रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 408, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें३७८ | रंगनाथ रामायण
काँप गया । तुरंत उसने ऋषभ, गवाक्ष, सुषेण, अंगद, जांबवान्, कुमुद, हनुमान्, गंधमादन,
नल आदि वीर वानरों को अपने अनुपम युद्ध-कौशल से विवश कर दिया । फिर,
उसने राघव पर विविध बाण चलाये और लक्ष्मण के धनुष को खंडित कर दिया और
विभीषण को बाणों के प्रहार से झकझोर दिया । तब उसने प्रलय-काल के बादल की भाँति
बार-बार गर्जन करते हुए राम से कहा—'हे रघुराम, देखा तुमने, मेरे क्रोध में आते ही
सुग्रीव आदि वानर-वीर कैसे गिर गये ? हे राजकुमार, तुम पर विश्वास करनेवाले इन
वानरों की धज्जियाँ उड़ गईं ।' इस प्रकार कहने के पश्चात् भी उस राक्षस ने अनेक
बाण उस कपि-सेना पर चलाये और तदनंतर 'मैं विजयी हुआ', यों चिल्लाते हुए लंका
को लौट गया और अपने पिता से अपने युद्ध-कौशल का वृत्तांत कह सुनाया ।
अपने पुत्र के पराक्रम का वृत्तांत सुनकर रावण अत्यंत हर्षित हुआ और उसे निकट
बुलाकर हृदय से लगा लिया और कहा—'हे वत्स, तुम्हारे जैसे पुत्र के रहने से ही तो मैं
शत्रुओं के द्वारा मारे गये अपने बंधु-बांधवों की मृत्यु का प्रतिशोध ले सका । आज मेरा
दुःख दूर हुआ । महान् वीर कुंभकर्ण मारा गया, महाबली प्रहस्त मृत्यु को प्राप्त हुआ,
अनुपम वीर त्रिशिर का अंत हुआ, अतिकाय युद्ध में आहत हुआ, महापार्श्व तथा महोदर
युद्ध में गिरे, नरांतक तथा देवांतक कट मरे, कुंभकर्ण के पुत्र, घोर पराक्रमी कुंभ तथा
निकुंभ नष्ट हुए; साथ-ही-साथ मकराक्ष भी युद्ध में काम आया और समस्त राक्षस-सेना
का नाश हो गया । कपियों ने अपने प्रताप का प्रदर्शन करके लंका को जला दिया ।
हे पुत्र, तुम इन बातों का स्मरण करके शीघ्र ही जाओ और अपने भयंकर बाणों के
प्रयोग से राम-लक्ष्मण का वध कर डालो । तुम रण-विद्या में दक्ष हो । पहले तुमने
सहज ही देवेन्द्र को युद्ध में जीत लिया था । यदि तुम क्रुद्ध होकर युद्ध के लिए प्रस्थान
करोगे, तो निखिल लोक उसी समय भस्म हो जायेंगे । तुम्हारे समक्ष इन नर तथा वानरों
की शक्ति ही कितनी है ?'
९९. इन्द्रजीत का यज्ञ करके रथ प्राप्त करना
इस प्रकार के उत्साहवर्द्धक वचन कहकर रावण ने अपने पुत्र को विदा किया ।
तब वह अपने पुरोहित को भी साथ लेकर युद्ध-भूमि में पहुँचा और वहीं यज्ञ करने का
उपक्रम करने लगा । परिचारक लोग शीघ्र ही अस्थि, कपाल, आवश्यक पात्र, लोहे के
स्रुक्-स्रुवा, शस्त्र, ताल, समिधाएँ, रक्त-वस्त्र, रक्त-चंदन आदि ले आये । तब
उसने रक्त-वस्त्र, रक्त-माला तथा रक्त-चंदन धारण किया, मारण-तंत्र-विधि से तोमर,
प्रास तथा खड्गों को हवन-कुंड की परिधि के रूप में सजाया और सजीव कृष्ण-हरिण
का कंठ काटकर उसका सिर ले लिया और भक्ति के साथ विधिवत् होम किया ।
अग्निदेव ने अपने धूम तथा शिखाओं को चारों ओर व्याप्त करते हुए प्रज्वलित होकर
हव्यो को ग्रहण किया । उस जयशील निशाचर वीर ने विजय के कई शकुन देखने के
कारण अत्यंत हर्ष से नियमपूर्वक होम समाप्त किया । उसके पश्चात् उसने चार अश्व
जुते हुए, भयंकर तथा श्रेष्ठ बाणों से दीप्तिमान् होनेवाले, सुंदर ढंग से अलंकृत सिंह
तथा अर्द्ध-चन्द्र के चिह्नों से अंकित, मणियों की उज्ज्वल कांति से भास्वर पताका से युक्त,