रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयुद्धकांड ३७७
'हे देव, अपनी माया के कारण गर्वांध होकर यह इस प्रकार कपि-सेना का सहार करने
पर तुला हुआ है। हमें अब शीघ्र इसका वध कर डालना चाहिए।' तब राम ने अनुज को
देखकर कहा--'हे लक्ष्मण, ब्रह्मा के वर के प्रभाव से यह आकाश में दूसरो की दृष्टि में
आये विना गर्व से बहुत फूल रहा है। हम कितना भी क्रुद्ध होकर युद्ध करें, यह हमारे
वश में नही आ सकेगा। आज यह हमारे लिए असाध्य है। इसके ऊपर कोई भी अस्त्र
सफल सिद्ध नही होगा, केवल हमारे अस्त्र व्यर्थ जायेंगे।' उसी समय अग्निदेव ने आकर
मृदु वचनो में कहा--'हे नर-नाथ, इसकी माया को देखकर आप भयभीत मत होइए।
यदि आप आग्नेय मत्र को जपकर बाण चलावें, तो उस देवी की शक्ति नष्ट हो जायगी
और वह उस राक्षस को छोडकर चली जायगी।'
इतना कहकर जब अग्निदेव चले गये, तब राम ने विधिवत् अग्नि-मन्त्र का
जप करके बाण चलाया। तुरत वह माया-मूर्त्ति अद्भुत रीति से इन्द्रजीत को छोडकर कही
चली गई। तब इन्द्रजीत पृथ्वी पर उतर आया और धनुष का भीषण टकार करने लगा।
इतने में सभी वानरनायक मूर्च्छा से मुक्त हो शीघ्र एकत्र हुए और इन्द्रजीत से भिड गये ।
हनुमान् ने शैल-शृग से, अगद तथा मैन्द ने विशाल पर्वतो से, गज ने बडे पर्वत से, नील ने
एक विशाल वृक्ष से, नल ने अश्वकर्ण नामक वृक्ष से, सूर्य-पुत्र ने एक विशाल वृक्ष से,
पनस ने असख्य शाखाओवाले वृक्ष से, विभीषण ने भयकर गदा से, सपाति ने ताल-वृक्ष मे,
अन्य वानर तथा जाबवान् आदि वीरो ने असख्य वृक्षो तथा महाशैलो से इन्द्रजीत पर
प्रहार किया । लक्ष्मण ने तीन बाण चलाये और राघव ने एक सौ तीर चलाये । किन्तु,
उस राक्षस ने उन सब को अपने विविध शरो से चूर-चूर कर दिया और अपने घोर बाणो
की वृष्टि से वानरो को विफल कर दिया। उसने अठारह परुष तथा उग्र बाणो से गध-
मादन को, पाँच शरो से मैन्द को, सात तीरो से द्विविद को, सात बाणो से हनुमान् को,
सात ही बाणो से कुमुद को, नौ बाणो से अगद को, उतने ही शरो से नल को, पाँच
तीरो से नील को, सात बाणो से गवाक्ष को, पैसठ बाणो से सुग्रीव को, बीस बाणो से
पनस को, सात बाणो से दधिमुख को, सौ बाणो से राघव को, पचहत्तर बाणो से लक्ष्मण
को, तीन ही बाणो से शतवली को, तथा सौ बाणो से विभीषण को व्याकुल कर दिया
और अन्य वानर तथा ऋक्ष-वीरो को अपने शराघात से मरणासन्न कर दिया । तब हनु-
मान् ने पर्वत-शृग को, अगद ने बृहदाकार शिलाओ को, पनस तथा विभीषण ने विशाल
गदाओ को, सपाति ने उत्ताल ताल को, नल ने साल तथा अश्वकर्ण नामक वृक्षो को,
सूर्य-पुत्र ने पर्वत-पक्तियो को, शक्ति-विक्रम-सपन्न नील ने शक्ति को, अनल ने सप्तपर्ण को,
अन्य वानरो ने खदिर-वृक्षो को तथा शतवली ने वेर-वृक्ष को उस इन्द्रजीत पर फेंका ।
लक्ष्मण ने तीन उग्र बाण चलाये और राम ने एक सौ श्रेष्ठ शरो को चलाया । शरभ,
ऋषभ, जाबवान्, गवय, सुषेण, गवाक्ष, गज, द्विविद, मैन्द तथा अन्य अनुपम शूर वानरो ने
विशाल पर्वतो तथा वृक्षो को उस राक्षस-राजकुमार पर फेंका। किन्तु, इन्द्रजीत ने आश्चर्य-
जनक ढग से उन सबको अपने बाणो से चूर-चूर कर दिया और नूर्य-पुत्र के वक्ष पर
एक शूल ऐमा चलाया कि वह प्रचण्ड वायु के आघात से कपित होनेवाले वृक्ष की भाँति
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