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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 406, कुल 508 में से

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पृष्ठ 406

३७६ रंगनाथ रामायण
कुछ लोगों के सिर पर बाण ऐसे लगने कि वे पृथ्वी से सट जाने और खड़े-ही-
खड़े मर जाते थे, कुछ समस्त अंगों में बाणों के लगने से, भूमि पर लोट जाते । कुछ
गजों के शवों की आड़ में छिप जाते और कुछ अपने हाथों में पर्वत उठाये हुए राक्षस के
बाणों को रोकते । कुछ वानर इन्द्रजीत के दृष्टिगोचर न होने से पुनः-पुनः आकाश की
ओर देखते हुए दाँत पीसते थे । अविरल अस्त्र के प्रवाह के ऊपर से गिरते रहने से कुछ
वानर उसमें अपने मुखों की रक्षा करने के लिए अपनी हथेलियों को सेतु के समान बनाकर
उसे रोकते थे । कुछ वानर अशनि-पिंडों की भाँति गिरनेवाले उन बाणों को शीघ्र ही
अपने हाथों से तोड़ डालते थे और कुछ पूँछों से उन पर प्रहार करके उन्हें तोड़ डालते थे,
कुछ वानर बाणों के आघात से रक्त में सन गये थे और कुछ बाणों के प्रहार के
बावजूद अचल खड़े रहते थे । कुछ वानर आँतों के बाहर निकलने से पृथ्वी पर लोटते हुए
और जँभाइयाँ लेते हुए अपनी आँखें बंद कर लेते थे, कुछ कहते थे कि अंत में हम
श्रीराम के लिए युद्ध में अपने प्राण दे पाये और कुछ ब्रह्मा को कोसते हुए कहते थे कि
यह दुर्जय है, आज इसको जीतना असंभव है । कुछ वानर कहते थे कि यह ब्रह्मा की दी
हुई शक्ति है, इसलिए यह ब्रह्माण्ड में कहीं भी दीख नहीं रहा है, किन्तु राम के आगे
ब्रह्मा का वर ही क्या है और स्वयं ब्रह्मा की ही क्या हस्ती है ? पता नहीं कि रामचन्द्रजी
अबतक क्रुद्ध क्यों नहीं हो रहे हैं ?
इस प्रकार, सभी वानर जितने मुँह उतनी बातें कर रहे थे । इन्द्रजीत अपने अनुपम
पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए एक स्थान पर धनुष का टंकार करता, तो दूसरे स्थान पर
शर-वृष्टि करता । एक स्थान पर अपना नाम कहता, तो दूसरे स्थान पर गर्जन करता,
एक स्थान पर डाँट बताता, तो दूसरे स्थान पर हँसता और कहीं हुंकार भरता । इस
प्रकार, जब वह भयंकर गति से विचरण करने लगा, तब श्रेष्ठ बलवान् हनुमान्, अंगद,
शरभ, ऋषभ, जाम्बवान्, गज, गवाक्ष, गवमादन, विजय, नील, सुषेण, पनस आदि योद्धा
शीघ्र ही पर्वतों तथा वृक्षों को उठा-उठाकर समस्त आकाश में फेंकने लगे, किन्तु वे इन्द्र-
जीत के चलाये हुए बाणों से टकराकर खण्ड-खण्ड हो गये और वायु-वेग से तथा भयंकर
ध्वनि के साथ, जहाँ-तहाँ पृथ्वी पर गिर गये और उनकी चोट से कई वानर मृत्यु को
प्राप्त हो गये । फिर, मेघनाद अत्यंत क्रूरता से बाणों की अविराम वर्षा करने लगा, तो
कुछ वानर खंडित होकर गिर पड़े और कुछ भयभीत होकर चारों दिशाओं में जाकर छिप गये ।
इस प्रकार, इन्द्रजीत ने बाणों के प्रहार से दस करोड़ वानर-वीरों को मिट्टी में
मिला दिया । उसके पश्चात् भी उसका सामना करनेवाले कितने ही वानरों को अपने
प्रचण्ड बाणों के प्रहार से खंड-खंड कर दिया । महान् पराक्रमी हनुमान्, अंगद, शतबली
गवाक्ष, नील, नल, पनस, कुमुद, गवमादन तथा ऋक्ष एवं असंख्य वानरनायकों को अपने उग्र बाणों
से निश्चेष्ट कर दिया और ऐसा सिंहनाद किया कि देवताओं के हृदय भी दहल उठे ।
९८. राम का आग्नेय अस्त्र से इन्द्रजीत की माया को दूर करना
इन्द्रजीत के दुर्वार विक्रम से मन-ही-मन भयभीत हो, गर्व त्यागकर कपि-सैनिक
लक्ष्मण के पीछे आ आकर शरण लेने लगे । तब सौमित्र ने रामचंद्र को देखकर कहा-