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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 419, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 419

युद्धकांड ३५९
इस प्रकार सोचकर मेघनाद ने लक्ष्मण को देखकर कहा—'हे राजकुमार, अब तुम
वीर की तरह खडे होकर मेरे पराक्रम को देखो ।' यो कहते हुए उसने सात बाण लक्ष्मण
पर, दस बाण हनुमान् पर तथा एक सौ बाण विभीषण पर चलाकर उन्हें व्याकुल कर
दिया । उन बाणो की उपेक्षा करते हुए लक्ष्मण ने इन्द्रजीत को देखकर हँसते हुए कहा—
'हे राक्षस, शूर बडी-बडी बातें कहे बिना ही युद्ध जीत लेते हैं और अधम डींग हाँकते
हुए भी हार जाते हैं । सच्चा वीर युद्ध में कभी छिपता नही । युद्ध में धोखा देना भी
क्या, कोई वीरता है ? हे क्रूरात्मा, तुम कुटिल युद्ध करनेवाले हो ? तुम्हारे इह-लोक
और पर-लोक दोनो नष्ट हो जायेंगे ।'
इस प्रकार कहते हुए लक्ष्मण ने सूर्य-किरणो की भाँति प्रकाशमान होनेवाले, स्वर्ण
की अनी से युक्त बाणो को उस राक्षस पर चलाया, तो वे उसके कवच को भी छेदकर
उसके शरीर के पार निकल गये । तब उसका कवच भयकर सर्प की केंचुली की भाँति
पृथ्वी पर गिर पडा । तब इंद्रजीत दूसरा वज्र-कवच पहनकर लक्ष्मण पर पैने बाण
चलाने लगा । परस्पर के शराघातो के कारण शरीरो से निकलनेवाले शोणित के प्रवाह
से युक्त होकर, वे दोनो गेरुए रग के निर्झरो से युक्त पर्वतो की भाँति दीखने लगे । वे
अपनी-अपनी धनुर्विद्या का कौशल दिखाते हुए तीव्र गति से युद्ध करने लगे । अस्त्र के
आघातो से युक्त हो युद्ध करते समय, वे ऐसे दिखाई पड रहे थे, मानो पतझड के उपरान्त
पुष्पित किंशुक वृक्ष हो । अमर, गधर्व आदि आश्चर्य के साथ इस युद्ध को देखने लगे ।
उसी समय कलभो से घिरे हुए मत्त गज के सदृश, मत्रियो से घिरे विभीषण ने
भयकर रीति से अपने धनुष का टकार किया और क्रोधोन्मत्त हो राक्षस-सेना पर ज्वालाओ
को उगलनेवाले तीक्ष्ण बाण चलाये । उन बाणो के लगते ही राक्षस-सेना इस प्रकार
पृथ्वी पर गिरने लगी, जैसे वज्रपात से विशाल वृक्ष गिरते हैं । अनल आदि उसके मत्री
शूल, वरछे, खड्ग आदि शस्त्रो से राक्षसो पर आक्रमण करके उन्हें धराशायी करने
लगे । तब विभीषण वानर-सेना को देखकर कहने लगा —'अब तुम सब लोग एक साथ
मिलकर इस इन्द्रजीत का वध करो । लंकेश्वर की सारी शक्ति यही है । यदि यह मारा
गया, तो समझो कि दशकण्ठ अपनी सेना के साथ परास्त हो गया । इसके पहले तुम
लोगो ने अपने असमान विक्रम से, प्रहस्त, वज्रमुष्टि, प्रजघ, सुप्तघ्न, भयकर प्रतापी कुभ-
निकुंभ, कुभकर्ण, अतिकाय, महापार्श्व, धूम्राक्ष, मकराक्ष, क्रोधन, शोणिताक्ष, उपाक्ष, त्रिशिर,
महोदर, अग्निकोप, देवांतक, नरातक, जंबुमाली, अकपन आदि महान् पराक्रमी योद्धाओ
को मारकर युद्ध-सागर को सहज ही पार किया था और अपने बाहुबल को प्रदर्शित किया था ।
अब तुम्हारे तथा लक्ष्मण के लिए यह इन्द्रजीत एक गोपद के समान है । मुझे अपने
पुत्र का वध नही करना चाहिए । इसके नष्ट होने का उपाय मैं तुम्हें बताऊँगा । सुनो,
स्वय हिंसा करना या दूसरो को भेजकर हिंसा कराना, दोनो समान हैं । किंतु यह राम का
कार्य है, इसमें लोकहित निहित है । इसलिए यह पाप नही है । अब मैं सौमित्र के हाथो
इसका वध कराऊँगा । आगे इसकी एक भी माया नही चलेगी ।'
इसके पश्चात् जाम्बवान् ने अपनी रीछो की सेना लिये हुए आकाश को विदीर्ण