रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७८ रंगनाथ रामायण
सेना का सहार करने लगे । यह देखकर मकराक्ष क्रोध से दहाड़ते हुए अपना रथ राम के
पास ले गया और उनसे कहने लगा—'हे राघव, मै खर का पुत्र हूँ। तुमने पहले मेरे
पिता का वध किया है । इसी कारण मेरा हृदय इतने दिनों से जल रहा है । मैं सतत
तुम्हारे साथ युद्ध करने के अवसर की प्रतीक्षा में था । आज वह अवसर मुझे मिल गया ।
तुम यहाँ से हटो मत । अपने पिता के वध का प्रतिशोध लेने के लिए आज मैंने तुम्हें
प्राप्त किया है । तुम गदा, धनुष या खड्ग इन तीनों में से किसी को लेकर मेरे साथ
युद्ध कर सकते हो ।'
तब राघव ने क्रुद्ध होकर उससे कहा—'हे नीच दानव, व्यर्थ का गर्व क्यो करते हो ?
मै अपने भुज-बल का प्रदर्शन करके युद्ध में तुम्हारा वध करूँगा । इन बातो को
सुनकर मकराक्ष ने राम पर कई पैने बाण चलाये । किंतु, बीच में ही राम ने उन्हें काट
डाला । उन दोनो के कठोर धनुष के टकारो से समस्त ब्रह्माण्ड तथा दिशाएँ कपायमान
होने लगीं । मकराक्ष, राम के चलाये सभी अस्त्रो को शीघ्र ही काट डालने और उन पर
अनुपम बाणो का प्रहार करने लगा । किंतु, राघव ने उसके बाणो को काटकर विविध
भीषण शरो से उसे आहत करने की चेष्टा की । लेकिन, उस राक्षस ने शीघ्र ही सब
अस्त्रो को खड-खड करके भयकर सिंहनाद किया । तब काकुत्स्थ-वंशज ने एक बाण से
उस राक्षस का धनुष काट डाला । आठ शरो से उसके सारथी का सहार किया और
उतने ही बाणो से उसके रथ को छिन्न-भिन्न कर दिया ।
रथ से रहित होकर मकराक्ष ने एक शूल राम पर चलाया । किंतु, राम ने तीन
बाणो से उसको चूर-चूर कर दिया । यह देखकर देवता राम की प्रशसा करने
लगे । वह राक्षस क्रोधोन्मत्त दाशरथि पर मुष्टि से प्रहार करने के लिए वेग से उनकी
ओर आने लगा । किंतु, राम ने इसी बीच उसके वक्ष पर अनलास्त्र का प्रहार किया, तो
मकराक्ष तुरंत पृथ्वी पर गिर पड़ा । उसी समय पश्चिम पर्वत पर कमल-बान्धव (सूर्य) अपनी
अरुण प्रभा से भाममान होने लगा । हतशेष राक्षस लका में भाग गये और रावण से
मकराक्ष की मृत्यु का समाचार कह सुनाया । तब क्रोध एव चिता से अभिभूत होकर रावण ने
इन्द्रजीत से कहा—'हे तात, युद्ध में कपियो तथा राम-लक्ष्मण को क्षणमात्र में मार
डालने की क्षमता रखनेवाला तुम्हारे सिवाय और कौन शूर रह गया है ? तुम शीघ्र
अपनी सेना के साथ जाओ और उन दोनो का सहार करके लौट आओ, जैसे तुम देवताओ
का सहार करके लौट आये थे ।'
९६. इन्द्रजीत का तृतीय युद्ध
तब इन्द्रजीत ने विनय से रावण को प्रणाम किया और उसकी आज्ञा लेकर युद्ध
के लिए चल पड़ा । वायुवेग से जानेवाले अश्वो से जुते हुए विशाल रथ पर आरूढ़
होकर शरत्काल के बादलो से आच्छादित शैल की भाँति वह श्वेत छत्रो की छाया में बैठे
हुए जाने लगा । उसके दोनो पाश्र्वो में सुन्दरीयाँ अपने रमणीय ककणो की मधुर ध्वनि
करती हुई चामर डुला रही थी । अपने मुख पर रणोत्साह की दीप्ति को लिये हुए उसने
अपनी माता को प्रणाम किया और माता से आशीर्वाद प्राप्त करके पत्नी तथा पुत्रो से