हो जाते । अबतक जो सफलता तुम्हें मिली है, उसे
बहुत बडा मानकर तुम सतुष्ट मत होओ । अपने पराक्रम से राम लक्ष्मण को तथा वानरो
को मारकर, फिर मुझे अपना मुख दिखाओ ।'
रावण के इन वचनों को सुनकर इन्द्रजीत ने कहा--'ऐसा ही होगा', और अपने
पिता की आज्ञा लेकर वहाँ से चल पड़ा । उसने मन-ही-मन निश्चय कर लिया कि इस
भयंकर युद्ध में अतिकाय, कुंभकर्ण आदि दैत्य-वीर अपने प्राण खो बैठे हैं, इसलिए मैं किसी-
न-किसी प्रकार से राम-लक्ष्मण को अवश्य परास्त करूँगा । यो सोचकर उसने अपनी
माया से एक माया-सीता की सृष्टि की और उसे साथ लिये हुए अपनी सेना के साथ
पश्चिम दिशा की ओर रवाना हुआ । उस राक्षस के प्रताप से भयभीत हो सभी वानर
भिन्न-भिन्न दिशाओ में भागने लगे । तब हनुमान् एक महान् शैल-शृंग को उठाकर उस
राक्षस का सामना करने के लिए आया । वहाँ उसने इन्द्रजीत के रथ पर माया-सीता
को देखा । वह (माया) सीता राम की अत्यधिक विरहाग्नि से पीडित आहार तथा निद्रा
मे रहित अत्यत दुख से अभिभूत दिखाई पड रही थी । नि श्वास छोडनेवाली उस माया-
सीता का शरीर नितात दुर्बल था, मुख पीला पड गया था और उसके कमल-दल-जैसे
नेत्रो से आँसू बह रहे थे । उसके केश उलझे तथा मलिन थे । उसके सभी अग पृथ्वी पर
लोटने के कारण धूलि-धूसरित थे । वह अपना कातिहीन मुख, कर-पल्लव पर टेके हुए
इस प्रकार काँपती हुई बैठी थी, जैसे प्रचंड वायु से लता कपित होती है । उस सीता को
देखकर हनुमान् दुखी होने लगा, 'हाय भगवन्, यह राक्षस राम की पत्नी की न जाने
और क्या दुर्गति करेगा । उनकी यह दीन दशा मुझे देखना पड रहा है ।' फिर भी वायु-
पुत्र घोर वानर-सेना के साथ दारुण रूप से उस राक्षस पर आक्रमण करने का उपक्रम करने
लगा । यह देखकर दशकंठ के पुत्र ने बडी क्रूरता से हनुमान् को देखकर कहा--'रे वानर,
अब क्यो आगे बढ रहा है ? ले, सीता को यहाँ देख । इसी सीता के लिए तो तू इस
प्रकार उतावला हो रहा है ? मै अभी इसका सिर काट डालता हूँ ।'
तब वाण के सम्मुख पडी हुई हिरणी के समान दीखनेवाली सीता अपनी आँखो
से अश्रु बहाते हुए, 'हाय राम, हाय राम' कहकर आर्तनाद करने लगी । वह क्रूर राक्षस
सीता के केश पकडकर खीचने लगा । तब वायुपुत्र ने उस राक्षस से कहा--'रे दुरात्मा,
क्या, यह तुम्हारे लिए उचित है ? तुम राक्षस हो तो क्या हुआ ? तुम विश्रवसु के पोते हो,
क्या तुम्हारे लिए यह शोभा देता है कि तुम मनुकुलेश्वर राम की पत्नी को इस प्रकार
केश पकडकर खींचो ?'
हनुमान् के इतना कहते ही इन्द्रजीत ने अपने खड्ग को उठाकर उस माया-सीता का
सिर काट डाला और कहा--'अब तुम जाकर यह समाचार राम-लक्ष्मण से कहो ।' यह
देखकर अनिलकुमार अत्यत शोक-सतप्त हुआ । खड्ग से कटकर, रक्त से लथपथ माया-
सीता को दिखाकर इन्द्रजीत ने हनुमान् से कहा--'हे वानरोत्तम, राम की पत्नी इस सीता
का वध मैने अपने खड्ग से कर डाला । अब तुम्हारा रणोत्साह शिथिल पड जायगा ।'
इतना कहकर इन्द्रजीत युगात के घनघोर मेघ के गर्जन की भाँति सिंहनाद करके दिग्गजो
के कर्ण-पुटों तथा दिशाओ को विदीर्ण करते हुए, शत्रु-सैनिको के मन में भय उत्पन्न करते
हुए, युद्ध-भूमि में आगे बढा । उस राक्षस को देखते ही सभी वानर भागने लगे । तब
३८२ रंगनाथ रामायण
हनुमान् ने उन्हें देखकर कहा--'हे कपि-वीरो, अपने पराक्रम का प्रदर्शन करना छोड़कर
भाग जाने का क्या यही समय है ? क्या, तुम युद्ध-धर्म को नही जानते ? क्या, युद्ध-क्षेत्र
ने भागना, अपने वंश के लोगो को कलंकित करना नही है ? मैं आगे-आगे चलता हूँ,
तुम मेरा अनुगमन करो ।'
हनुमान् के वचन सुनकर सभी वानर पर्वत-शृंग तथा वृक्षो को उठाये हुए, गर्जन
करते हुए हनुमान् के पीछे-पीछे चले और राक्षसो पर उन पर्वतो तथा वृक्ष को फेंकने
लगे । पवन-कुमार ने भी क्रोध मे एक महान् पर्वत को उखाडकर उस राक्षस पर फेंका ।
तब इन्द्रजीत के सारथी ने रथ को तुरत दूसरी ओर फिरा लिया, तो वह पर्वत भयंकर
ध्वनि के साथ पृथ्वी पर आ गिरा । इतने में वानर फिर से पर्वतों तथा वृक्षो को ला-
लाकर राक्षस-सेना पर फेंकने लगे । वानरो के प्रहारो से अपनी सेना को नष्ट होते देख
रावण का पुत्र क्रुद्ध होकर शूल, मुद्गर तथा खड्गो के प्रहार से वानरो का संहार करने
लगा । तब मारुति ने अत्यंत क्रोधोन्मत्त हो अपने भयंकर रण-कौशल का प्रदर्शन करते
हुए राक्षसो पर शिलाओ तथा वृक्षो की वर्षा करके राक्षसो को भगा दिया । इसके पश्चात्
उसने वानरो को देखकर कहा--'हे वानरो, इस अधम राक्षस ने राम की पत्नी सीता का
वध कर दिया है । हमारा कार्य बिगड गया है । अब हमें युद्ध करने की आवश्यकता ही
क्या है ? मै यह समाचार राघव को सुनाने के लिए जा रहा हूँ । उसके पश्चात् राम जो
आज्ञा देंगे, वही हम करेंगे । अब तुम सावधान होकर रहो । यह राक्षस महान क्रूर है ।'
१०१ इन्द्रजीत का निकुंभिल-यज्ञ करना
इस प्रकार कहने के पश्चात् हनुमान् को जाते हुए देखकर रावण का पुत्र मन-ही-
मन सोचने लगा—'यह बली यहाँ से चला गया, अब मेरे यज्ञ में विघ्न डालने की शक्ति
किसी में नही है ।' यों सोचकर वह राक्षस रक्त-मांसो से अनल को तृप्त करते हुए
निकुंभिल-यज्ञ करने का प्रयत्न करने लगा । इधर राम ने पश्चिम दिशा में अत्यधिक
कोलाहल सुना, तो शीघ्र जांबवान् को बुलाकर कहा--'पश्चिम दिशा में विपुल घोष सुनाई
पड़ रहा है । न जाने, हनुमान् पर कोई विपत्ति आ पडी हो । तुम शीघ्र ही सेना के
साथ जाओ और वहाँ के विपुल घोष के संबंध में पता लगाकर आओ ।'
राम का आदेश पाकर ऋक्षेश (भालुओ का राजा) शीघ्र ही अपने एक करोड
रीछ-सैनिको के साथ पश्चिम द्वार की ओर चल पडा । मार्ग-मध्य में ही वायु-पुत्र उससे
मिला । वायु-पुत्र ने जांबवान् को देखकर इंद्रजीत के कार्य के संबंध में बताया और कहा-
'मैं यह समाचार रामचंद्रजी को सुनाकर अभी आता हूँ; मेरे आते तक तुम इसी स्थान
पर डटे रहो । शक्तिशाली शत्रु के संबंध में असावधान नहीं रहना चाहिए ।' यों समझाकर
पवन-पुत्र ने जांबवान् को भेज दिया और स्वयं राघव के पास चला । राघव हनुमान् को
दूर से ही देखकर सोचने लगे, 'क्या कारण है कि हनुमान् का मुखमण्डल अग्निवत्
(तमतमाया हुआ) दीख रहा है ? न जाने क्या बात है ?' इतने में वायु-पुत्र राम के
निकट आ पहुँचा और उन्हें प्रणाम करके कहा--'हे देव, मैं आपसे क्या विनती करूँ ?
हम सब अपने प्राण हथेली पर लिये राक्षसो से युद्ध कर रहे थे कि इन्द्रजीत भूमि-सुता
युद्धकाण्ड ३८३
सीता को युद्ध-भूमि में लेकर आया और निर्दय होकर हमारे समक्ष ही उनका सिर काट
डाला । इसलिए मै जाबवान् को द्वार पर रक्षा करने के लिए नियुक्त करके आप से यह
समाचार कहने को आया हूँ ।'
यह समाचार कानो तक पहुँचने के पूर्व ही प्रचण्ड वात से आहत वृक्ष की भाँति
अतुलित शोकाग्नि से जलते हुए, धैर्य खोकर रघुकुलेश्वर मूर्च्छित हो गये। पृथ्वी पर गिरे
हुए राम को देखकर सभी वानरनायक विलाप करने लगे ।
१०२ लक्ष्मण का शोक
तब लक्ष्मण ने अपने अग्रज के सिर को अपनी गोद में रखकर सभ्रमित चित्त से
इस प्रकार आर्त्तनाद करने लगे- "हाय राम, आप जैसे पुरुषोत्तम को आज यहाँ ऐसा कलक
लग गया । 'धर्ममेव जयते', यह कथन सत्य सिद्ध नही हुआ । यदि वह उक्ति सत्य
होती, तो आप जैसे दयावान् के लिए ऐसा सताप क्यो कर होता ? आपके हाथो मे रावण
की मृत्यु क्यो प्राप्त नही होती ? इससे तो यही सिद्ध होता हैं कि धर्म से अधर्म ही श्रेष्ठ है।
अयोध्या का राज्य त्याज्य नही है, ऐसा विचार किये विना हम उस राज्य को
छोडकर जगलो में भटकने आये । जगलो में भटकनेवाले हमें पुरुषार्थ कैसे
सिद्ध होगे ?
"क्या हमने बुद्धिमानो का यह वचन नही सुना कि निर्धनो के सभी प्रयत्न उसी
प्रकार निष्फल हो जाते हैं, जैसे निदाघ में झरने नष्ट हो जाते हैं । हे राजन्, धन का
अर्जन करने से धर्म तथा काम आदि अपने-आप सिद्ध हो जाते हैं । जिसके पास धन
होता है, सभी उसके सगे-सबधी बन जाते हैं । अर्थ-सपन्न व्यक्ति ही पुरुषोत्तम होता है,
धन ही विद्या है, धन ही कौशल है, धन ही कीर्त्ति है, वही महत्ता है, वही उच्चकुल
तथा सद्गुण है । धन ही शील और बल है, वही पुण्य है, वही राज्य है । धन ही
प्राण है, सौदर्य है, ख्याति है, नीति है, सपत्ति है, बुद्धि है, ज्ञान है, सुख है और शुचित्व है ।
अर्थ से सपन्न व्यक्ति की सभी इच्छाएँ वात-की-वात में पूरी हो जाती हैं । महान्
व्यक्ति, वेद-वेदाग-पारगत तथा विबुध-जन पुष्पाक्षतों से धनी व्यक्ति की बडी प्रीति से
पूजा करते हैं । जगलो में रहनेवाले मोक्षार्थ मुनि-पुगव भी कद, मूल तथा फल की भेंट
करते हुए धन-सपन्न व्यक्ति के दर्शन करते हैं । वदीजन तथा संगीतज्ञो का समाज धनवान्
व्यक्ति की सतत प्रशसा करते रहते हैं । उन्नतकुच, गुरु नितब, क्षीण कटि, मदगमन, विम्वा-
धर, चन्द्रमुख, कमल-नेत्र, भ्रमर के समान नीला जूड़ा, सुदर केश, नवोदित लज्जा, हाव-
भाव, मधुर कटाक्ष, मीठे वचन, नव यौवन आदि से सपन्न रमणियाँ भोग-
लालसा से प्रेरित होकर धनी-वृद्ध से भी प्रेम करेंगी, पर धन-हीन तरुण का अनादर करेंगी।
धन का अभाव ही नरक है, वही श्मशान है, वही महान् शोक है । दरिद्रता ही रोग है,
मृत्यु है, पाप है और कारावास है । धन का अभाव ही सकट है, अकाल है, दैन्य है
और दुःख है । निर्धनता ही सब प्रकार की कलुषता है । धनाभाव में सभी का अभाव
होता है । अत, जिस दिन हम राज-पाट छोडकर आये, उसी दिन विपत्तियाँ भी हमारे
साथ आई । मैं जानकी की मृत्यु का दुख सहन नही कर सकता । हे राजन्,
में अपने भयकर वाणो की अग्नि से राक्षसो के साथ सारी लका को शीघ्र ही भस्म
कर दूंगा ।”
१०३. इन्द्रजीत की माया को विभीषण का राघवों को समझाना
लक्ष्मण के इन वचनो को सुनते ही विभीषण ने राम की मूर्च्छा दूर करने का सफल
प्रयत्न किया। जब उनकी चेतना लौट आई, तब वह कहने लगा--'हे देव, यह सब इन्द्र-
जीत की माया है । सीता पर कोई विपत्ति नही आई है । मेरी बातो पर विश्वास
कीजिए । उस पापात्मा दशकठ के मन का भेद मैं भली भाँति जानता हूँ । मैने उसे
कितना समझाया कि तुम सीता को राम के चरणो में सौंप दो । किन्तु, उसने मेरे हित-
वचनो पर कान नही दिया । ऐसा रावण, भला, सीता का वध क्यो करायेगा ? हे राजन्,
सभव है कि यह उसकी माया हो । यदि सीता का वध सत्य होता, तो क्या अबतक
सभी लोक नष्ट-भ्रष्ट नही हो जाते ? यह असत्य ही है । आप चिंता क्यो करते हैं ?
मैं अभी जाता हूँ और सीता का कुशल जानकर आता हूँ ।'
उसके पश्चात् विभीषण ने राम की अनुमति पाकर, अपना विशाल रूप छोडकर
सूक्ष्म रूप ग्रहण किया और राक्षसेश्वर के वन में निर्विघ्न चला गया, वहाँ सीता को
देखकर तुरत लौटा और रामचंद्र को प्रणाम करके बडी भक्ति के साथ सारा समाचार
कह सुनाया । उसकी बातें सुनकर राम ने कहा- 'हे विभीषण, इन्द्रजीत ने युद्ध-भूमि में
ऐसा क्यो किया ?' तब विभीषण ने कहा- 'हे देव, उसने आसुर होम करने का सकल्प
किया है । हनुमान् आदि वानर-वीरो को निरुत्साह करके उन्हें आपकी सेवा में भेजने
के निमित्त ही उसने यह उपाय किया है । उसकी योजना सफल हुई और उसके यज्ञ में
विघ्न डालनेवाला वहाँ कोई नही रह गया । यह देखकर उसने निकुभिल में यज्ञ प्रारभ
कर दिया है । हे देव, यदि वह निष्ठा तथा भक्ति-युक्त मन से विधिवत् यज्ञ को पूरा
कर लेगा, तो देव तथा दानव कोई भी उस वीर को जीत नही सकेंगे । अत, हमें उस
राक्षस के यज्ञ में विघ्न डालना चाहिए । हे राजन्, हम अभी अपनी सेना के साथ उसके
यज्ञ में विघ्न डालने के निमित्त जायँगे, आप लक्ष्मण को हमारे साथ भेजिए । दशकठ
के पुत्र इन्द्रजीत आज निकुभिल वन में यज्ञ के अनुष्ठान में लगा हुआ है । लक्ष्मण आज अपने
प्रचड वाणो से उसे वध कर डालेंगे । यज्ञ का अनुष्ठान पूरा होने के पहले ही यदि उसको
हम दण्ड नही देंगे, तो यज्ञ की समाप्ति पर वह ब्रह्मा से ब्रह्माग्निर नामक शर, धनुष, कवच,
खड्ग, दो तूणीर, कई मत्र-पूत अस्त्र और देवाश्वो से तथा सुदर ध्वजा से युक्त, वायु-
वेग से चलनेवाला रथ, उस होम-कुड से निकलेंगे । यदि इन्द्रजीत उस रथ पर आरूढ
होकर अपने हाथ में वह धनुष सँभाले, तो देवासुर भी उसके समक्ष खडे नहीं
रह सकेंगे । इसके पहले, ब्रह्मा ने उसे वर-प्रदान करते समय उससे कहा था कि यदि तुम
निकुभिल-यज्ञ करोगे तो सब प्रकार से अजेय हो जाओगे । यदि यज्ञ के बीच में विघ्न
उपस्थित हो और यज्ञ अधूरा रह जाय, तो तुम युद्ध में शत्रुओं के द्वारा मारे जाओगे ।
इसलिए हे राजन्, आप युद्ध का आवश्यक प्रयत्न कीजिए और इन्द्रजीत का वध करवाइए ।
यदि यह मायावी मारा जाय, तो निश्चय समझिए कि देवताओ का शत्रु दशकंठ भी मर गया ।
युद्धकांड ३८५
१०४. लक्ष्मण का युद्ध के लिए प्रस्थान
तब रघुराम ने अपने अनुज से कहा—'हे अनघ, वीर इन्द्रजीत वादलों में तिरोहित
होनेवाले सूर्य की भाँति अपनी माया से अपनी गति को प्रकट किये बिना विचरण करने
के लिए यज्ञ कर रहा है । उस वीर को इन्द्रादि देवता भी युद्ध में जीत नही सकते ।
अपने मन्त्रियों के साथ विभीषण उस यज्ञ को तुम्हें दिखायगा । हे सौमित्र, तुम जाओ और
यज्ञ पूरा होने के पहले ही उस राक्षस का वध कर डालो । शक्तिशाली भालुओं की
सेना के साथ पराक्रमी जाम्बवान् तथा विजय और विक्रम में धुरंधर हनुमान् भी तुम्हारे
साथ जायेंगे ।' इतना कहकर रघुराम ने अपने अनुज को समुद्र के दिये हुए वज्र-कवच,
श्रेष्ठ खड्ग, दो तूणीर, धनुष तथा श्रेष्ठ आभूषण आदि देकर उन्हें आशीर्वाद देते हुए
कहा—'हरि, तुम्हें सतत विजय प्रदान करें, शंकर तुम्हें सब प्रकार के शुभ दें, ब्रह्मा
तुम्हें दीर्घायु दें, समस्त देवता सभी दिशाओ में तुम्हारी रक्षा करें, अनल तथा अनिल
आगे और पीछे तुम्हारी रक्षा करते रहें ।'
तब लक्ष्मण ने अत्यत उत्साह से धनुष सँभाला, कवच धारण किया, तूणीर कसे,
खड्ग लिया और विविध आभूषणो से विलसित हो, राम को भक्ति के साथ प्रणाम किया
और बडे साहस के साथ कहने लगे--'हे देव, कमल-सरोवर में हंसो के प्रवेश होने की
भाँति, श्वेत पखवाले मेरे बाण आज इन्द्रजीत को पार करके लका में गिरेंगे । रूई के ढेर
की भाँति मैं अपनी बाणाग्नि से उसे भस्म करूँगा ।'
इस प्रकार कहते हुए उन्होंने रामचन्द्र की आज्ञा लेकर, गरुड पर आरूढ विष्णु की
भाँति हनुमान् पर आरूढ हो, वानर-सेना तथा जाम्बवान् आदि वीरो के साथ युद्ध के लिए
प्रस्थान किया । निदान, वे वहाँ से तीस योजन दूर स्थित निकुभिला के पास पहुँचे ।
१०५ निकुंभिला-होम में विघ्न
यज्ञ-भूमि, मत्त गज, उत्तम अश्व, श्रेष्ठ रथ, तथा पदचर सेना से घिरी हुई भयकर
एव अभेद्य प्रतीत होती थी । सारी सेनाएँ बिना कल-कल ध्वनि के, तरग-हीन समुद्र की
भाँति दिखाई दे रही थी । ऐसी राक्षस-सेना को देखकर महान् शस्त्रास्त्रो से सपन्न सौमित्र
से विभीषण ने कहा--'हे अनघ, इस महान् सेना को जबतक आप अपने बाण-समूह से
काट नही डालेंगे, इन्द्रजीत हमें दिखाई नही देगा, इसलिए आप अपने श्रेष्ठ बाणो से
पहले इस सेना का सहार कीजिए । उसके पश्चात् हालाहल के सदृश भयकर अपनी बाणाग्नि
मे इस दुरात्मा का सहार कर डालिए, जिसमे इसका प्रारभ किया हुआ यज्ञ पूरा
न हो ।'
विभीषण की सलाह के अनुसार सौमित्र ने अपनी आँखो से अग्नि-कणो की वर्षा-सी
करते हुए राक्षस-सेना पर विविध बाण चलाये । तुरत ही अतीव बलशाली वानर राक्षसो
पर पर्वतो तथा वृक्षो की वर्षा करने लगे । राक्षसों ने अत्यधिक क्रुद्ध होकर, परिघ चलाते
हुए, गदाओ से प्रहार करते हुए, करवालो से मारते हुए तथा भिन्न-भिन्न महान् शस्त्रो से आधान
करते हुए विविध रीतियों से वानरो पर आक्रमण किया । ऐसी भयकर गति से भिडे हुए
वानर तथा राक्षस-सेनाओ के भीषण गर्जनो से लका डोल उठी । राक्षस-सेना नष्ट होने
४६
लगी । तब वानर-सेना भी क्रुद्ध होकर राक्षमो पर ऐसे प्रहार करने लगी कि राक्षस-
सेना अपना दर्प खोकर इंद्रजीत की आड में शरण लेने लगी ।
तबतक इन्द्रजीत यज्ञ की सफल ममाप्ति के लिए आवश्यक दो सौ दस आहुतियो
में से, एक-एक करके एक सौ नौ आहुतियाँ महावर्त्ति की ज्वालाओ में दे चुका था ।
उसी समय वानर-सेना अपने भयंकर गर्जनो से पृथ्वी को कँपाती हुई वहाँ आ पहुँची ।
यह देखकर क्रोधोन्मत्त हो इन्द्रजीत ने अपने हाथ की आहुति नीचे फेंक दी, अपनी आँखों
से चिनगारियाँ बिखेरते हुए वह युद्ध के लिए सन्नद्ध हुआ । अपने रथ पर आरूढ हो,
हाथ में अपना भयंकर धनुष लिये हुए, वह वानर-सेना पर टूट पड़ा और उन्हें अपने तीव्र
शरों के आघात से भागने के लिए विवश कर दिया । इसी बीच सौमित्र को साथ लिये
हुए विभीषण ने निकुम्भिल-वन में प्रवेश किया और घने नील मेघ की भाँति दीखनेवाले
वटवृक्ष के नीचे स्थित इंद्रजीत का हवन-कुंड दिखाकर कहने लगा—'हे सौमित्र, देखा
आपने ? युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए इस राक्षस ने यहाँ यह हवन प्रारम्भ किया है
और भूतों की बलि देकर अग्नि से अद्वितीय शक्ति को प्राप्त कर शत्रुओं को जीतने का
संकल्प किया है । इसके पहले भी इसने इसी प्रकार हवन करके दुर्वार शक्ति प्राप्त की थी
और इन्द्र को जीत लिया था । वहाँ देखिए, हवनकुंड से अरुण नेत्र, अरुण केश,
अरुण वस्त्र तथा अरुणवर्ण माला धारण किये हुए काले रग का सारथी तथा अरुण अश्वों
से युक्त रथ उभर-उभरकर निकलनेवाले हैं । इंद्रजीत शीघ्र ही लौट आयेगा और
हवन से प्राप्त शक्ति से इस रथ पर आरूढ होगा । उसके पश्चात् उसे कोई भी जीत
नहीं सकेगा । अतः, हे सौमित्र, आप अपने भयंकर बाणों के प्रहार से इन्द्रजीत का महार
कीजिए ।' तुरत लक्ष्मण धनुष का भयंकर टंकार करने लगे ।
१०६. लक्ष्मण तथा इन्द्रजीत का परस्पर तिरस्कार के वचन कहना
तब करवाल हाथ में लिये हुए, कवच धारण किये, अग्निवर्ण रथ पर सवार हो
इन्द्रजीत लक्ष्मण के समक्ष उपस्थित हुआ । उसे देखकर सौमित्र ने क्रोध से कहा—'हे
मायावी राक्षस, अब तुम्हारी माया से कोई प्रयोजन नहीं है । यदि तुम वीर हो, तो मेरा
सामना करो और अपनी सच्ची वीरता को प्रकट करते हुए मेरे साथ युद्ध करो । मैं
अवश्य तुम्हें यमपुरी को भेजूँगा । तुम भले ही कपट-रूप धारण करो या अपने निज
रूप में रहो, मैं शीघ्र तुम्हें समाप्त कर दूँगा ।'
यह मुनकर इन्द्रजीत ने रोषपूर्ण आँखों से लक्ष्मण को देखकर कहा—'हे लक्ष्मण,
बालक होकर तुम ऐसा हठ क्यों करते हो ? किंचित् काल ठहरो, मैं अपने बाणों से विजय-
लक्ष्मी से तुम्हें दूर करके, तुम्हारे शौर्य का नाश करूँगा और तुम्हारे प्राण लेकर पृथ्वी पर
गिरा दूँगा और तुम्हारे शरीर को काटकर उस मास से कौओ तथा गीधो को तृप्त
करूँगा । क्या, इतने शीघ्र तुम भूल गये कि मैंने तुम्हें नाग-पाशो में बाँधा था ।'
इसके पश्चात् उसने विभीषण को देखकर क्रोध से कहा—'हे धर्म-घातक, तुम मेरे
चाचा हो, और मैं तुम्हारा प्रिय पुत्र हूँ । क्या, तुम्हें यह उचित है कि तुम मेरा अहित
करो । दुर्मति होकर कुल-द्रोह करनेवाले तुम, भला औचित्य का विचार ही कैसे करोगे ?
युद्धकांड ३५७
क्या, कोई ऐसा नीच होगा, जो विपत्ति में पड़े हुए वधुओं को छोड़कर शत्रुओं की शरण ले ?
औचित्य की बात रहने दो । अपने लोगों को छोड़कर शत्रुओं की सेवा में जीवन
बितानेवाले व्यक्ति का जीवन भी कोई जीवन है ? राक्षसेश्वर महा तेजस्वी हैं । ऐसे
व्यक्ति तुम्हारे निष्ठुर वचनों को हित-वचन कैसे मान लेंगे ? भाई के क्रोध करने में यदि
तुम घर के किसी कोने में पड़े रहते, तो क्या होता ? वहाँ से भागकर भी तुमने कौन-सा
महान् कार्य सिद्ध कर लिया ? क्या, तुम्हारे प्रताप की सहायता से ही दशकंठ ने समस्त
देवताओं को जीत था ? हमारे अपने होते हुए तुम अपना रहस्य अपने शत्रु को बताकर
उसके हाथों में स्वयं भी नष्ट हो जाओ ।'
तब विभीषण ने कहा—'हे मेघनाद, तुम मेरे आचरण से भली भाँति परिचित हो ।
फिर भी, ऐसा प्रलाप क्यों करते हो ? तुम उस अविनीत पिता के अविनीत पुत्र ही तो हो ।
भला, तुम्हें धर्म और नीति का विचार ही क्यों होगा ? क्रूर वधु का उसी प्रकार त्याग
करना चाहिए, जैसे पाले हुए सर्प का त्याग करते हैं । यदि वह पापी दशकंठ मेरी बात
उस दिन मानता
यह सुनकर इन्द्रजीत ने वडे क्रोध में कालसर्प-सदृग वाणो को लक्ष्मण पर चलाया,
जो लक्ष्मण के गरीर को पार करके पृथ्वी में धँस गये । फिर, उसने लक्ष्मण के गरीर पर
कई गर चलाये, जो उनके गरीर को छेदकर दूसरी ओर निकल गये । लक्ष्मण के गरीर
मे, रौद्र रस की वाढ की तरह रक्त की धारा फूट निकली । यह देखकर राक्षस हर्प का
भीपण निनाद करने लगे । तब इन्द्रजीत ने अट्टहास करते हुए लक्ष्मण के निकट पहुँचकर
कहा—'हे राजकुमार, वडे गूर की भाँति तुमने मुझसे युद्ध ठाना है । पहले मैं तुम्हारा
कवच खड-खंड कर दूँँगा और उनके पश्चात् अपने दारुण अस्त्रो से तुम्हारा सिर काट
लूँगा । आज राम अवश्य ही अपने भाई को युद्ध-भूमि में पड़े हुए देखेगा ।'
तब लक्ष्मण ने उस निगाचर को देखकर कहा—'हे राक्षस, व्यर्थ ही गर्व क्यो
करते हो ? युद्ध-भूमि में प्रलाप करने से क्या प्रयोजन ? यहाँ से विना हटे, मेरे साथ
युद्ध करो । जिस प्रकार अग्नि विना कुछ कहे, जला डालती है, वैसे ही में विना बातें
किये ही अभी तुम्हारा वध कर डालता हूँ । व्यर्थ डींग मारने मे क्या
युद्धकांड ३५९
इस प्रकार सोचकर मेघनाद ने लक्ष्मण को देखकर कहा—'हे राजकुमार, अब तुम
वीर की तरह खडे होकर मेरे पराक्रम को देखो ।' यो कहते हुए उसने सात बाण लक्ष्मण
पर, दस बाण हनुमान् पर तथा एक सौ बाण विभीषण पर चलाकर उन्हें व्याकुल कर
दिया । उन बाणो की उपेक्षा करते हुए लक्ष्मण ने इन्द्रजीत को देखकर हँसते हुए कहा—
'हे राक्षस, शूर बडी-बडी बातें कहे बिना ही युद्ध जीत लेते हैं और अधम डींग हाँकते
हुए भी हार जाते हैं । सच्चा वीर युद्ध में कभी छिपता नही । युद्ध में धोखा देना भी
क्या, कोई वीरता है ? हे क्रूरात्मा, तुम कुटिल युद्ध करनेवाले हो ? तुम्हारे इह-लोक
और पर-लोक दोनो नष्ट हो जायेंगे ।'
इस प्रकार कहते हुए लक्ष्मण ने सूर्य-किरणो की भाँति प्रकाशमान होनेवाले, स्वर्ण
की अनी से युक्त बाणो को उस राक्षस पर चलाया, तो वे उसके कवच को भी छेदकर
उसके शरीर के पार निकल गये । तब उसका कवच भयकर सर्प की केंचुली की भाँति
पृथ्वी पर गिर पडा । तब इंद्रजीत दूसरा वज्र-कवच पहनकर लक्ष्मण पर पैने बाण
चलाने लगा । परस्पर के शराघातो के कारण शरीरो से निकलनेवाले शोणित के प्रवाह
से युक्त होकर, वे दोनो गेरुए रग के निर्झरो से युक्त पर्वतो की भाँति दीखने लगे । वे
अपनी-अपनी धनुर्विद्या का कौशल दिखाते हुए तीव्र गति से युद्ध करने लगे । अस्त्र के
आघातो से युक्त हो युद्ध करते समय, वे ऐसे दिखाई पड रहे थे, मानो पतझड के उपरान्त
पुष्पित किंशुक वृक्ष हो । अमर, गधर्व आदि आश्चर्य के साथ इस युद्ध को देखने लगे ।
उसी समय कलभो से घिरे हुए मत्त गज के सदृश, मत्रियो से घिरे विभीषण ने
भयकर रीति से अपने धनुष का टकार किया और क्रोधोन्मत्त हो राक्षस-सेना पर ज्वालाओ
को उगलनेवाले तीक्ष्ण बाण चलाये । उन बाणो के लगते ही राक्षस-सेना इस प्रकार
पृथ्वी पर गिरने लगी, जैसे वज्रपात से विशाल वृक्ष गिरते हैं । अनल आदि उसके मत्री
शूल, वरछे, खड्ग आदि शस्त्रो से राक्षसो पर आक्रमण करके उन्हें धराशायी करने
लगे । तब विभीषण वानर-सेना को देखकर कहने लगा —'अब तुम सब लोग एक साथ
मिलकर इस इन्द्रजीत का वध करो । लंकेश्वर की सारी शक्ति यही है । यदि यह मारा
गया, तो समझो कि दशकण्ठ अपनी सेना के साथ परास्त हो गया । इसके पहले तुम
लोगो ने अपने असमान विक्रम से, प्रहस्त, वज्रमुष्टि, प्रजघ, सुप्तघ्न, भयकर प्रतापी कुभ-
निकुंभ, कुभकर्ण, अतिकाय, महापार्श्व, धूम्राक्ष, मकराक्ष, क्रोधन, शोणिताक्ष, उपाक्ष, त्रिशिर,
महोदर, अग्निकोप, देवांतक, नरातक, जंबुमाली, अकपन आदि महान् पराक्रमी योद्धाओ
को मारकर युद्ध-सागर को सहज ही पार किया था और अपने बाहुबल को प्रदर्शित किया था ।
अब तुम्हारे तथा लक्ष्मण के लिए यह इन्द्रजीत एक गोपद के समान है । मुझे अपने
पुत्र का वध नही करना चाहिए । इसके नष्ट होने का उपाय मैं तुम्हें बताऊँगा । सुनो,
स्वय हिंसा करना या दूसरो को भेजकर हिंसा कराना, दोनो समान हैं । किंतु यह राम का
कार्य है, इसमें लोकहित निहित है । इसलिए यह पाप नही है । अब मैं सौमित्र के हाथो
इसका वध कराऊँगा । आगे इसकी एक भी माया नही चलेगी ।'
इसके पश्चात् जाम्बवान् ने अपनी रीछो की सेना लिये हुए आकाश को विदीर्ण
करनेवाला गर्जन करके राक्षसों पर टूट पड़ा और पर्वत-शृंगों, वृक्षों तथा नखों और दाँतो
से शत्रुओं के ऊपर आघात करते हुए उन्हें व्याकुल कर दिया । तब राक्षस भयंकर परशु,
मुद्गर, शूल, परिघ तथा धनुष लिये हुए भयंकर गति से उनसे भिड़ गये । वानर तथा
निशाचरों का वह संग्राम ऐसा दीख पड़ा, मानो सुरासुरों का संग्राम हो । तब हनुमान् ने
क्रुद्ध होकर लक्ष्मण को नीचे उतार दिया और यम के समान एक-एक प्रहार से अनेक
राक्षसों को पृथ्वी पर गिरा दिया । उसने शैल-शृंगों तथा शाल-वृक्षों का प्रचुर प्रयोग
किया और असंख्य राक्षसों का संहार करके भयंकर सिंहनाद किया । तब विभीषण ने क्रोध
में अपने धनुष का टंकार और अपने मंत्रियों के साथ राक्षस-सेना पर टूटकर अनेक
राक्षसों का संहार किया । फिर, उसने स्वर्ण अनी से युक्त तीव्र शर इंद्रजीत के शरीर पर
चलाया । तब उसने भी क्रुद्ध होकर अद्वितीय शर यों चलाये कि वे विभीषण के वक्ष को
पार करके पृथ्वी में ऐसे गड़ गये कि पृथ्वी भी डोल गई ।
इस प्रकार, विभीषण से भयंकर युद्ध करनेवाले इंद्रजीत को देखकर लक्ष्मण क्रुद्ध
हुए और हनुमान् के कंधे पर बैठकर असंख्य तीव्र शर उस राक्षस पर चलाये । इंद्रजीत ने
भी भयंकर बाण-समूह चलाकर लक्ष्मण के बाणों को काट दिया । इस प्रकार, जब वे दोनों
एक दूसरे पर क्रूर बाण चलाने लगे, तब उन अस्त्रों से ढके हुए शरीर से युक्त वे, वर्षा
की धारा से युक्त बादलों के समान और बादलों से युक्त सूर्य-चंद्र के समान दिखाई पड़ने
लगे । उनके बाणों की तीव्र गति का वर्णन कैसे किया जाय ? ऐसा लगता था, मानो
धनुष की प्रत्यंचा पर चढ़ाये हुए बाण जैसे-के-तैसे रहते हों और वे उन्हें छोड़ते ही न हों ।
दोनों ओर के बाण समस्त आकाश में ऐसे व्याप्त हो गये कि अंधकार छा गया ।
वीर रस के आवेश में अभिभूत वे दोनों उस युद्ध-क्षेत्र में अपने-आपको भूल-से गये ।
आश्चर्य था कि उस समय उस युद्ध-भूमि में वायु का संचलन भी नहीं होता था और
अग्नि दीप्त नहीं होती थी । यह देखकर दिक्पाल, देवता, गंधर्व, यक्ष, किन्नर आदि
चकित-से होकर लक्ष्मण की प्रशंसा करते हुए उनकी शरण में आये । उन्होंने लक्ष्मण की
विजय की कामना करते हुए उन्हें कई आशीर्वाद दिये और कहने लगे—'हे सौमित्र, इस
लोक-कंटक राक्षस का आप अवश्य वध कीजिए ।'
१०८. इन्द्रजीत का वध
देवताओं के इस प्रकार कहते ही भानु-वंशज लक्ष्मण ने भयंकर सिंहनाद करके
अपने धनुष का टंकार करते हुए इंद्रजीत पर आक्रमण किया और असंख्य बाण उस पर
चलाये । उस राक्षस ने भी उन बाणों को काटकर फिर कई भीषण शर लक्ष्मण पर चलाये।
तब, लक्ष्मण ने क्रुद्ध होकर एक अर्द्धचंद्र बाण से उसका धनुष काट डाला, सात बाणों से
उसकी ध्वजा को गिरा दिया, एक बाण ने सारथी का सिर काट डाला, दस बाणों से
उसका वक्ष विदीर्ण करके चार बाणों से रथ के अश्वों को मार गिराया । तब रावण का
पुत्र स्वयं सारथी तथा रथिक बनकर सौमित्र पर भयंकर शरवर्षा करके अट्टहास करने लगा।
तब सौमित्र ने स्वयं रथ चलाते हुए युद्ध करनेवाले इंद्रजीत को लक्ष्य करके तीक्ष्ण बाण
चलाये, जिनके लगने से रावण का पुत्र मूर्च्छित हो गया ।
कुछ ही समय के पश्चात् इन्द्रजीत की चेतना लौट आई । वह चिंतित होकर
सोचने लगा- 'यह कैसी विचित्र बात है कि एक मानव ने मुझे इतना व्याकुल कर दिया ।
इसके पहले के युद्धों में मैंने कभी ऐसी व्याकुलता का अनुभव नहीं किया था । समय की
गति प्रबल है, कोई उसके प्रतिकूल जा नहीं सकता।' इस प्रकार चिंता से पीड़ित हो वह
दीर्घ निःश्वास छोड़ते हुए धनुष पर बाण का संधान करने की इच्छा नहीं रहने के कारण
चुपचाप शत्रु को देखता रहा । तब सभी देवता रामानुज की प्रशंसा करने लगे ।
इंद्रजीत के कांतिहीन तथा विवर्ण मुख को देखकर वानर हर्ष-ध्वनि करने लगे ।
तब वीराग्रणी प्रमाथी, मेघ-सदृश विशालकाय एवं मेघनिस्वन शरभ तथा ऋषभ ने पर्वत-
शृंगों को, इन्द्रजीत के रथ पर फेंककर अश्वों के साथ रथ को भी नष्ट-भ्रष्ट कर दिया ।
इस पर विपुल क्रोध से इन्द्रजीत ने सिंहनाद करके विभीषण के ललाट को तथा लक्ष्मण के
वक्ष को लक्ष्य करके तीन-तीन पैने बाण चलाये और धनुष का टंकार करते हुए सिंह-गर्जन
किया । तब विभीषण ने क्रोधोन्मत्त हो, आँखों से अग्नि-कणों की वर्षा करते हुए पाँच
बाण ऐसे चलाये कि वे उस राक्षस के वक्ष को पार कर निकल गये । तब इन्द्रजीत ने
क्रोध से अपने पिता (विभीषण) पर आग्नेय बाण चलाया । उसको आते देखकर लक्ष्मण ने वारुणास्त्र
का प्रयोग किया । दोनों शर आपस में टकराकर पृथ्वी पर गिर पड़े । उसके पश्चात् उस
राक्षस-कुमार ने उरगास्त्र चलाया, तो लक्ष्मण ने गरुडास्त्र के प्रयोग से उसको विफल कर
दिया । फिर, उसने कुबेरास्त्र चलाया, तो लक्ष्मण ने ऐन्द्रास्त्र से उसे खंडित कर डाला ।
तब दानव ने गंधर्वास्त्र चलाया, तो लक्ष्मण ने उसे रौद्रास्त्र से काट डाला । उन दोनों का
युद्ध प्रलय-काल में पृथ्वी की दशा का स्मरण दिला रहा था। उस समय सौमित्र की रण-
क्लान्ति को मिटाने के लिए मानो, मंद-मंद पवन चलने लगा ।
तब लक्ष्मण ने यम की भाँति क्रूर हो इन्द्रजीत को देखकर अपने धनुष की ऐसी
ध्वनि की कि दिशाएँ विदीर्ण-सी हो गईं । और, उसके पश्चात् उन्होंने भयंकर सिंहनाद
करके, देवेन्द्र से प्राप्त ऐन्द्रास्त्र को अपने धनुष पर चढ़ाया और कहा-- 'यदि रामचन्द्र
धर्मात्मा हैं, यदि देवी सीता पतिव्रता हैं, यदि देवताओं की कृपा मुझ पर है, यदि इन्द्र
आदि देवताओं का हित (इन्द्रजीत के अंत से) होनेवाला है, तो यह महान् शर इन्द्रजीत
का सिर काट देगा।' इस प्रकार कहते हुए उन्होंने लक्ष्य साधकर इन्द्रजीत पर वह बाण
चलाया । रत्न की नोक से सुशोभित वह बाण, समस्त आकाश में व्याप्त हो, घोर वज्र के
समान भीषण रूप धारण किये हुए, क्रूर गति से चल पड़ा । उस शर ने विहगेन्द्र के सदृश
वेग के साथ, सर्प के मुख से निकलनेवाले अग्नि-कणों की चंचलता लिये हुए, सूर्य-बिंव की-सी
भयंकर दीप्ति से प्रज्वलित होते हुए, अपनी कांति से पृथ्वी तथा आकाश को भरते
हुए उग्र दंड देने के उद्देश्य से भयंकर बनकर उस राक्षसेन्द्र के पुत्र पर आक्रमण किया ।
उस महान् उद्दण्ड अस्त्र ने अनुपम मणिकुंडलों तथा ललित अरुण अक्षतों से अलंकृत इन्द्रजीत
के सिर को मुकुट के साथ पृथ्वी पर गिरा दिया, मानो (लक्ष्मण ने) लंका की निधि सिद्ध
करने की इच्छा से प्रेरित हो, उसके पहले बलि देने के लिए, एक जंगली भैंसे का सिर
काट लिया हो । युद्ध-क्षेत्र में गिरे हुए इन्द्रजीत को देखकर, लक्ष्मण विजय-लक्ष्मी से