रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 413, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंयुद्धकाण्ड ३८३
सीता को युद्ध-भूमि में लेकर आया और निर्दय होकर हमारे समक्ष ही उनका सिर काट
डाला । इसलिए मै जाबवान् को द्वार पर रक्षा करने के लिए नियुक्त करके आप से यह
समाचार कहने को आया हूँ ।'
यह समाचार कानो तक पहुँचने के पूर्व ही प्रचण्ड वात से आहत वृक्ष की भाँति
अतुलित शोकाग्नि से जलते हुए, धैर्य खोकर रघुकुलेश्वर मूर्च्छित हो गये। पृथ्वी पर गिरे
हुए राम को देखकर सभी वानरनायक विलाप करने लगे ।
१०२ लक्ष्मण का शोक
तब लक्ष्मण ने अपने अग्रज के सिर को अपनी गोद में रखकर सभ्रमित चित्त से
इस प्रकार आर्त्तनाद करने लगे- "हाय राम, आप जैसे पुरुषोत्तम को आज यहाँ ऐसा कलक
लग गया । 'धर्ममेव जयते', यह कथन सत्य सिद्ध नही हुआ । यदि वह उक्ति सत्य
होती, तो आप जैसे दयावान् के लिए ऐसा सताप क्यो कर होता ? आपके हाथो मे रावण
की मृत्यु क्यो प्राप्त नही होती ? इससे तो यही सिद्ध होता हैं कि धर्म से अधर्म ही श्रेष्ठ है।
अयोध्या का राज्य त्याज्य नही है, ऐसा विचार किये विना हम उस राज्य को
छोडकर जगलो में भटकने आये । जगलो में भटकनेवाले हमें पुरुषार्थ कैसे
सिद्ध होगे ?
"क्या हमने बुद्धिमानो का यह वचन नही सुना कि निर्धनो के सभी प्रयत्न उसी
प्रकार निष्फल हो जाते हैं, जैसे निदाघ में झरने नष्ट हो जाते हैं । हे राजन्, धन का
अर्जन करने से धर्म तथा काम आदि अपने-आप सिद्ध हो जाते हैं । जिसके पास धन
होता है, सभी उसके सगे-सबधी बन जाते हैं । अर्थ-सपन्न व्यक्ति ही पुरुषोत्तम होता है,
धन ही विद्या है, धन ही कौशल है, धन ही कीर्त्ति है, वही महत्ता है, वही उच्चकुल
तथा सद्गुण है । धन ही शील और बल है, वही पुण्य है, वही राज्य है । धन ही
प्राण है, सौदर्य है, ख्याति है, नीति है, सपत्ति है, बुद्धि है, ज्ञान है, सुख है और शुचित्व है ।
अर्थ से सपन्न व्यक्ति की सभी इच्छाएँ वात-की-वात में पूरी हो जाती हैं । महान्
व्यक्ति, वेद-वेदाग-पारगत तथा विबुध-जन पुष्पाक्षतों से धनी व्यक्ति की बडी प्रीति से
पूजा करते हैं । जगलो में रहनेवाले मोक्षार्थ मुनि-पुगव भी कद, मूल तथा फल की भेंट
करते हुए धन-सपन्न व्यक्ति के दर्शन करते हैं । वदीजन तथा संगीतज्ञो का समाज धनवान्
व्यक्ति की सतत प्रशसा करते रहते हैं । उन्नतकुच, गुरु नितब, क्षीण कटि, मदगमन, विम्वा-
धर, चन्द्रमुख, कमल-नेत्र, भ्रमर के समान नीला जूड़ा, सुदर केश, नवोदित लज्जा, हाव-
भाव, मधुर कटाक्ष, मीठे वचन, नव यौवन आदि से सपन्न रमणियाँ भोग-
लालसा से प्रेरित होकर धनी-वृद्ध से भी प्रेम करेंगी, पर धन-हीन तरुण का अनादर करेंगी।
धन का अभाव ही नरक है, वही श्मशान है, वही महान् शोक है । दरिद्रता ही रोग है,
मृत्यु है, पाप है और कारावास है । धन का अभाव ही सकट है, अकाल है, दैन्य है
और दुःख है । निर्धनता ही सब प्रकार की कलुषता है । धनाभाव में सभी का अभाव
होता है । अत, जिस दिन हम राज-पाट छोडकर आये, उसी दिन विपत्तियाँ भी हमारे
साथ आई । मैं जानकी की मृत्यु का दुख सहन नही कर सकता । हे राजन्,